सुकेश साहनी

प्रथम पंक्ति की साहित्यिक पत्रिकाओं में कथादेश एकमात्र ऎसी पत्रिका है, जिसने लघुकथा को मंच प्रदान करते हुए पुरस्कृत लघुकथाओं के 17 ‘लघुकथांक’ प्रकाशित किए हैं। प्रतियोगिता -17 की पुरस्कृत लघुकथाओं का अंक पाठकों के हाथ में है और प्रतियोगिता -18 की घोषणा की जा चुकी है। लघुकथा की विकास-यात्रा में हरिनारायण जी का यह योगदान अविस्मरणीय रहेगा। इस प्रतियोगिता की एक और विशेषता यह रही है कि इसमें नए-पुराने सभी लेखकों ने प्रतिभागकर इस प्रतियोगिता की गरिमा बढ़ाई है।
लघुकथा प्रतियोगिता-17 के लिए लगभग बारह सौ लघुकथाएँ ई-मेल से प्राप्त हुईं,करीब 75 लेखकों ने डाक से रचनाएँ भेजीं। सदैव की भाँति बहुत ही कम लघुकथाओं को निर्णायकों के पास भेजने के लिए उपयुक्त पाया गया। बड़ी संख्या में प्राप्त लघुकथाओं में से केवल 21 का अंतिम चक्र तक पहुँचना, इस विधा में हो रहे लेखन के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न खड़े करता है।
लघुकथा प्रतियोगिता हेतु प्राप्त प्रविष्टियों का आंकड़ा भी यही कहता है की अच्छी रचनाओं की तलाश भूसे के ढेर में सुई तलाशने के समान है, संपादक-कथादेश हरिनारायण जी का पत्रिका हेतु प्राप्त होने वाली लघुकथाओं को लेकर भी यही अनुभव रहा है। लगभग पच्चीस साल पहले हंस के संपादक राजेंद्र यादव की इस सम्बन्ध में टिप्पणी देखें -लघुकथाएँ छोटी–छोटी….व्यंग्य वाक्यों को लेकर, विट को लेकर,….सौ–सवा सौ लघुकथाएँ हर महीने आती हैं और उनमें कहीं कोई गहराई, कहीं कोई छूनेवाली बात नहीं होती। यह बात थोड़ी–सी परेशान करने वाली है कि सौ लघुकथाएँ आपको हर महीने मिलें और उनमें से आप एक या दो बड़ी मुश्किल से चुन सकें। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक फॉर्मूला-सा बन गया है,एक अंतर्विरोध : नाम दयानंद है,जो बड़े क्रूर हैं। राजनेता आदि भ्रष्टाचारी हैं…यानी इस तरह के बड़े दो–तीन फॉर्मूले बन गए हैं। वह जो अन्वेषण की कृति होती है, कला के साथ जुड़ी होती है,वह मेरा खयाल है कि बहुत कम लोगों में है। इनको संकलित करने और सामने लाने के प्रयास जरूर हुए हैं और उनसे लघुकथा का आइडिया मिल रहा है। सुकेश साहनी बहुत अच्छी लघुकथाएँ लिखते हैं। बलराम ने पूरा विश्व लघुकथाकोश तैयार कर दिया है। इस तरह उनके रूप तो सामने बहुत आए हैं; लेकिन गंभीरता से लेखकों ने लघुकथा विधा को लिया हो, ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। उम्मीद करूँगा चैतन्य से कि वे लघुकथा में ही महारत हासिल करें, क्योंकि यह क्षेत्र एकदम खुला हुआ है। एकदम खाली है।
(अवसर : आर्य स्मृति साहित्य सम्मान 2000)
पिछली प्रतियोगिताओं की टिप्पणियों में इसके पीछे निहित कारणों की पड़ताल की जाती रही है। रचना और लघुकथा के अंतर को न समझते हुए प्रतिभागियों द्वारा रचनाएँ भेजी जाती हैं,उनमें बहुत कम लघुकथा की श्रेणी में आती हैं। परिणाम स्वरुप प्रतियोगिता हेतु विचारार्थ लघुकथाओं की संख्या काफी कम हो जाती है। यहाँ इस बिंदु पर विष्णु प्रभाकर जी का वक्तव्य सभी नए-पुराने लेखकों के लिए आँख खोलने वाला हो सकता है –
मैंने 1939–40 से लघुकथाएँ लिखी हैं। तब वह दार्शनिक अंदाज की भी थीं, साधारण भी थीं। मेरा एक लघुकथा–संग्रह, उसकी समीक्षा करते हुए ‘सारिका में एक समीक्षक ने लिखा था कि रचनाएँ बड़ी सुंदर हैं। कुछ तो बहुत ही सुंदर हैं, लेकिन ये लघुकथाएँ नहीं हैं। थीं सब लघु….लेकिन फिर जो उन्होंने लघु की व्याख्या की, वह यह कि भाषा कैसी होनी चाहिए। वह सब मैं नहीं कहूँगा। हाँ, एक बात उन्होंने कही कि जो बात लघुकथा में कही गई है, उसी के आधार पर कोई बड़ी कहानी न लिखी जा सके, वह लघुकथा है। खैर, हम जब लिखने लगे थे तो हमारे सामने उसकी कोई व्याख्या थी नहीं। मुझे याद हैं बहुत सारी लघुकथाएँ,सुनाई जा सकती हैं। जैसे मैंने एक लिखी थी : एक लेखक थे। वह लिख रहे थे अपने कमरे में बैठे हुए। पास में पत्नी बैठी हुई थी। वह पढ़ रही थी। अचानक घड़ी की ओर देखा : बारह बज रहे थे। पत्नी ने सोचा, खाने का वक्त हो गया है। चलो, रसोई में चलते हैं। रसोई की ओर बढ़ी, लेकिन फिर एक खयाल आया। मुड़ी और पति से बोली, ‘‘सुनिए जी, मैं खाना पकाने जा रही हूँ। बताइए, आपके लिए क्या बनाऊँ?’’ पति ने एकदम झुंझलाकर जवाब दिया, ‘‘तुम्हें मेरे साथ रहते हुए तीस साल हो गए। तुम इतना भी नहीं जान पाई कि मुझे क्या पसंद है!’’ तो पत्नी एकदम से बोली,‘‘आपको कलम घिसते हुए चालीस साल हो गए हैं; लेकिन आप इतना भी नहीं जान पाए कि पूछने का भी एक सुख होता है!’’
