प्रथम
राम करन
हार
जेठ की दुपहरी में बीच सड़क पर किसी के सैंडल का तल्ला निकला होगा तो मेरा कष्ट समझ सकता है। लेकिन मेरे साथ अच्छी बात यह थी कि मुझे दूसरी तरफ बैठा मोची दिख गया था। वह एक फल वाले ठेले के बगल में बैठ कर छाँव ढूँढ़ने का प्रयास कर रहा था। मैंने कहा -‘‘इसे गोंद से चिपका दो।’’ उसने प्रश्न किया – ‘‘सिल दूँ?’’ मैंने कहा, ‘‘नही भाई, लुक बिगड़ जायेगा।’’ उसने अंगुली से इशारा करते हुए कहा – ‘‘वहाँ चले जाइये। हो जायेगा।’’ मैंने तिलमिलाकर रह गया। जरा सा काम है। जब मैं कह रहा हूँ कि चिपका दो तो वह सिलने पर आमादा है। ऐसी हालत में वहाँ जाना एक सजा था। मैंने पूछा -‘‘क्यों? तुम नही कर सकते?’’ उसने पुनः अँगुली से दिखाया – ‘‘बता तो रहा हूँ कि वहाँ चिपक जाएगा।’’ मैंने ध्यान से देखा। उसके पास दो पॉलिश की डिब्बी थी – एक काली, दूसरी लाल, एक निहाई, कैंची और कुछ चमरौधे बस। मैने प्रश्न किया -‘‘तुम्हारे पास गोंद नही है क्या?’’
उसने मुझे केवल देखा।
‘‘कितने में मिलेगा?’’
‘‘आप वहीं बनवा लीजिए।’’
‘‘ऐसे ही दुकान लगाए हो? जब सामान नही रहेगा ता कैसे कमाओगे। पचास रूपये में मिल जायेगा?’’
उसने हामी में सिर हिला दिया। मैंने उसे पैसे दिए तो वह गोंद लेने चला गया। मेरे अंदर कई सवाल उठ रहे थे। गुस्सा भी आ रहा था। वह आया तो मैंने पूछा – ‘‘कितना कमाये आज?’’
‘‘ उन्नीस रुपया।’’
‘‘इतने से घर चल जाता है?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘अनाज कैसे खरीदते हो?’’
‘‘खरीदना नही पड़ता। राशन कार्ड पर मिल जाता है।’’
‘‘सब्जी तो खरीदना पड़ता होगा?’’
‘‘आलू दस रुपये किलो है। एक दिन लाता हूँ दो दिन चलता है।’’
‘बच्चों को पढ़ाते हो या नही? फीस कैसे देते हो?’’
‘‘फीस नही देना पड़ता। सरकारी में हैं। खाना भी मिलता है।’’
वह मुझे हर दाँव पर पछाड़ रहा था। उसके पास जरा सा भी गुस्सा या असंतोष नही था। उसे देखकर मै झुँझला रहा था। मैने पूछा – ‘‘कभी फल वगैरह खाते हो?’’ इसबार मैं जानता था कि उसका उत्तर नकारात्मक होगा। वह बोला – ‘‘फल तो भाई साहब रोज ही खिलाते हैं।’’ उसने फलवाले को देखा और उसने हामी भरी। उसने कहा – ‘‘हो गया,’’ और सैंडल आगे कर दिया। वह शांत था और मैं उद्विग्न। मैंने पूछा – ‘‘कितना दूँ?’’
