चोरी-छिपे फोन पर दोनों घण्टों बतियाते। हाल-चाल पूछने के बाद, एक-दूसरे की दिनचर्या की पड़ताल करते और बातों का यह सिलसिला दोनों के ही माता-पिता के उनकी शादी के खिलाफ होने पर आ उलझता। खीझकर दोनों बुझे मन से अगली रात बात करने का वायदा करते और फोन कट जाता। यह अमूमन हर रात ही होता।
इसका हल खोजने के लिए दोनों ने मिलने का फैसला किया। दोनों के घरों से समान-दूरी पर स्थित एक सुनसान पार्क में मिलना निश्चित हुआ। तय समय से पहले ही दोनों, वहाँ आ पहुँचे। हाय-हैलो की औपचारिकता के बाद कुछ क्षण, दोनों के बीच खामोशी पसरी रही। फिर लड़की ने पहल की, ‘‘मेरे पैरेंट्स को मेरी पसन्द-नापसन्द की कोई फिक्र ही नहीं है।’’
“मेरे भी….’’ लड़का, मानो लड़की के बोलने का ही इंतजार कर रहा था।
‘‘वे नहीं मानेंगे….’’ बोलते हुए लड़की सिर झुकाकर पैर के अँगूठे से जमीन पर लकीरें बनाती-बिगाड़ती जा रही थी।
‘‘दुनिया कहाँ से कहाँ आ गई है। और हमारे पैरेंट्स पता हनीं यह दकियानूसी सोच कब छोड़ेंगे?’’ लड़के के लहजे में कसैलापन था।
‘‘हम बालिग हैं फिर अपनी लाइफ के फैसले हम खुद क्यों नहीं ले सकते….?’’ कहते हुए लड़की ने लड़के के कन्धे पर सिर टिका दिया, पर उसकी आवाज़ में उदासी थी।
‘‘मैंने सोच लिया है। वे जो शहर की नई बस्ती में फ्लैट बन रहे हैं, शादी के बाद हम दोनों वही रहेंगे।’’ लड़के ने आसमान ताकते हुए, ढेर सारी हवा अपने फेफड़ों में खींच ली।
‘‘हाँ ठीक है! पर थर्ड फ्लोर से ऊपर मत लेना। लिफ्ट बंद हो गई तो मैं सीढ़ियों से ज्यादा नहीं चढ़ पाऊँगी।’’ शिकायती लहजे में बोलते हुए लड़की ने कहा। और फिर दोनों इस बात पर जोर से हँस पड़े।
‘‘सुनो! हम अपने बच्चे का नाम ‘आदि’ रखेंगे।’’ लड़की ने भी एक सपना बुना।
‘‘नहीं! मुझे तो एक छोटी-सी गुड़िया चाहिए।’’ इस बार लड़के ने लड़की को टोक दिया।
‘‘ठीक है! ठीक है! फिर हम उसे खूब पढ़ाएँगे, वह जो चाहे पढ़े, जो बनना चाहे बने।’’
‘‘हम्म!’’ इस दफा लड़के ने लड़की की हाँ में हाँ मिलाई।
‘‘वह अपनी जिन्दगी के सारे फैसले खुद लेगी।’’ लड़की लगातार कहे जा रही थी, ‘‘उसकी शादी….’’ तभी लड़के ने लड़की की बात फिर काटी।
‘‘….खूब खोज-बीन कर उसके लिए अच्छा-सा लड़का ढूँढेंगे…..बिल्कुल अपनी पसंद….’’ वह बात पूरी का पाता ,इससे पहले ही लड़की ने झटके से उसके कंधे से अपना सिर हटा लिया। लड़का हड़बड़ा गया।
लड़की सवालिया निगाहों से अब भी उसे घूरे जा रही है।