…..तो यह ठीक है। बड़ी अच्छी रचना है, लेकिन लघुकथा नहीं है। मैंने अपनी जो लघुकथाएँ लिखी थीं 1939–40 में….और जो बाद में अब लिखीं, उनमें बड़ा अंतर है। भाषा का भी, भाव का भी।
विष्णु प्रभाकर जी की टिप्पणी उद्धृत करने का उद्देश्य यह है कि उनके जैसे लीजेंड साहित्यकार ततकालीन सन्दर्भों में बहुत विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि सभी लघु आकार की रचनाएँ लघुकथाएँ नहीं होतीं,जबकि वर्तमान में प्रतियोगिता हेतु प्राप्त बहुत सी लघु रचनाएँ लघुकथा की श्रेणी में आती ही नहीं। लघुकथा के नाम पर वक्तव्य,घटनाएँ,चुटकले,गद्य गीत, बोध कथाएँ,संवाद,संस्मरण और कहानियाँ भेजने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा,जबकि इस ओर बराबर ध्यान आकर्षित किया जाता रहा है।
सशक्त लघुकथाओं के अनेक संग्रह उपलब्ध होते हुए भी लघुकथा के आकार प्रकार को लेकर नए लेखक भ्रमित क्यों हैं? इसके लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लेखक, समूह और पत्र-पत्रिकाओं की अप्रोच जिम्मेवार हैं। अभी-अभी फेसबुक पर एक पोस्ट देखी- क्या चार-पाँच संवाद एक लघुकथा हो सकते हैं? इस तरह के सवाल उछालकर लघुकथा को पीछे ही ढकेला जा रहा है ,इससे नया लेखक भ्रमित ही हो रहा है। । कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता-15 में लघुकथाओं के साथ प्रकाशित आलेख – ‘लघुकथा में ‘कथा’ की अनुपस्थिति का बढ़ता संकट’ में इसपर विस्तृत चर्चा की जा चुकी है। दूसरे साथी भी गाहे-बगाहे इस पर लिखते रहते हैं। यह लेख गद्यकोश,लघुकथा डॉट कॉम में पढ़ा जा सकता है। इस संदर्भ में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु कहते हैं -‘संवाद यदि पूरी तरह अनुस्यूत न हों ,संवादों में संवेदना की ऊष्मा न हो ,तो वे कथा की निर्मिति में सहायक नहीं हो सकते। एक समस्या और है, वह है-‘कथन’ (स्टेटमैण्ट) को ही कथ्य समझने की। कहीं कुछ पढ़ा-सुना, बस उसी ‘कथन’ में कुछ जोड़ते चले गए, जिसका उस लघुकथा के कथ्य से कुछ भी लेना देना नहीं। वह अनर्गल प्रलाप करने वाले किसी भी सिरफिरे के कथन का कोई बेतुका अंश भी हो सकता है। किसी की बेसिर -पैर की टिप्पणी भी हो सकती है। अच्छे रचनाकार को इस व्यामोह से बचना चाहिए।’
इधर पत्र-पत्रिकाओं द्वारा आकार में बहुत छोटी और विस्फोटक अंत वाली लघुकथाओं की माँग बढ़ी है। उन्हें रचना के कॉन्टेंट से कोई लेना देना नहीं होता,अपने पास प्रायः उपलब्ध रहने वाले स्पेस को भरकर तत्काल पेज को फाइनल करना उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। रचना का अंत नुकीला,धारदार और विस्फोटक बनाने के प्रयास में बहुत- सी महत्त्वपूर्ण कथ्यवाली रचनाओं की हत्या कर दी जाती है। इसी प्रकार विषय देकर लेखकों से फटाफट लघुकथाएँ लिखवाने की प्रवृत्ति भी लघुकथा के वर्तमान स्वरूप को क्षति पहुँचा रही है। इधर ‘पोस्टर लघुकथा’ के बारे में भी सोशल मीडिया में पढ़ने को मिला है। इस अभियान में 100 से कम शब्दों की लघुकथा ही शामिल की जाती है। लघुकथा को पाठकों तक पहुँचाने के लिए यह अच्छा प्रयास हो सकता है; बशर्ते इसमें शामिल होने की होड़ में सौ शब्दों से कम की लघुकथाएँ लिखनेवालों की बाढ़ न आ जाए। लघुकथा लेखन के वर्त्तमान परिदृश्य में ताबड़तोड़ लिखने वालों से यह खतरा बना हुआ है। इस अभियान की सफलता के लिए यह जरूरी है कि पिछले पचास वर्षों में सृजित उत्कृष्ट लघुकथाओं का जो भण्डार है, उन्हीं में से लघुकथाओं का चयन किया जाए।
लघुकथा ने अपनी विकास-यात्रा में सीढ़ी- दर -सीढ़ी चढ़ते हुए वर्तमान व्यक्तित्व (स्वरूप) ग्रहण किया है। इस विधा ने स्थापित होकर वह मुकाम हासिल कर लिया है कि लघुकथा का नाम लेते ही उसकी छवि (image) आँखों के सामने आ जाती है। ठीक उसी तरह जैसे किसी वस्तु या जीव-जंतु का नाम लेते ही उसका चित्र आँखों के सामने आ जाता है।
आधुनिक (आज की )लघुकथा के इस स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए रवि बुले अमर उजाला में लिखते है – ‘‘किसी भी तरह के गैरइंसानी जज्बे के खिलाफ जो आक्रामकता लघुकथाओं में देखने को मिलती है, वह हिंदी की कहानियों में यदा-कदा ही दिखाई पड़ती है, वह भी लंबी पड़ताल के बाद। कहानी और जीवन के वे मूल्य, जो सामान्य आकार वाली और लंबी कहानियों से लापता है,इन लघुकथाओं में सहज ही दिखाई पड़ते हैं। विषय की विविधता यहाँ है। आम आदमी के दुःख-दर्द, उसका आक्रोश, उसकी हताशा,उसकी उम्मीदें, जटिल और घात-प्रतिघात के समय में भी सांस लेती उसकी मानवीयता तथा जिजीविषा इन लघुकथाओं में ध्वनित है। यही नहीं ये लघुकथाएं भूमंडलीकरण, जातिवाद, सांप्रदायिकता और हथियारों को होड़ जैसी विश्वव्यापी समस्याओं को भी पूरी संवेदनाओं साथ रेखांकित करती हैं।’’(सन्दर्भ :बीसवीं सदी की प्रतिनिधि लघुकथाएँ:संपादक सुकेश साहनी)
प्रतियोगिता हेतु प्राप्त लघुकथाओं में से कुल 21 लघुकथाओं का चयन निर्णायकों के पास भेजने हेतु किया जा सका। निर्णायकों (कथाकार जितेंद्र भाटिया ,आलोचक हिमांशु पंड्या और कथाकार सुकेश साहनी) द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर दस लघुकथाओं का पुरस्कृत करने हेतु चयन किया गया –
(1)मकड़ी(सुषमा गुप्ता), (2)बच्चे का जन्मदिन(प्रदीप मिश्रा), (3)पीड़ा(कविता मुकेश), (4)नसबंदी(मंजू किशोर ‘रश्मि ‘), (5)आर्द्रता (सुरेश सौरभ), (6)साल दर साल (उपमा शर्मा), (7)बम्मड़(राम करन), (8) जूण (शील कौशिक), (9)अँगूठा(पूनम मनु), (10)खुदा खैर करे(छवि निगम)।
कथादेश परिवार और निर्णायकों की ओर से पुरस्कृत सभी लघुकथा लेखकों को हार्दिक बधाई!
