मुझे अपने मित्र से मिले वर्ष भर से अधिक हो गया था। परसों अकस्मात् ही मेरे पग उसके घर की ओर मुड़ गए। उसके घर अतिथियों का तांता लगा हुआ था।
मित्र द्वारा मुझे अपने विवाह में निमंत्रण न देने पर मुझे रोष उत्पन्न हुआ। पर कमरे में प्रविष्ट करते ही मेरा भ्रम आधारहीन निकला कि मित्र का विवाह है। पर उसकी व्यस्तता को देखते हुए उत्सव का प्रायोजन न पूछ सका। कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने विचारों के घोड़े तीव्र गति से दौड़ाने लगा।
निकटतम कमरे में बैठी महिलाओं की रेशमी साड़ियां, मुख पर मुस्कराहट एवं रोजमर्रा की समस्याओं पर उनके विचारों का आदान-प्रदान –ये सभी तथ्य मेरी उत्सुकता बढ़ाने में सहायक थे। उधर,बरामदे में रखी कड़ाही में डुबकी लगाती पूरियां व जलेेबियां किसी बड़े आयोजन की ओर संकेत कर रही थीं। उपस्थित व्यक्तियों की तुलना में मेरी पोशाक साधारण थी। अतः मैं वहां से निकलने का बहाना खोज रहा था।
अवसर पाते ही मैंने अपने मित्र से विदा मांगी। वह तुरंत स्वीकृति देते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें बाहर तक छोड़ने नही आ सकता क्योंकि आज मेरे दादा जी का उठाला है।’’
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