प्रबोधकुमार गोविल से सर्वप्रथम मेरा परिचय एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि बतौर लघुकथाकार हुआ। आठवें दशक में पहले सोपान में किसी पत्रिका (जेहन में नाम नहीं आ रहा है।) उनकी ‘माँ‘ लघुकथा पढ़ी थी। बाल मनोविज्ञान पर बड़े फलक की ऐसी लघुकथा प्रथम बार पढ़ने को मिली। वर्षों तक लघुकथा का कथानक और उसका शिल्प-सौष्ठव स्मृति में स्मरण रहे, लेकिन लेखक का नाम विस्मृत होता गया। उसके बाद किसी लघुकथा संकलन में ‘माँ‘ के साथ उनका नाम और पता भी लिखा पाया। ‘माँ‘ में पृष्ठभूमि, भावभूमि, बाल मनोविज्ञान का तो सुंदर समन्वय है, पाठक उसकी ग्राह्यता का भी कायल होकर रह जाता है।
बाद में मालूम पड़ा कि गोविल की ‘माँ‘ लघुकथा सन् 1980 में सतीश दुबे, इंदौर के द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर रही थी।
उसके बाद उनसे वनस्थली विधापीठ में मुलाकात हुई। तत्पश्चात तो उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व दोनों से ही परिचय होता गया और व्यवहार की तुला पर दोनों एक समान पाए।
हालांकि श्री गोविल ने उपन्यास, कहानियाँ, समीक्षाएँ तथा समसामयिक लेख भी बहुतायत में लिखे हैं, लेकिन विद्यागत कसौटी और प्रतिमान (Paradigm) के तहत उनकी लघुकथाएँ कहीं उम्दा महसूस हुईं। उनके लघुकथा सृजन की जितनी जमीन है, उनका उतना ही आसमान है। कहना होगा कि हर विधा के अपने वाक्य होते हैं, जिनके कारण वह पहचानी जाती हैं। लघुकथा के वाक्य कहीं छोटे, गंभीर और चुटीलापन लिए होते हैं, जो उनकी लघुकथाओं में प्रयुक्त होते रहे हैं। उन्होंने मानव और मानवेतर दोनों ही प्रकार की लघुकथाएँ लिखी हैं। उनकी लघुकथाओं का निर्वाह बखूबी होता है। बावजूद इसके उनकी मानवेत्तर लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट सौष्ठव के कारण पहचानी जाएँगी। उनकी लघुकथाओं के हवा, पेड़-पौधे, पक्षी-जानवर तथा अंतस् तक पात्र होते हैं। पति-पत्नी के सघन रिश्ते, माता-पिता का स्नेह, भाई-भाई के बीच सौहार्द, बहन-भाई का प्यार उनकी लघुकथाओं के कथानक में बड़े सलीके से सामने आते हैं। परिवेश में बिखरे भाव-प्रधान कथानक भी उनकी लघुकथाओं में देखे गये हैं।
उनकी मानवीय संवेदनाओं और सरोकार की लघुकथाएँ जिन मूल्यों का संवर्द्धन करती हैं, उनकी केन्द्रीयता सहजताबोध से प्रोत रहती हैं। उनकी लगभग सौ शब्दों की लघुकथा है ‘उपाय‘। कम शब्दों की होने के बावजूद लघुकथा के मानक पर खरी उतरती है, जो क्षणों को भावपूर्ण कैसे बनाती है।
अमुक महकमे का आला अफसर पर भ्रष्टाचार के मामले इतने जुड़ते गये कि ऊपर के बढ़ते दबाव के कारण प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर अपनी सफाई देने पर मजबूर होना पड़ा। मीडिया की ओर से जब उन पर यह सवाल दागा जाता है कि आपके खिलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। सहसा उन्हें वह बात स्मरण हो आई कि सीताजी पर लांछन लगने पर उन्होंने धरती मैया को याद किया था। धरती फट गई और सीताजी उसमें समा गईं। यहाँ ‘उपाय‘ लघुकथा जिस प्रकार करवट लेती है, वह आज के बदलते परिवेश का दिग्दर्शन है। उन्होंने भी धरती माँ को पुकारा। शिकायतकर्ता एक-एक कर धरती में समाने लगे। वक्त की करवट के साथ धरती मैया की जो फितरत बदली है, लघुकथा का मर्म है।
नैतिकता को इंसानियत की थाती कहा गया है। हक के फैसले का अख्तियार अंतस को भी होता है। ‘नैतिक बल‘ लघुकथा अन्त:करण की नैतिकता को केन्द्र में रख कर लिखी गई है, जो साहस का द्योतक है।