अंतिम चक्र तक पहुँची अन्य लघुकथाओं का विवरण निम्नवत् है –
गन्दी आदत(राबिक सदा),प्यास की जाति(हरभगवान चावला),महिमा(भगवन वैद्य ‘प्रखर’),अंतर(इंद्रजीत कौशिक),टोटो की सवारी(उदित कुमार तिवारी),गली में(गोविन्द शर्मा),जीवन प्रमाण(अतुल मिश्रा),स्टार्टअप(आशा शर्मा),देह दक्षिणा(मुकेश पोपली),सन्देश(पूनम चंद्रलेखा)।
अंतिम चक्र तक पहुँची लघुकथाओं का प्रकाशन कथादेश के सामान्य अंकों में करने का प्रयास किया जाता है, स्थानाभाव एवं अन्य कारणों से इसके प्रकाशन में लेखक की अपेक्षा से अधिक समय लग सकता है। इस सम्बन्ध में कोई जानकारी भी दे पाना संभव नहीं होता; अतः जो लेखक रचना का अन्यत्र उपयोग करना चाहते हैं, संपादक-कथादेश को अवगत करते हुए कर सकते हैं।
प्रथम स्थान के लिए पुरस्कृत सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘मकड़ी’ अपनी अर्थगर्भी संरचना के कारण अन्य पुरस्कृत लघुकथाओं से अलग खड़ी दिखाई देती है। रोजमर्रा के जीवन में हमारे साथ बहुत कुछ ऐसा घटता है, जिसे हम नजरअंदाज कर देते हैं या कहें कि उसमें कुछ भी ध्यान देने लायक नहीं लगता है। जैसे इस कथा में बिस्तर के पास आती नन्ही-सी मकड़ी को मार दिया जाता है। ऐसा या इससे मिलता जुलता वाकया कभी न कभी हम सबके साथ घटता है। सभी रचनाकार इसमें किसी कथा के बीज नहीं देख पाते। इस घटना पर सर्जक द्वारा किए गए मंथन से रचना खुलती है। संवादों द्वारा किस प्रकार कथ्य-विकास किया जा सकता है, सुषमा गुप्ता कि लघुकथा में देखा जा सकता है। पुरुष स्त्री से पूछता है कि मकड़ी तुमसे ताकतवर थी? स्त्री जवाब देती है, ‘‘अरे नहीं! कमजोर-सी थी। एकदम जरा-सी।” पुरुष स्त्री का ध्यान इस विरोधाभासी बात की ओर आकर्षित करता है कि कमजोर-सी मकड़ी थी, फिर भी वह उससे डर रही थी।
यहाँ रचना पाठक को और गहराई में ले जाती है, यह संवाद पूरी कथा को मायने देता है,अपनी सृजन प्रक्रिया के दौरान इतना अर्थगर्भी संवाद रचने के लिए सुषमा गुप्ता को बधाई –
मैंने ऊहापोह से कहा, “उसकी उपस्थिति मेरे सुकून में खलल थी…शायद…”
उसने गहरी साँस छोड़ते हुए हाथ का अखबार नीचे पटक दिया और बेहद निराश होकर कहा, “डरे हुए लोग ही अक्सर हमलावर होते हैं। “
लघुकथा चमोत्कर्ष पर समाप्त होती है-
मेरी नज़र अख़बार की हैडलाइन पर अटक गई।
“भ्रष्टाचार के विरोध में रैली निकालते, यूनिवर्सिटी के छात्रों पर प्रशासन ने निर्ममता से लाठियाँ भाँजीं।”
निर्णायकों के सम्मलित अंकों के आधार पर प्रदीप मिश्रा की लघुकथा ‘बच्चे का जन्मदिन’ दूसरे स्थान के लिए चयनित हुई। यह देखकर ख़ुशी होती है कि लघुकथा लेखक ने नए अंदाज़ में साधारण से विषय को सम्प्रेषित करने का सफल प्रयास किया है। बस में यात्रा कर रहे युवक का ध्यान अपने सामने की सीट पर बुझी-बुझी निढाल-सी बैठी युवती की ओर चला जाता है,पूरी लघुकथा उसकी इसी ऑब्जरवेशन पर आधारित है। इस दौरान मोबाइल से हो रही बातचीत से वह जान जाता है कि युवती का एक बेटा है, जिसका आज जन्मदिन है। पति है नहीं या ब्रेकअप हो चुका है। वह आर्थिक रूप से भी तंग है, बच्चे के स्कूल की फीस भी जमा नहीं हुई है।
कुछ विद्वान समीक्षक मानते हैं कि आकारगत लघुता के कारण लघुकथा में चरित्र-चित्रण की गुंजाइश नहीं होती। इस लघुकथा से सिद्ध होता है कि लघु कलेवर में भी यह संभव है। कथा से स्पष्ट है कि बच्चे के जन्मदिन से ऊपर उस माँ के लिए कुछ भी नहीं है। तीन स्थितियों में इसे देखा जा सकता है –
एक –
इतने में उसका मोबाइल फोन बज उठा। उसने बड़े अदब से फोन उठाया और यस सर…. जी सर….. एक बार और मौका दीजिए, डील क्रेक कर दूँगी आदि –आदि बोल रही थी। मैं समझ गया था कि उसके बॉस का फोन था।
दो –
शायद फिर उसके बॉस को फोन था। बात का वही पुराना लहजा था। शायद वह कहीं किसी क्लाइंट मीटिंग की बात कर रहा था। वह यह समझाने की कोशिश कर रही थी कि आज उसके बच्चे का जन्मदिन है। बात खत्म होते-होते उसने कहा –”ठीक है। मैं अपना इस्तीफा भेज दूँगी।”
तीन –