वह बोला – ‘‘जो मर्जी।’’
मुझे लगा उसने मुझे धोबी पाट दे मारा और मैंने चित्त था।
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द्वितीय
सविता इन्द्र गुप्ता
बड़ा कौन
काम के बोझ से असमय ही कुम्हलाते बच्चों को छुड़वाया गया था। बाल-श्रम अधिनियम का पालन करते हुए आज फिर एक कारखाने पर छापा पड़ा था। पकड़े गए सब बच्चे थाने के बाहर बैठे थे। एक-एक बच्चे से घर का पता पूछ कर उनके अभिभावकों को बुला, चेतावनी देकर बच्चों को उनके सुपुर्द किया जा रहा था। एक दस साल का बच्चा अलग को खड़ा सुबक रहा था,”बहन तो आँगनबाड़ी में खा लेगी लेकिन दिहाड़ी न मिलने से माँ भूखी रह जाएगी।”
“क्यों बे, तुझे घर नहीं जाना क्या ? तेरे बाप को बुलाना है, पता बता।” सिपाही ने कड़कती आवाज़ में कहा।
“बाप नई है साब। पिछले साल ट्रक ने कुचल दिया था।” बच्चे ने सुबकते हुए कहा।
“माँ है ? उसे बुला लेते हैं।” सिपाही ने कुछ नरम हो कर कहा।
“साब, माँ तब से पगला-सी गयी है जब से बापू मरा। ‘मुझे पुलिस ने पकड़ लिया है’ सुनेगी तो कहीं जान ही न दे दे।” बच्चे की सुबकियाँ अब रोने में बदलने लगीं थीं।
“और कौन है घर में ?”
“छोटी बहन है साब। लेकिन अब तक वो आँगन-बाड़ी जा चुकी होगी।” बहन का ख्याल आते ही बच्चे का रोना बंद हो गया। चेहरे पर अचानक अभिभावक जैसे फ़िक्र के भाव आ गए।
“और कोई बड़ा है घर में, जो तुझे यहाँ से ले जाये ?” सिपाही ने झुँझलाकर कहा। वह असमंजस में था कि इस बच्चे का क्या करे।
“अब तो मैं ही अपने घर का बड़ा हूँ साब।” इस बार बच्चे की आवाज़ आत्मविश्वास से लबरेज़ थी।
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तृतीय
विनोद कुमार दवे
बदला
स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकारी विद्यालय में निरीक्षण कार्यक्रम के दौरान मास्टर जी नपने ही वाले थे कि काँपते हाथों से अधिकारी के पाँव पकड़कर बोले,“मैं ख़ुद टॉयलेट साफ़ किए देता हूँ। कार्यवाही मत करना सर्!”
ब्रश पकड़ते ही बरसों पुराना एक घटना क्रम यकायक उनकी आंखों के आगे घुमड़ने लगा।
***
दिन एक
“मिठू बेटा! बाल्टी भर पानी डाल दोगे क्या टॉयलेट में? प्रेशर बन गया है।”
“जी मास्साब।”
कुछ दिनों बाद
“ मिठिया! टॉयलेट की बाल्टी भरदे।”
“जी मास्साब।”
कुछ और दिनों बाद
“जल्दी से टॉयलेट में पानी डाल आ।”
“जी मास्साब।”
काफ़ी दिनों बाद
“तुझे टॉयलेट की बाल्टी भरने के लिये रोज रोज कहना पड़ेगा क्या? भर जल्दी।”
“जी मास्साब।”
महीने भर बाद
“हराम के पिल्ले! बाल्टी खाली क्यों पड़ी है?”
कोई जवाब नहीं।
“भर बाल्टी,नहीं तो पूरे स्कूल में सफाई करवाऊँगा अकेले से।”
मीठाराम ने प्रत्युत्तर दिये बिना शौचालय की बाल्टी भर दी।
कुछ महीनों बाद
“बाल्टी पूरी नहीं भरी साले। जा वापिस। पानी डालआ शौचालय में। देखना गंदगी एकदम साफ़ हुई या नहीं। वहाँ ब्रश पड़ा है, एकदम साफ कर देना।”
कोई जवाब नहीं।
मास्टर जी ने डंडा उठाया।
कोई जवाब नहीं।
मास्टर जी ने पिटाई शुरू की।
कोई जवाब नहीं।
अगले दिन फिर पिटाई हुई।
उसके अगले दिन फिर पिटाई हुई।
यह सिलसिला चलता रहा,चलता ही रहा।
फिर एक दिन मीठाराम ने मास्टर जी की छड़ी पकड़ ली।
अगले दिन गुस्से से लाल हुई आंखों से मास्टर जी को घूरता रहा।
उसके अगले दिन चीखकर बोला,“मैं यहाँ पढ़ने आता हूँ। गुलामी करने नहीं।”
मास्टर जी कुटिल हंसी हँसते हुए बोले,“साले कुत्ते! पढ़कर कहाँ जाएगा?”