प्रशासनिक प्रक्रिया में केयर टेकर अधिकारी वर्ग और कार्मिकों के बीच की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी होता है। कई बार तो वह अधिकारियों को सामान उपलब्ध करवाने वाला उपकरण ही बन कर रह जाता है। ‘नैतिक बल‘ लघुकथा में केयर टेकर का किरदार इतर है। जिला में पत्नी जिला कलेक्टर के पद पर आसीन है, जबकि उसके पति राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, मातहत हैं। सामाजिक परम्परा की दृष्टि से पति की नेमप्लेट ऊपर तथा पत्नी की नेमप्लेट उसके नीचे लगाई जानी होती है। लेकिन केयर टेकर जिला कलेक्टर आवास पर कलेक्टर की नेमप्लेट ऊपर और उसके पति की नेमप्लेट उससे नीचे लगा कर सरकारी पद प्रोटोकाल का अनुसरण करता है। यह देख राज्य प्रशासनिक सेवा का अधिकारी उस पर आगबबूला हो उठता है। जब वह उनको प्रोटोकाल की याद दिलाता है तो उसका अंतस पसीना से तर-बतर हो जाता है। यहाँ कार्मिक का नैतिक बल उसकी निष्ठा बन सामने आता है।
‘तैयारी‘ लघुकथा एक नई जीवनपद्धति की है, जो पाठक मन को बेचैन कर देती है। एक विद्वान प्रोफेसर ने पौराणिक ग्रंथ, मध्यकालीन संत काव्य और आधुनिक कवियों और साहित्यकारों पढ़ कर एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। एक शिष्य उनकी बौद्धिकता का कायल रहा। लेखक बनने की स्मृहा मन में संजोये उनका वह शिष्य उनके पास पहुँच जाता है। प्रोफेसर से शिष्य को जो ज्ञानार्जन होता है, वह दृष्टिकोण लघुकथा की केन्द्रीयता है। वे लेखक बनने के इच्छुक अपने शिष्य को ज्ञान देते हैं- ”इस दुनिया को खाली काग़ज समझो। यह सोचो की तुम्हारे पहले एक शब्द भी नहीं लिखा गया। अपनी आँखों से आज की समस्याएँ देखो। अब तक लिखे गये को अपने पैरों की बेड़ियाँ समझो। पुस्तकालय को मदिरालय मानो। उधर का रूख भी मत करो।”
वह शिष्य हर्षोल्लास में आकर अपने सपने को अपनी कल्पना में सच होते देखने लगता है। अपने प्रोफेसर की भाँति लेखक नहीं पाता है।
‘विषैला वायरस‘ एक अनूठी लघुकथा है, जिसमें बीमार कर देने वाले वायरसों के द्वारा यह ठान लिया जाता है कि हम कितने लोगों को बीमार कर सकते हैं। पूरी लघुकथा में वायरस और मनुष्य के बीच कशमकश चलती है। वायरस मनुष्य को बीमार कर देना चाहते हैं, लेकिन मनुष्य उनसे बचना चाहते हैं। बावजूद इसके वायरस एक युक्ति निकालते हैं कि पुरुष मनोवृति किताबी कीड़ा होती है। अत: क्यों न उनकी किताबों में बैठ कर उनको गिरफ्त में लिया जाए। वायरस किताबों में जा छुपते हैं। देखा गया कि इंग्लिश पढ़ने वाले पाठक कहीं अधिक वायरस के शिकार होते हैं। जबकि हिन्दी पढ़ने वाले पाठक बच जाते हैं।
लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद कोरोना पर उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ और लघुकथाएँ बहुतायत में लिखी गईं। प्रबोधकुमार गोविल की दो लघुकथाएँ कोरोना के दौरान हुए लॉकडाउन के कथानक पर केन्द्रित है। जमाखोरी, मुनाफाखोरी, हरामखोरी और धर्म कमाने के नाम पर मिथ्या आत्मवंचना के कितने लोग शिकार होते हैं। मनुष्य इतना असहाय हो जाता है कि वह न केवल अपने घरों में ही क़ैद है, बल्कि स्वयं में सिमट कर रह जाता है। इस दौरान असहाय लोगों को भोजन करा कर एक धनाढ्य इतना फूल जाता है कि वह भगवान से ही कह बैठता है कि मैंने हजारों निर्धन लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की। इसका प्रत्युत्तर भगवान की ओर से नहीं, बल्कि उसकी अंतरात्मा की ओर से आता है, जो उसकी आत्मश्लाघा पर कड़ी चोट है। आवाज है– ”इसका मतलब तुम अब तक इन लोगों के भोजन को अपने कब्जे में लेकर बैठे थे। यह लोग इसलिए निर्धन थे कि इनका हक तुम्हारी तिजोरी में बंद था।” यहाँ आकर पाठक देश की अमीर-गरीब की खाई में अटक जाता है और लघुकथा ‘लॉकडाउन में खुले कपाट‘ अपना स्वरूप पा जाती है।