वह बस से फटाफट उतर कर दूसरी बस की लाइन में लग गई। अपनी बस में बैठा मैं देख रहा था, वह लाइन में खड़े-खड़े वह अपने पर्स के मिरर में देखते हुए अपना चेहरा और बाल सँवार रही थी। देखते-देखते उसने अपने को एक प्रोफेशनल की तरह तैयार कर लिया था।
लेखक ने जहाँ एक ओर महानगर में संघर्षरत महिला के चरित्र के उजले पक्ष को प्रस्तुत किया है, वहीं दूसरी ओर मल्टीनेशनल कंपनियों के अमानवीय ,हृदयहीन व्यवहार की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।
तीसरे स्थान के लिए पुरस्कृत लघुकथा ‘पीड़ा’ में कविता मुकेश ने बिलकुल नया विषय उठाया है। रचना के अंत तक आते- आते पाठक यशोदा देवी की पीड़ा को कहीं गहरे तक महसूस करता है। रामरख जैसे पति हमारे देश में घर-घर में मिल जाएँगे। ऐसे पति अपनी पत्नी को घर में काम करने वाली नौकरानी से ऊपर कुछ नहीं समझते। रामरख ने घर -परिवार के सभी खर्चों का जिम्मा अपने पर ले रखा है,पत्नी के हाथ में कभी पैसे नहीं देते हैं। यहाँ तक कि दो महीने बीमारी में बिस्तर से न उठ पाने की स्थिति में भी पैसे का हिसाब-किताब खुद ही करते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनके मित्र हरिहर जी फैमिली पेंशन के कागज यशोदा जी से साइन करवाते हैं।
यशोदा देवी जीवन में पहली बार बैंक के दर्शन करती हैं। उनके नाम से पहला बैंक खाता खुलता है। पुराना खाता बंद कराकर हरिहर जी उन्हें बीस हज़ार रुपये निकलवाकर सौंप देते हैं।
अपने छोटे से बटुए में रुपये ठूँसते हुए यशोदा देवी की ऑंखें गीली हो जाती हैं। बीच-बीच में हरिहर जी को उनकी एकाध सिसकी भी सुनाई दे जाती है।
“भाभी जी, जो होना था, हो गया। पोते-पोतियों वाले थे। थोड़ी हिम्मत रखो।” हरिहर जी ने उन्हें दिलासा देते हैं।
यशोदा जी को उनकी बात ठीक ही लगती है। बीते तीन महीनों में वह अपने आप को काफ़ी सँभाल चुकी है। आज फिर से कौन सा पुराना दर्द ऐंठने लगा है, यह वह ख़ुद भी ठीक से नहीं समझ पाती हैं।
मंजू किशोर ‘रश्मि’ की लघुकथा ‘नसबंदी’ चौथे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई। यह लघुकथा विचलित करती है,आघात पैदा करती है। कुछ उसी तरह जैसे टी वी पर कुछ हादसों के फोटोग्राफ़्स धुँधले करते हुए एंकर सचेत करता है कि ये चित्र आपको विचलित कर सकते हैं।
लघुकथा में भीख माँगकर जैसे-तैसे जी रहे माँ और जवान बेटी कि व्यथा कथा है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाकर माँ नर्स के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहती है -”बहन जी हम भिखारी हैं। इधर-उधर माँगकर, यहाँ-वहाँ पड़े रहकर अपने दिन काट लेते हैं ; लेकिन मेरी इस पागल लड़की की जवानी का क्या करें। मरें या जिएँ। शहर के धोलपोशों के मनचले रात दारू पीकर आते हैं और चाकू या कट्टा दिखाकर इसे उठा ले जाते हैं।”
…………….
”हाँ बहन जी। दो बार बच्ची जन चुकी है यह। दोनों बार मैं उनको पालनाघर में रख आई।” उसकी रुलाई छूट जाती है।
अंत में भिखारिन (माँ) सिस्टर से प्रार्थना करती है,”बहन जी, रोज-रोज का क्लेश मिटे, इस लड़की की नसबंदी कर दो। ”
रचना प्रश्न खड़े करती है, हम किस समाज में जी रहे है? …जहाँ छोटी बच्चियों से आए दिन बलात्कार हो रहे हैं,एक भिखारिन माँ अपनी जवान बेटी के लिए वहशी-दरिंदों के डर से थक-हारकर ‘नसबंदी’ जैसा समाधान तलाश रही है।
सुरेश सौरभ की ‘आर्द्रता’ पाँचवें स्थान हेतु पुरस्कृत हुई। अपनी सीधी,सरल बुनावट के साथ लघुकथा यह सम्प्रेषित करने में सफल हुई है कि समाज में राजनैतिक कारणों से जब विवाद उग्र रूप ले लेते है, दंगों में तब्दील हो जाते हैं तो गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाला आम आदमी (जिसका इन सबसे कोई लेना देना नहीं होता) किस कदर डरा रहता है, असहाय महसूस करता है।
इतिहास के प्रवक्ता ने कक्षा में पढ़ाया – ‘खुदाई से प्राप्त जो अवशेष मिलते हैं, उससे हमें अपनी पुरातन सभ्यताओं का पता चलता है कि हम कितने सभ्य थे, हमारी संस्कृति कैसी थी..’