मीठाराम ने काँपते होंठों से कहा,“कहीं नहीं जाऊँगा।वापिस यहीं आऊँगा, आपके हाथों से टॉयलेट की सफ़ाई करवाने।”
***
आज मास्टर जी की हिम्मत नहीं हो रही थी,अधिकारी महोदय से नाम पूछने की। बस उनके कानों में बरसों पुरानी वह आवाज़ गूंजती जा रही थी,“कहीं नहीं जाऊँगा। वापिस यहीं आऊँगा, आपके हाथों से टॉयलेट की सफ़ाई करवाने।”
अन्य पुरस्कृत लघुकथाएँ
नीतू मुकुल
अक़ीदत
“आई……! जल्दी कर नहीं तो देर हो जाएगी, फिर भैया के घर पहुँचते रात हो जाएगी।”
“हाँ बेटा बस आती हूँ, बच्चों ने कुछ खाने का सामान मंगवाया था, बस वह और रखलें।” हाँफते-हाँफते स्टेशन के लिए ऑटो स्टैंड पहुँची । आई एक एक ऑटो में झाँक-झाँक कर देखती, फिर नहीं जाना कह कर वापस आ जाती। बेटी झुंझलाकर बोली, क्या आई….. वह ऑटो वाला पूँछ रहा है कहाँ जाना है ? क्यों नहीं चलती हो ? आई कान के पास जाकर धीरे से बोली वह सब मुसलमान है देखा नहीं चांद और हरा झंडा लगा रखा है । अभी कल ही बाजार में हिंदू मुसलमान के दंगे हुए हैं। मैं इनके साथ जाकर राम-राम-राम अपना धर्म नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर सकती । तभी पास खड़े ऑटो को देखकर खुश हो जाती है। बेटा मुझे स्टेशन तक छोड़ दे।माँ जी मैं अभी नहीं जाऊँगा।वो ऑटो पहले जायेगी तुम उसमे चली जाओ । आई जबरदस्ती ऑटो में बैठ गई। नहीं बेटा मैं तो तेरे साथ ही जाऊँगी । रास्ते में दंगाइयों ने रोकना चाहा पर ऑटो वाला गलियों के रास्ते जानता था । माँ जी साथ में बिटिया है, वहाँ से जाने का खतरा नहीं ले सकता, शॉर्टकट चलता हूं । माँ बेटी शुक्रिया अदा करने लग गई अपने भगवान का, आई बेटी से फुसफुसा कर बोली इसीलिए मैंने यह ऑटो पकड़ा था । इसमें हमारे साथ साथ भगवान है । स्टेशन पहुँचने पर ज्ञात हुआ पैसों वाला पर्स आई घर छोड़ आयी । बेटी के पास पेटीएम था लेकिन ऑटो वाले के पास पुराना मोबाइल था । अब वापस नहीं जा सकते थे क्योंकि ट्रेन के आने का वक्त हो गया था । ऑटो वाला गुस्साते हुए बोला….
“ या अल्लाह….! एक तो मेरे ऑटो में जबरजस्ती बैठते है फिर कहते है पैसा नहीं है पर्स भूल गए । खुदा ऐसी सवारी ना दिया करें ।”
यह सुनते ही आई का माथा ठनका । तू मुसलमान है…? हाँ तो क्या…..? लेकिन तू तो तू गणेश जी की मूर्ति लगाए है । इस ऑटो का मालिक हिन्दू है और मैं मुसलमान हूँ ; लेकिन आई इस हिन्दू मुसलमान से क्या होता है । ऑटो तो ऑटो है । बेटा मैं वापस आकर तेरे पैसे जरूर दे कर आऊँगी ; लेकिन ऑटो वाला बिना सुने ऑटो स्टार्ट कर के चला गया। आई का सर श्रद्धा से उसके आगे झुक गया ।
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निरंजन धुलेकर
छन्न !.
