“अम्मा, बाबूजी का सन्देशा आया है। हमें शर्मा बाबू की दुकान पर बुलाया है।” तुलसी की बात सुनते ही अम्मा चौंक कर खड़ी हो गयीं।
“क्या हुआ, कौन सन्देशा लाया? हे भगवान क्या कुछ और दिन दिखाना बाकी रह गया!”
“नितिन से बुलवा भेजा है।” तुलसी अपने दुपट्टे की चुन्नटें सम्हालने लगी और अम्मा टूटी चप्पलों को पैर में डालकर देख रहीं थीं। जब से शहर आए हैं, तब से कहीं बाहर जाना ही नहीं होता। मुनीम की छोटी –सी नौकरी करने वाले नेतराम जी गाँव में विवाद के चलते अपनी दो बेटियों तुलसी, राधा और पत्नी सहित शहर के पाश इलाके के एक कमरे में किराए पर रहते हैं। परिवार का पेट बमुश्किल भरने के बाद कमरे का किराया शहर का खर्च उनकी कमर तोड़ रहे थे ,उस पर दो जवान बेटियाँ, पूरे इलाके के आँख की किरकिरी बनी हुई हैं। कमरे की एक-एक ईंट उनके दर्द की गवाह थी। नेतराम जी जहाँ भी शादी के लिए ,जाते दहेज का दानव उन्हें उल्टे पाँव लौटने को मजबूर करता।
दिन भर माँ-बेटी बाट जोहती कि कुछ अच्छी खबर आएगी ,पर शाम मनहूसियत का पैगाम लाती। कभी-कभी तो जी इतना भर आता कि कुछ खाकर सो जाएँ और रात भर टकटकी लगाकर सीलन भरी छत न ताकनी पड़े।
आज भी ऐसी ही एक और शाम थी। अम्मा तुलसी को लेकर बाहर निकल आईं। दोनों तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे पर अनिष्ट की आशंका इस कदर हावी थी कि रास्ता लम्बा हो गया। अम्मा ने दूर से ही देखा बाबूजी दुकान के एक छोर से दूसरे छोर तक तेज कदमों से चल रहे थे। तुलसी ने अम्मा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“माखन ये है हमारी बिटिया तुलसी, एम. ए. पास है। बड़ी होनहार है, इसको नौकरी वाला फॉर्म भरा दो और आज से ये कंप्यूटर भी सीखेगी।” बाबू जी की बात सुनते ही तुलसी की आँखे नम हो गईं; क्योंकि आज उसके जीवन की वो शाम थी ,जिसका एक अदद सवेरा भी है।
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