नदीम घर लौटता है, तो मास्टर जी का लैक्चर उसके दिमाग में नाचता रहता है और यह भी कि सरकार को खुदाई कराने से क्या मिलता है? वह इस बारे में अब्बू से पूछता है, तो थप्पड़ खा जाता है।
बच्चे के अब्बू अम्मी किस कदर डरे हुए हैं-
बच्चे का रुदन सुनकर अम्मी आ जाती है वहाँ।
वह कहती है -‘‘अरे अरे! गुस्सा क्यों हो रहे हो, खामखाँ बच्चे पर।’’
‘‘बेवजह सिर खा रहा था।’’
“सुन रही थी क्या सिर खा रहा था। हुँह बच्चा है, आपसे मुझ से नहीं पूछेगा, तो किससे पूछेगा? यार की झाड़ भतारे पर..’’
‘‘तू तो जानती है कि बच्चे पर गुस्सा न था पर……’’
“हाँ जानती हूँ। अखबार मैं भी पढ़ती हूँ। खुदा की खुदाई पर भरोसा रखो बस।’’ आर्द्र कण्ठ से वह बोली।
सिप सिप…चाय पीने लगा वह, पत्नी के गले की आर्द्रता, अब पति के गले से नीचे, चाय के साथ उतरने लगी।
यह लघुकथा इसलिए भी अपने उद्देश्य में सफल हुई है क्योंकि लेखक ने किसी विशेष स्थान पर घटी घटना से तत्काल प्रभावित होकर नहीं लिखा है,वैचारिक मंथन और लेखकीय दायित्व के साथ यह कथ्य उपजा है। प्रत्येक लघुकथा का अंत पैना और धमाकेदार हो, यह कतई जरूरी नहीं। इस लघुकथा का समापन कथ्य के अनुरूप है,इसी रूप में प्रभावकारी है।
छठे स्थान के लिए पुरस्कृत उपमा शर्मा की लघुकथा ‘साल दर साल’ अति महत्त्वपूर्ण विषय वस्तु के कारण अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज़ कराने में सफल रही है। साल दर साल मानवीय मूल्यों का विघटन और छीजता पर्यावरण आज की हकीकत है। डायरी शैली में लिखी गई यह रचना लगभग साठ सालों के विकास (?) की बात करती है।
सन 1960-65 में धरती में हरियाली है, नहरों में पानी है, पानी भरे कलसे सिर पर रखे घर लौटती युवतियाँ हैं। 2005-15 में घर का बेटा पढ़- लिखकर बाबू हो जाता है,गाँव उसे पसंद नहीं,यहाँ उसका दम घुटता है,वह पत्नी को लेकर शहर चला जाता है। गाँव की जमीन पर फैक्टरी लग जाती है,बेटा खुश है ,विकास हो रहा है। गाँव की नदी-नहर का पानी फैक्टरी से निकलने वाले अनुपचारित पानी के कारण पूरी तरह प्रदूषित हो जाता है। कच्ची सब्जी और फलों में भी यह जहर घुल चुका है। यहाँ की हवा में भी अब कैमिकल्स की घुटन है। लोग कैंसर से मर रहे हैं।
मुझे लगता है 2018 में लिखा डायरी का यह पन्ना ही लघुकथा का चरमोत्कर्ष है –
मैं घर के दलान पर बैठी हूँ। मेरा दम बुरी तरह घुट रहा है। मैं दमे की मरीज़ हूँ। साँस उखड़ रही है। जाने कब भगवान का बुलावा आ जाए। यह क्या? बेटा -बहू और मेरा पोता भी खाँस रहे हैं। यह फैक्टरी से निकलते काले धुँए का गुबार हमें निगल रहा है। पूरा गाँव बंद मर्तबान बन गया है। हम मछली के जैसे तड़प रहे हैं। एक-दूसरे को बचाना चाहते हैं पर असहाय हैं। अब शायद तुझे न छू पाऊँ प्यारी डायरी।
विकास सम्बंधित बड़ी परियोजनाओं के कार्यान्वयन से पर्यावरण को क्षति न पहुँचे ,इसके लिए सभी जरूरी उपायों का प्रावधान किया जाता है ,पर इन पर ध्यान नहीं दिया जाता,कागज़ी कार्यवाही अवश्य हो जाती है। पर्यावरण को संरक्षित करने की दिशा में चलाए जा रहे ‘जागरूकता अभियान’ की दिशा में यह एक जरूरी लघुकथा है।
राम करन की लघुकथा ‘बम्मड़’ सातवें स्थान के लिए चयनित हुई। राम करन कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में पाँचवी बार पुरस्कृत हुए हैं। इनका चयन पहले से सातवें स्थान के लिए होता रहा है। इनकी पुरस्कृत लघुकथाओं के अवलोकन से स्पष्ट है कि वह इस विधा में गंभीरता से काम कर रहे हैं। विषयों की नवीनता इनकी अतिरिक्त विशेषता है। राम करन को चुस्त और अर्थपूर्ण संवादों से कथ्य-विकास में महारत हासिल है,पात्रों के हाव-भाव से रचना में कुछ अनकहे अर्थ(मियाँइन और बम्मड़ का प्रेम) पाठक तक सम्प्रेषित होते हैं –
(1) बेनिया की पोंपी से पीठ खुजलाते हुए बम्मड़ बोले –”हम तो कहते हैं मियांइन तुमको भी मुंबई चले जाना चाहिए था।”
“और जो अपने हाथों से ये घोंसला बनाया था, उसे खंडहर बन जाने देते।”
“कब तक जंजाल में रहोगी। मुंबई में होती तो ए. सी. में रहती। बेनिया नहीं झलना पड़ता।’’
(2)”तो तुम काहे नहीं गए?”