मुझे पता था, छुट्टी मिलते मिलते रात के ग्यारह तो बज ही जाएँगे , हमेशा की तरह ! जजमान शायद खाने के लिए भी पूछ लें ,वरना कमरे पर सवेरे का दाल चावल बना पड़ा था । शोर बहुत होता है, हर बार …
मेरे साथ चलने वाली बाजा गाड़ी पर दस दस भोंपू पूरे ज़ोर से चीख़ते हैं, इतनी ज़ोर से कि उसे बजाने वालों ने स्लेट चॉक रक्खी है आपस मे बात करने को ।
इन सब से मुझे फ़र्क़ नही पड़ता । अगर पड़ गया तो भूख की आग का शोर इतना ज्यादा हो जाएगा कि बर्दाश्त ही नही कर पाऊँगा । पर ये शोर किसी को सुनाई नही देगा और चीख़ दिखेगी नहीं । एक खामोश शोर वो भी है जो मन मे होता रहता है हर वक़्त .. घर कितने पैसे भेज पाऊँगा इस महीने ।
पढ़ लिख पाया नही , जुताई गुड़ाई मड़ाई में बचपन के सपने मिट्टी में गुड गए , कुछ हवा में उड़ गए । घर मतलब बस .. खाना खाने और नहाने सोने की जगह ।
ख़ाना पेट भर हो तो नींद भी आती थी ! थकान से मैं कभी नही सोया .. कल खाना मिलेगा ये पता होता तो नींद मेरा भी पता ढूँढ ही लेती ।
आगे चल रहे लोग किस गाने की धुन पर क्या करेंगे मुझे अच्छी तरह पता था .. जितना ये ख़ुश हो कर नाचेंगे उतनी ही मेरी भी उम्मीद बढ़ती ।
होशो हवास में नाचने वालों में मेरी दिलचस्पी कम ही होती ! ये लोग तो वाक़ई ख़ुश हो कर नाचते हैं ..!
मैं तो उनको ढूँढता जो ख़ुश हों न हों, मदहोश ज़रूर हों और दस और बीस के नोट में फ़र्क़ भूल चुके हों । वो लोग , जिन्हें अपना रुतबा सब के सामने दिखाने के लिए , मेरी ज़रूरत होती !
मेरे सर पर नोट तब तक घुमाते रहते है जब तक फ़ोटो न खिंच जाय ! मुझे दिए कितने..ये बात अलग होती ! पर देते ज़रूर । फिर मुझसे उम्मीद की जाती कि मैं और ज़ोर , जोश और शोर से वो गाने बजाऊँ जिससे उनका नशा और ज़ोर मारे ।
घंटों सालों तक बैंड में झाँझ बजाने से पहले छाले गट्टे पड़ गए थे , हथेलियों की लकीरों के उपर कायम ही आ बैठे !
कमज़ोर था ..बड़ा वाला ढोल उठा कर चल बजा नही पाता । बटन वाला बिगुल बजाना सीखने में ही साल भर लग जाता ।
मुझे मुँह से फूँकने में दिक्कत होती , फेफड़ों पर बहुत जोर पड़ता ।
साथ बिगुल वाले चचा चलते , फूँकते बजाते दमे की बीमारी हो गयी , पर इलाज़ के पैसे की लिए .. बजाते चल रहे ।
झाँझ बजाने वाले को पैसे सबसे कम मिलते हैं ! मन्दिरों में सब बजाते हैं और खूब पैसे .. भगवान को ही दे जाते हैं ।
बड़े ढोल वाले भैया ने इतना ही सिखाया की जब मैं बोलूँ , ‘ मार ‘ , तब दोनों हाथ उपर उठा कर ज़ोर से मारना । बस उनकी इस मार मार से , ज़िंदगी से भिड़ना सीख गया ।
अरे वाह ! लगता है जनवासा आ गया , मतलब आधा घंटा और बस .. मैं और ज़ोर से बजाने लगा ।
इस जनवासे के नाँच में पैसे ख़ूब मिलते हैं , असली बाराती तो मैं ही होता हूँ , जो सच्चे दिल से ख़ुश होता है ..
.. हर शादी में हर बार साल में कम से सात महीने तक मैं भी रोज़ सजता हूँ , बारातों का हिस्सा हूँ । बारात मेरा इंतज़ार करती है ,की मैं आऊँ तो चलें !