उनकी दूसरी लघुकथा ‘कर्फ्यू में महानता‘ है। कोरोना में सर्वव्यापी लॉकडाउन के दौरान कामवाली बाई काम पर नहीं आती है। पति-पत्नी को अपना-अपना काम बाँट कर दिनचर्या पूरी करनी होती है। खाना बनाना, कपड़े धोना जैसे काम पत्नी करेगी। बर्तन साफ करना और कपड़े सुखाना जैसे काम पति करेगा। काम के दौरान वे दोनों ही एक-दूसरे के काम में नुक्स निकालते परस्पर खीजते-झल्लाते रहते हैं। एक समय वे शांत स्वभाव बैठे होते हैं कि घर के सारे काम अकेली बाई निपटाती थी। बावजूद इसके उसके चेहरे पर शिकन तक नजर नहीं आती थी। कर्फ्यू ने काम वाली बाई की महता का उन दोनों को अहसास होता है।
जिस तरह के परिवेश और फितरत, उसी प्रकार का मंचीता भोजन। ‘खाना‘ नामक लघुकथा का यही भाव प्रकट है। सात्विक प्रवृत्ति के पंडितजी को सार्वजनिक पार्क में बैठ कर भोजन करते कई लोग मिलते हैं। वे शाकाहारी भी हैं और सामिष भी। पंडितजी को इन व्यंजनों में कोई भी उनके मनमाफिक नहीं नजर आता है। क्योंकि यहाँ उन्हें न खीर दिखाई देती है न हलवा न पूड़ी। यानी व्यक्ति का स्वभाव और सामाजिक परिवेश भी उसके भोजन की आदत का आकलन होते हैं।
एक नये कलेवर और नये रूप-विधान की लघुकथा है ‘साधन‘। एक संभ्रांत व्यक्ति के पास अपार स्वर्ण भण्डार है। बावजूद इसके वह अपने प्रबंधक से एक अजीबोगरीब बात कहता है कि तुम मेरा सारा सोना ले जाओ और उसके बदले में थोड़ा सा लोहा ला दो। ताकि मैं उस लोहे से एक कुल्हाड़ी बनवा सकूँ। प्रबंधक के पूछने पर उसे जो जवाब मालिक की तरफ से मिलता है, वह एकदम अनूठा और बेचैन कर देने वाला होता है। ”जब मैं मरूँ तो कोई यह पूछे कि मैं कैसा था और तुम मेरी कब्र से मुझे निकाल कर काफिन बॉक्स को कुल्हाड़ी से काट कर दिखा सको।” यह लघुकथा साध्य की ओर लक्षित है।
‘झगड़ा‘ उनकी बालकथा है, जिसे यहाँ लघुकथा की श्रेणी में रखा गया है। उसे पूरा पढ़ने पर यह स्पष्ट होता जाता है कि इसका फलक और गांभीर्य लघुकथा का ही स्थापन है। दादी माँ रोहित और मोहित को कहानी सुना रही होती है। कहानी में दोनों बच्चों को बड़ा रस आ रहा होता है। दादी कहती है कि मैच में हाथी के द्वारा फेंकी गई बॉल पर भालू ने जोरदार छक्का मारा। तभी बकरी ने उछल कर बॉल को कैच कर लिया। रोहित ने जैसे ही जोर-जोर से तालियाँ बजाईं कि उसके गाल कर मोहित का जोरदार चाँटा पड़ा। नाराज हुई मम्मी के पूछने पर वह कहता है कि ये तो हमेशा लड़कियों को ही जिताता है। यानी बकरी जीतती है। यहाँ पाठक उद्वेलन की गिरफ्त में आ जाता है कि आज का बालमन किस दिशा है।
‘सन्नाटा‘ लघुकथा के अपने मायने हैं, जो एक किशोर मन से जुड़ी है। अखबार में खबर थी कि पुलिस भर्ती में बाईस महिलाएँ सफल हुईं। इसकी प्रतिक्रिया के रूप में कॉलेज में पढ़ने वाला लड़का कहता है– ”चलो करुणा, ममता, संवेदना मिलेंगी।” ”किसको मिलेंगी”, माँ ने तल्ख स्वर में पूछा। कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के ने जो जवाब दिया, उससे समूचे परिवेश में सन्नाटा छा गया। वो कहता है– ”अपराधियों को मिलेंगी।” पाठक यहाँ खुद सन्नाटाग्रस्त हो जाता है कि आधुनिक बौद्धिकता का ह्रास यहाँ तक आ पहुँचा है।
प्रबोधकुमार गोविल की लघुकथाएँ भाषा और शैली की दृष्टि से तो सम्पन्न हैं हीं। कथानकों के चयन और उसकी बुनावट की दृष्टि से भी काबिलेतारीफ हैं। हर लघुकथा का अपना तेवर और निर्वाह है। उनकी लघुकथाएँ व्यक्ति, समाज और परिवेश तीनों की समीक्षा करती हैं। पाठकों को सीधे-सीधे अपने साथ रखती हैं। उन्हें भटकने नहीं देतीं। वे संवेदनशील, जीवंत और जिजीविषा लिए हैं।
रत्नकुमार सांभरिया, भाड़ावास हाउस,सी-137, महेश नगर,जयपुर-302015
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