मियाँइन ने कनखियों से बम्मड़ को देखा। बम्मड़ कभी दाएँ होते तो कभी बाएँ। लेकिन उनका हाथ उनकी पीठ तक नहीं पहुँच पा रहा था। बम्मड़ उसी रौ में बोले –“हम तो बम्मड़ हैं। वहाँ जाकर पिजड़े में बंद नहीं हो पाऊँगा….बहुत घुटन होती।”
“ऐसे तो खुजली नहीं मिटने वाली…. वहाँ होते, तो पोते से कहकर पीठ खुरचवा लेते।”
(3)- मियाँइन बोली –”देखें पीठ।”
“ये भी दिन आ गया कि पीठ दिखाना पड़ रहा है,” कहकर हँसते हुए बम्मड़ ने बनियान उठा दिया।
“पूरा पीठ घमौरियों से भरा है।”
बम्मड़ ने कुछ नहीं कहा। वह तो परमानंद में डूब गए। बस यही दोहराते रहे –”थोड़ा दाएँ – थोड़ा बाएँ…..थोड़ा ऊपर– थोड़ा नीचे…..। “
(4)”तुम्हारा शुक्रिया कैसे करें मियाँइन….। ”
“शुक्रिया की जरूरत नहीं है। ये लो….। “
कहकर मियाँइन ने कंघी बम्मड़ को पकड़ा दिया और अपनी कमीज पीठ के ऊपर कर दिया।
शील कौशिक की लघुकथा ‘जूण’ आठवें स्थान पर रही। लेखिका ने तीन स्थितियों को केंद्र में रखकर लघुकथा में कुछ जरूरी सवाल उठाए हैं। पुरुष मानसिकता पर प्रहार करते हुए स्त्री की विवशता का प्रभावी चित्रण हुआ है।
पहली स्थिति-(मादा कुकर को देखकर)-“हे भगवान! फिर से पेट से है यह तो। अभी कुछ दिन पहले ही तो जने थे पूरे छह पिल्ले… दुम हिलाते नर कुत्तों से हर वक्त घिरी रहती थी। बेचारी की जूण ही ऐसी है, क्या करे?”
दूसरी स्थिति- (बाई कमला का बढ़ा पेट देखकर)-“सुना है अब जो इसका पति है, वह चाहता है कि उसका खुद का भी बच्चा हो। तीन-तीन आदमियों के साथ रहकर भी एक भी पति नहीं। बेचारी के चार बच्चे पहले और दूसरे पति से हैं। दोनों ही आदमी उसे छोड़ कर जा चुके हैं और बच्चों के लालन-पालन के बोझ में रात दिन घरों में बर्तन, झाड़ू-पोंछा करके यह मरी जा रही है। इन बेचारी कामवालियों की जून ही ऐसी है।”
तीसरी स्थिति– (अपने अंतर्मन को टटोलते हुए)-‘लड़के की चाह में उसके भी तो न चाहते हुए चार बच्चे हो गए। नहीं…नहीं… मादा कुकर की नहीं, कमली की नहीं, स्त्री की जूण ही ऐसी है।’
दूसरी स्थिति का चित्रण बहुत मार्मिक है, लघुकथा पढ़ने के बाद बाई कमला की बाहर निकली ऑंखें ,कमजोर व पीली पड़ी काया देर तक मस्तिष्क में हॉण्ट करती रहती है। कमला उन आधुनिक, पढ़े -लिखे लोगों में नहीं है, जो शौकिया या किसी उद्देश्य के तहत लिव -इन में रहते हैं और जब चाहा ब्रेक अप कर लेते हैं। बाई कमला को शादी का झाँसा देकर ठगा जाता है। दो- दो बार ठगी जाती है। दोनों मर्द शादी करना तो दूर, बच्चों से भी किनारा कर निकल लेते हैं। अंततः कमला की शादी होती है,लेकिन यहाँ फिर मर्द को कमला से अपने खून से जन्मा बच्चा चाहिए होता है। इस मार्मिक और झकझोरे देने वाली स्थिति के चित्रण के कारण यह लघुकथा विशिष्ट हो जाती है।
नौवें स्थान के लिए पूनम मनु की ‘अँगूठा’ लघुकथा पुरस्कृत हुई है। कथा प्रधान इस लघुकथा में उस अभिजात वर्ग के उस तबके को आईना दिखाया गया है,जो साधारण वेशभूषा वालों को नीची निगाह से देखते हैं, उनका अपमान करने से भी नहीं चूकते। साधारण-सी वेशभूषा में एक बुजुर्ग महिला पैसे निकलवाने बैंक आती है। चश्मा घर छूट जाने के कारण फार्म किसी दूसरे से भरवाती है। वहाँ उपस्थित एक दूसरी मॉडर्न स्त्री उसका मखौल उड़ाते हुए उसे अँगूठा-छाप कहती है।
लघुकथा के लिए कोई घटना ही कच्ची सामग्री होती है। उसे अंतिम रूप देते हुए लेखक कल्पना का सहारा लेता है,यहाँ अक्सर असावधानी या हड़बड़ी के कारण चूक हो जाए, तो लघुकथा अविश्वसनीय प्रतीत होती है। अँगूठा में लेखिका ने मॉडर्न स्त्री से बायोमैट्रिक के तहत बैंक द्वारा अँगूठा लगवाने को कहने से रचना का गठन बहुत स्वाभाविक हो गया है।