तसले जैसी पीतल की दो झाँझ जब टकराकर छन्न बोलती हैं, तो जेब का इंतज़ार शुरू हो जाता है … कुछ सिक्को के गिरने का … वैसी ही आवाज़ के साथ …छन्न !
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सत्या शर्मा ‘कीर्ति’
यादों की बारिश
घनघोर काली घटनाएँ, तेज़ मूसलाधार बारिश और मेघों की भयंकर गर्जना, जैसे किसी अनहोनी की इशारा कर रहे थे। टीवी पर बार-बार दिखाया और सचेत किया जा रहा था कि तेज बारिश के कारण बाढ़ विकराल रूप लेती जा रही है सभी आसपास के गाँव धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं।
मन में रह-रहकर ख्याल आ रहा है-कहीं मेरा भी गाँव तो लहीं डूब जाएगा? आँखें बस स्क्रीन पर ही गड़ी हैं।
क्या मेरा गाँव…..? या माँ की कर्मभूमि!!
छोटी उम्र में ही पढ़ने के लिए शहर में आ गया था फिर नौकरी के कारण बड़े-बड़े शहरों में ही पोस्टिंग होती रही।
ऐसे में माँ अकसर बुलाती थी-‘‘कभी तो आजा बेटा!’’ पर मुझे मिट्टी की गीली गलियाँ, कच्चे-पक्के घरों के चूल्हे से निकलता सफेद-पीला धुआँ, बरसात में चारों ओर की काई, गोबर की गंध जाने क्यों अच्छी नहीं लगती थी। कितने बहाने बनाता था मैं! कभी मीटिंग है, कभी बच्चों की पढ़ाई कभी कुछ। नहीं जाने के सैकड़ों थे मेरे पास।
माँ को भी स्वंय कभी शहर रास नहीं आया। उनकी भी अपनी दुनिया थी जिसमें कुछ गाएँ, तरह-तरह की सब्जियों और फूलों के पौधे तथा पड़ोसियों के सुख-दुख उनका साथ नहीं छोड़ते थे।
माँ कभी फोन से, तो कभी चिट्ठी लिखकर बुलाती थी मुझे।
तब मैं उन चिट्ठियों की कीमत बिल्कुल समझ न पाता और सोचता-माँ भी ना जब मोबाइल पर बातें हो जाती हैं, फिर भी चिट्ठियाँ क्यों भेजती रहती है…..
फिर एक दिन गोबर-मिट्टी की गंध लिए चली गई माँ किसी और ग्रह पर अपनी दुनिया बसाने। पूरे महीने हो गए हैं, पर पता नहीं क्यों आज बहुत याद आ रही है माँ। दराज से सारी चिट्ठियाँ निकाल लाया, तब एहसास हुआ-जैसे ये शब्द नहीं, बल्कि माँ ही सामने बैठ मेरे सुख-दुख पूछ रही हो।
तेज बिजली की गड़गड़ाहट ने मेरी तन्द्रा तोड़ दी और फिर मन गहरी आशंका से डूब गया। सामने टीवी पर मेरे ही गाँव के चित्र आ रहे थे, जिसे बाढ़ अपने साथ बहाकर ले जा रही थी, जिसमें शायद माँ का वह घर,वह पीछे का कुँआ वह अमरूद का पेड़, खूँटे से बँधे गाय और बैल, आँगन की तुलसी, चिड़ियों के लिए बिखरे दाने, सभी धीरे-धीरे तेज बहाव में विलीन हो गए होंगे। और लगा मैं सच में अनाथ हो गया। माँ के जाने के बाद भी यह पीड़ा नहीं हुई थी, जो आज महसूस हुई। आज लगा जैसे मेरा बचपन, मेरा अस्तित्व, माँ के स्पर्श से भरा घर का हर कोना सब बाढ़ के साथ बह गए।
मैं फूट-फूटकर रो पड़ा। लगा जैसे दो महीने पहले नहीं, बल्कि मेरी माँ आज ही मरी हो।
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सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
प्यार की महक
हर दिन
कभी फोन पर कभी आमने-सामने सावन की फुहार-सा पति का प्यार पत्नी पर बरसता रहता
था। पत्नी रेखा प्रेम के घने बादलों को ओढ़े हुए अपने घर के कोने-कोने में भाद्रपद
के मेघ-सी बरसती रहती थी । गलती होने पर भी मम्मा डांटती नहीं है यह देखकर बच्चें
भी खुश रहते थे। घर का हर कोना खिलखिलाता रहता था। रसोई भी तरह-तरह के पकवानों
से महकती रहती थी।
लेकिन आज सुबह से सब कुछ उलट चल रहा था । बड़ा बेटा अपनी बहन के कान में फुसफुसाया-
“आज कोई गलती नहीं करना ! मम्मी का पारा चढ़ा हुआ है ।”
“क्या हुआ ?”
