प्रात: 7.30: फैक्टरी गेट पर लंबी लाइन में लगा। ठेकेदार और सुरक्षकर्मी को ‘कागज’ दिखाकर पास बनवाया।
7.40: ऑॅफिस तक पहुंचा। दरवाजे पर ही अहंकारी और असभ्य अधीक्षक की कर्कश जिज्ञासा- ‘‘गधा कहीं का! इतनी देर लगाता है आने में?’’ का मूक मुस्कान से उत्तर दिया। स्टाफ के लोगों के समवेत आदेशों (सफाई कर, ठंडा पानी पिला, यह फाइल पहुँचा, वह डिस्पैच ले जा, स्टेशनरी ला, कूलर की टंकी भर, इलेक्ट्रीशियन को पकड़ ला…और यह…और वह) का गुर्राहटों, भुनभुनाहटों और धमकियों के बीच भरसक पालन किया।
8.30: बड़े साहब के आदेश पर कंप्यूटर–कक्ष में प्रवेश किया। तीन फैक्स और पाँच सूचियों को बारह बजे तक तैयार करने का आदेश लेकर काम शुरू किया।
9.30: बड़े साहब के चेम्बर में मीटिंग शुरू हुई। कैंटीन से चाय–नाश्ता लाकर पेश किया। स्टाफ को ठंडा पानी पिलाया। डिस्पैच बाँटी।
10.00: कंप्यूटर पर काम शुरू किया।
10.45: बिजली चली गई।
11.00: छोटे साहब का चेक बैंक में जमा किया और अधीक्षक की रजिस्ट्री के लिए डाकघर का फेरा लगाया।
11.30: बिजली आ गई।
11.35–12.30: कंप्यूटर पर काम किया।
दुपहर: 12.40: लंच करने बैठा।
12.55: बड़े साहब ने भागते हुए आकर 3 बजे होने वाली अर्जेण्ट मीटिंग की जानकारी दी और प्रेजेंटेशन बनाने के काम में जुटा दिया।
2.45: मंझले साहब की विवाह–योग्य कन्या का बायोडेटा तैयार किया।
3.30: पानी और डिस्पैच के बाद ट्रॉली से तीन खेप में शॉप फ्लोर में उपकरण पहुँचाए।
शाम: 4.25: छुट्टी से पहले हाथ–मुँह धोने के लिए नल पर गया। लौटने पर बड़े साहब ने बताया कि हेड ऑफिस को अर्जेंट जाएगी। छुट्टी के बाद रुकना है।
4.30: कैंटीन से ‘कर्टसी स्नैक्स’ लाकर बड़े साहब के कमरे में सजा दिए। ‘स्नैक्स’ लाजवाब थे–ब्रेड–जैम और बटर टोस्ट,
पैटीज़ पकौड़े, बिस्किट, सेब और केले । कंप्यूटर पर रिपोर्ट बनाने बैठा।
6.15: रिपोर्ट के फाइनल ‘प्रिट आउट’ फैक्स रूम में पहुँचाए। बड़े साहब ने हँसकर ‘थैक यू’ जताया और सुबह जल्दी आने को कहा।
6.20: छोटे साहब ने रोका और स्नेहपूर्ण आग्रह के साथ स्नैक्स का एक भारी पैकेट दिया। उसमें पकौड़े और केले हैं। पकौड़े में मिर्चें ज़्यादा थीं या…आँसू पोंछते हुए सब खा गया हूँ–दो केलो के सहारे, जो दबे गले सही,पर मीठे हैं।
हंस:दिसंबर 2001
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