दसवें स्थान के लिए छवि निगम की ‘खुदा खैर करे’ पुरस्कृत हुई है। छवि निगम लघुकथा के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है,’लिहाफ’ सहित उनकी कई रचनाएँ चर्चित हुई हैं। प्रतियोगिता के परिणाम की घोषणा पर छवि निगम की टिप्पणी उनकी फेसबुक वाल पर देखने को मिली –
प्रतिष्ठित कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में जब पहली बार अपनी रचना भेजने का मन हुआ, तो साथ ही इस बार ख़ुद को ही अपनी जानी मानी शैली वाले कंफर्ट ज़ोन से निकालने की चुनौती देने का भी मन हो आया। इस जद्दोजहद में पहली बार सामाजिक सरोकारों में रची हास्यरंजित व्यंग्यात्मक लघुकथा ‘खुदा ख़ैर करे’ लिखने का कर्म किया और फल की चिंता किए बिना उसे भेज भी दिया प्रतिष्ठित कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में। सुखद है कि बेहद योग्य रचनाकारों के बीच मेरी इस ‘ज़रा हटकर’ लघुकथा को भी सम्मान प्राप्त हुआ। मुदित हूँ, कृतज्ञ हूँ।
लघुकथा ‘खुदा खैर करे’ के बारे में जो टिप्पणी करना चाह रहा था, वह छवि निगम की उपर्युक्त टिप्पणी में निहित है। उनके इस प्रयोग को तीन निर्णायकों द्वारा पसंद किया गया, तभी लघुकथा पुरस्कृत हुई है। लघुकथा के समापन का आनंद आप यहाँ भी ले सकते हैं-
उधर फ़ोन को हवा में लहराती चाची विस्फ़ोट कर रही थीं, ‘‘काहे हमीदन, तुम्हारे करेले के हलुए को लाइक किए थे न हम,और शीला तुम्हारे चैनल को हमही सस्क्रैब अउर शेयर किए थे न, जिसमें तुम रुमाल से कुर्ता बनाने की तरकीब बताई थी? और रजिया, तुमाए कित्ते फालोअर बढ़ाए हम..और अनीता, स्टेला तुम..तुम..’’ कहते उनका गला रुँध गया, “का सिला दीं तुम सब? घण्टा भर हो गया हमें अपनी फोटू डाले…पर तुम लोग झाँके तक नहीं। दुसमन कहीं की। अब छोड़ ही देंगे ये सोसल- वोसल सब..कहे देते हैं।”
सब सखियां भूलसुधार में जुटीं, और चाचा मुस्कुराते हुए वापस अपने खटिया रूपी सिंहासन पर चढ़े, और एक बार फ़िर फ़ोन में डूब गए। तभी चाची की सस्पेंसफुल आवाज़ आई, ‘‘अर्रे ई का..जे तुम्हारे चच्चा…इस लालमुँही पर लाल दिल कइसे चेंप दिए हैं ??”
‘खुदा ख़ैर करे’ विषयवस्तु की नवीनता और संवादों की सहजता से पाठक का मन मोह लेती है। सोशल मीडिया केवल कुलीन वर्ग का ही मंच नहीं है, वरन् इसमें चाची जैसे जनसामान्य वर्ग की भी सक्रिय भागीदारीहै। टकसाली भाषा से दूर, जिस जीवन्त और रोजमर्रा की भाषा के संवाद लघुकथा में आए हैं, वे बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। चाची के चरित्र को संवाद जीवन्त कर देते हैं। संवादों की तीव्रता पाठक को बाँध लेती है।
और अंत में
कथादेश प्रतियोगिता –17 में पुरस्कृत सभी लघुकथाएँ कथा प्रधान हैं। इनमें कथ्य प्रकटीकरण के लिए कुछ सार्थक प्रयोग भी किए गए हैं। ये प्रयोग लघुकथा के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में लघुकथा लेखन को महिलाओं ने गंभीरता से लिया है। उनके योगदान से विधा समृद्ध हुई है। इस प्रतियोगिता में भी दस में से सात लघुकथाएँ महिलाओं की हैं। 17 प्रतियोगिओं के माध्यम से लगभग 200 लघुकथाएँ पुरस्कृत हुई हैं। निर्णायक के तौर पर इन रचनाओं का चयन देश के प्रसिद्ध कथाकारों, आलोचकों ने किया हैं। यही कारण है कि गुणवत्ता की दृष्टि से ये लघुकथाएँ बहुत प्रभावित करती हैं।
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