“सुबह ऑफिस जाते समय पापा से मम्मी की लड़ाई हो गई है।” वह डरते हुए बोला ।
“ओह! तब चलो ! पढ़ने चलते हैं । टीवी बंद कर दो।”
रेखा के काम तो सभी हो रहे थे लेकिन गुस्से के साथ । आज रसोई से बर्तनों की आवाजें
उछलती हुई बच्चों के रूम तक पहुँच रही थीं। बच्चे समझ रहे थे कि आज कुछ पसंद का
खाना खाने को कहना, मतलब आग में घी डालना। जो बनकर आया, शांति से थोड़ा-सा
खा लिया । स्वाद जीभ को खराब लगा लेकिन माँ के आगे उन दोनों का चेहरा मुस्कुरा
रहा था ।
तभी पति का आगमन हुआ- “क्या हुआ ! रोज की तरह मेरा स्वागत नहीं करोगी?”
पति रेखा के चेहरे पर झुका लेकिन रेखा चमककर रसोई में चली गई । पति भी उधर
चला और उसने एक लाल गुलाब रेखा को पकड़ा दिया । फिर भी प्यार की महक से घर नहीं
महका। अकेले गुलाब की सुगंध ही रसोई में विचरण करने लगी।
पति ने जेब से मीठा पान निकाल रेखा के मुँह में डालते हुए बोला- “महीनों से
लड़ाई नहीं हुई थी। मीठा ज्यादा होने से उसमें कीड़े पड़ जाते हैं । जिंदगी में
कुछ नमकीन भी होना चाहिए न! नमकीन के बाद जो मीठा खाने का स्वाद आता है न! उसकी
तो पूछो ही नहीं।”
पान की शौक़ीन रेखा के मुँह में प्यार से खिलाए पान के घुलते ही सुबह से गमगीन पड़ी
रसोई फिर से चहक उठी। यह चहचहाहट एक बार फिर बन्द दरवाजों को भेदती हुई पूरे घर
में फैल गई । पूरा घर फिर से महक उठा । बेटे की खनकती आवाज गूँजी
– “मम्मी ! आलू के पराठे बनाइएगा । बहुत तेज भूख लगी है।”
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प्रहलाद श्रीमाली
जिंदगी की रफ्तार
सोमवार की सुबह और महानगर की लोकल ट्रेन ।भीड़ इतनी कि लगे लोग इसमें चढ़े नहीं ,जबरन ठूंसकर भरे गए हैं ।रोजगार की मजबूरी के सख्त मजबूत हाथों द्वारा । मिनट भर रुककर ट्रेन प्लेटफॉर्म से छूटी तो जवान होता जा रहा एक लड़का चढ़ने में सफल हो चुका था । दूसरा उसका साथी रह गया ।उसने एक हाथ से हैंडल पकड़ कर दूसरा ट्रेन के साथ दौड़ते साथी की ओर लहराया। साथी उसके हाथ को छू नहीं पा रहा था । लड़के ने खुद को यथासंभव और बाहर निकाला ; किंतु रफ्तार पकड़ चुकी ट्रेन ने प्रयत्न सफल होने नहीं दिया ,जो फिल्मों में अक्सर हो जाता है ।
बदहवास लड़का उत्तेजनावश अतिरिक्त प्रयास का दुस्साहस कर पाता ,इससे पहले एक व्यक्ति ने उसे अंदर खींच लिया ।अब लड़के को भान आया ।हाथ हैंडल से छूट जाता तो उसकी जान जा सकती थी ।सांस संयत करते हुए धन्यवाद देने की गरज से उसने प्राण सहायक परोपकारी व्यक्ति को देखा।
जलती आंखों से उसे घूरता व्यक्ति फूट पड़ा – कमबख्त !अभी गिर कर मर जाता ,तो तेरा तो कुछ नहीं बिगड़ता ! लेकिन साले ट्रेन लेट हो जाती तो हमारा रूटीन बिगड़ जाता। टाइम टेबल टूट जाता । कितना नुकसान होता पता है !
