अमरीक सिंह दीप
उत्तर आधुनिक
सुधा खूब पढ़ी – लिखी थी। साहित्य प्रेमी थी। विवाह को सात वर्ष हो चुके थे। दो बच्चे भी थे। लेकिन उसे न मनचाहा पति मिला था ,न मनचाही ससुराल । पति की सरकारी नौकरी भले ही थी पर आदतें सारी अय्याश सामंतों वाली थी ; अर्थात छककर शराब पीना , जमकर जुआ खेलना , डटकर औरतबाजी करना। सुधा के विरोध करने पर वह पहले उसे धुन डालता तत्पश्चात् उसके दर्द से कराहते शरीर को निर्ममता से रौंदते हुए उसकी कराहों से चरम सुख प्राप्त करना।
सास ,बेटे के इस कुकृत्य को इस घर का खानदानी संस्कार मान खुश होती , विधवा बड़ी ननद को सुधा के शादी से पहले के प्रेम-प्रसंग का पता चल गया था, भाभी की पिटाई का कारण वह मोहल्ले में इसी प्रेम-प्रसंग को प्रचारित करती।
कहते है , कुदरत अपने सिर पर किसी का कर्ज़ा नहीं रहने देती । अचानक एक रात शराब के नशे में धुत होकर घर लौट रहे सुधा के पति की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।,
कुछ माह बाद ही सुधा को पति की सरकारी नौकरी तो हासिल हुई ही ,पति का फण्ड , ग्रेजुयुटी और पेन्शन भी उसके हाथ आ गई । सत्ता बदलते ही सास और ननद भी बदल गईं ।
सुधा ने अपने दोनों बच्चों को नैनीताल के एक बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया , छोटी ननद की उसके मनपसंद लड़के से शादी कर दी। अब सुधा अपनी शादी से पूर्व के प्रेमी से , जिसने अपने सच्चे प्रेम के चलते ताउम्र विवाह न करने का संकल्प ले रखा था , सरेआम मिलने लगी , उसे घर भी बुलाने लगी ।
उसकी घनघोर दकियानूसी विधवा सास और विधवा ननद अब अत्यन्त आधुनिक हो गई थीं । उनकी नज़र में विधवा स्त्री भी इन्सान है , प्रेम करने का उसे भी हक़ है। जरूरी नहीं कि जिससे प्रेम किया जाये उससे शादी ही की जाए।
दोनों को अब लिव -इन रिलेशन में कोई बुराई नज़र नहीं आती थी।