लड़का हक्का बक्का अवाक् रह गया। वह खुद को बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा था ।मौत को गौण करती जिंदगी की रफ्तार को समझ नहीं पाने के लिए ।
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अभिषेक चन्दन
अष्टावक्र: उत्तर आख्यान
कक्षा में अष्टावक्र आख्यान पढाना था। दो दिनों तक वर्ग में आचार्य जी ने पूरे मन से आख्यान सुनाया। छात्रों से पूछा,” क्या जी, तुम सब समझ गए न!” लडकों ने जोर लगाते हुए बोला, “जीए आचार्य जी!”
आचार्य जी को लगा जैसे अब अर्द्ध-वार्षिक परीक्षा की तैयारी हो गई।यही पाठ शेष रह गया था।उन्होंने हर्षित मन से कहा कल मैं पाठ से प्रश्न पूछूँगा तुम सब पाठ को जी लगाकर पढकर आना। सभी छात्रों ने हामी भर दी। अगले दिन कक्षा में जाते ही उन्होंने पहले गंभीर मुद्रा में पूरे वर्ग का निरीक्षण किया। उन्होंने सोचा कि पहली पंक्ति में जो कोने में दुबका बैठा है, उसी से शुरू करता हूँ, वह शायद थोडा कम पढ़ा है। उसको प्रोत्साहन दूँगा तो सभी लड़के इत्मीनान हो जाएँगे और अनुशासन भंग किए बिना वर्ग में प्रभावपूर्ण तरीके से कार्य-निष्पादन भी हो जाएगा। वे बोले,” ये, बालक खड़े हो जाओ।” लड़का चुपचाप खड़ा हो गया।
तुमने अष्टावक्र पाठ पढ़ा है?-आचार्य जी
लड़का-जी!
आचार्य- तुम सभी प्रश्नों के उत्तर दे सकते हो न ?
लड़का-जी! दे सकता हूँ
आचार्य -अष्टावक्र कौन है?
लड़का- वही, जिसका हाथ, गोर(पैर)मुँह -ऊँह सब टेढ़ है।
आचार्य- अच्छा, और आगे?
लड़का- वही, जो चाट.पकौड़ी बेचता था।
आचार्य- अच्छा, कहाँ पर?
छात्र- वही गलिये-गलिये बेचता था। शीला के घर के आगे।
आचार्य – अच्छा!
लड़का- हाँ, जब शीला चाट नहीं खाती थी तो रूस(मुँह फुलाना)जाता था। इंडा (कुँआ)पर बैठ जाता था।
आचार्य- कहाँ रहता है? नखास पर!
छात्र- न सर, क्रांति चौक पर फुचका के ठेला के पास।
आचार्य- बड़ा कमजोर है अष्टवकरवा, न?
लड़का- जोर.जोर से चिल्लाता था। पत्थर दिल है सर! बाप आजो (आज भी) चाय बेचता है। बाप उससे बोला कि तुम भी पकौड़ा छानो। रोजगार हो जाएगा।
आचार्य- अब क्या करता है? पढा.लिखा भी था क्या?
लड़का- किताब कबो (कभी)नहीं पढ़ा सर! अब दिन भर फेंकैती करता है। घूमता रहता है, बस!
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा था। सभी छात्र चुप थे। आचार्य जी को सूझ नहीं रहा था कि यह कौन सा उत्तर आख्यान चल रहा था। छात्र के रचनात्मक कौशल को समझे या गलत उत्तरों के लिए सजा दे। उसके पढ़ाये आख्यान से कहीं ज्यादा सार्थक उसे आज का आख्यान लग रहा था।
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अदिति मेहरोत्रा
पतंग
सारी तैयारियाँ लगभग हो ही गयी हैं। इस बार दीपावली परअमरके गांव जाना है। पलंग के अंदर से छः-सातसाड़ियाँ निकाल ली हैं। धूप दिखा दी है। ब्लाउज पेटीकोट धोकर सुखा लिये हैं। चार-पाँच सलवार सूट भी अलमारी से ढूँढ निकाले। कलफ को प्यासे थे सो लगा दिया। अंडर-गारमेंट्स बैठ के छाँटे। ‘सभ्य’ या कहें उचित। कॉटन के सादे,फीके,जोकिसीदुपट्टेकेनीचेछुपे, चुप-चाप अरगनी पर सूख जाएँ। न लहराएँ, न इतराएँ।’शालीन’। रेशमी, लेस लगे, खूबसूरत लाल-काले, खुबानी त्वचा पर फबने वाले यहीं घर पर अकेले दिवाली मनाएँगे। ऐसा सोचते ही हंसी छूटती है। अमर पूछता है क्या हुआ। उँगलियों के बीच दो -चार को पकड़ती हूँ और कहती हूँ “ये अकेले दिवाली मनाएंगे”। वो भी हंस देता है। हवा सी हंसी, पतंग के नीचे की हवा।
चूड़ियों के डिब्बे, बिंदियों के पत्ते, सब एक दराज में मिल गए।सिन्दूर की डिब्बी कब पीछे लुढ़ककर बिखर गयी थी, पता ही नहीं चला। स्टेशन के रास्ते में ऑटो रुकवा कर दूसरी जल्दी से खरीद लूँगी।
एक अंगूठी जो अमर ने पसंद की थी और एक पतली सोने की चेन जो मैने अपनी पहली सैलरी से ली थी, उसी की आदत है।बाकी सब फंसता है, खींचता है, रोकता है। पतंग हल्की होगी, तो उड़ेगी।सोने के बाले, बिछिया, चूड़ी का डिब्बा, मंगलसूत्र सब पर्स में रख लेती हूँ।हड्डियों पर लादने से अच्छा है पर्स में आराम करें।ट्रेन का सफर लम्बा है। ज़िन्दगी का भी।
गांव पहुँचती हूँ।कईयों से पहली बार भेंट होगी।सब कुछ कैसा है कैसे बताऊँ।धान का सुनहरा, लाल-पीले घूँघट के पीछे से मटमैला सा दिखता है। क्षितिज का किनारा धुंधला है क्यूँकि दूर का चश्मा पर्स में आराम फ़रमा रहा है।नई बहू के घूँघट में चश्मा देखा है कभी?
सबसे मिलती हूँ। प्रणाम करती हूँ।अमर की लम्बी आयु के लिए आशीर्वाद बटोरती हूँ। कई नज़रे पेट के उभार पर हैं।चुन्नटें सलीके से बनानी चाहिए थीं, यूँ ही ठूंस लीं।खुशखबरी न सुना पाने की शर्मिंदगी से गाल लाल हैं। गाँव को पोता चाहिए।क्या कहूँ। “कष्ट के लिए खेद है?”
थोड़ा फ्रेश हो लें, अभी और लोग भी आते होंगे।तैयार होकर कमरे से निकलने से पहले मेकअप बैग से फाउंडेशन की शीशी निकालती हूँ और अमर को पकड़ाती हूँ। पीछे घूम, गर्दन झुका उससे कहती हूँ, “लगाओ, पार्टनर इन क्राइम!”
“क्या ज़रुरत है?” कहते हुए उसकी गीली उँगलियाँ गर्दन को छूती हैं। गर्दन पर बना उड़ती पतंग का टैटू धीरे धीरे हल्का हो रहा है। पूरी तरह से छुपेगा नहीं पर घूँघट से ढका इतना हल्का फिलहाल चलेगा।
कोई बात नहीं, बस कुछ ही दिन की बात है।
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