जून 2026

अध्ययन -कक्षकमल चोपड़ा की लघुकथाओं में स्त्री- विमर्श     Posted: September 1, 2022

हिंदी लघुकथाकाश में कमल चोपड़ा उत्कृष्ट और सुप्रतिष्ठित लघुकथाकार हैं | १९९० में उनका पहला लघुकथा संग्रह ‘अभिप्राय’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था और उत्तरोत्तर ‘अन्यथा’, ‘फंगस’, ‘अकथ’, ‘अनर्थ’ आदि लघुकथा संग्रहों में उनके लघुकथा लेखन का मानचित्र भी विकसित होता गया | लघुकथा के क्षेत्र में संपादन, प्रकाशन और लेखन तीनों दृष्टियों से वें अपनी वरिष्ठता निर्बाध सिद्ध कर ही रहे हैं | लघुकथा विधा के शिल्प और कथ्य को निखारने और सँवारने में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय है |

अस्मितामूलक विमर्शों की दृष्टि से नवाँ दशक महत्वपूर्ण है | कहना न होगा कि स्त्री विमर्श इसी दौर में और अधिक तीव्रता से अवतरित हुआ था बहुत सारे नवीन प्रश्नों को लेकर | स्त्री विमर्श मूलत: स्त्रियों के अधिकारों, पितृसत्तात्मक सोच और बर्ताव से मुक्ति दिलाने और उन्हें भी वह दर्जा दिलाने के लिए प्रयत्नशील है जिसकी वें हकदार हैं | इसमें कोई संदेह नहीं कि स्त्रियाँ प्रत्येक क्षेत्र में हाशिए पर धकेली गईं | भारत पितृसत्तात्मक समाज रचना वाला देश है | स्पष्ट है कि सत्ता पुरुष के ही हाथों में है और जिसके हाथों में सत्ता होती है निर्णायक भी वही होता है | इसलिए बहुत जायज है कि स्त्रियाँ काबिल होते हुए भी दरकिनार ही रखी जाएँ तो सत्ता पर आँच नहीं आने पाएगी | क्षेत्र चाहे ज्ञान का क्यों न हो, दर्शन का क्यों न हो, साहित्य का क्यों न हो या कि राजनीति का स्त्रियाँ दो अंगुल प्रज्ञा वाली ही मानी गईं और मानी जाती भी हैं | प्रसिद्ध स्त्रीवादी रचनाकार अनामिका स्त्री विमर्श को यों परिभाषित करती हैं “स्त्री विमर्श करुणा संबलित न्याय दृष्टि से इतिहास, दर्शन, और नैतिक भूगोल की नई व्याख्या है, स्त्री लेंस से युद्ध, दंगे, आर्थिक वितरण और सामाजिक न्याय की विश्लेषण – पद्धति |”उषा राजे ने ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ लिखकर वस्तुत: यही प्रतिपादित किया की स्त्री रचनाकार सदैव से लिखती रही हैं चाहे हाशिए पर ही क्यों न रही हों अपना योग तो निश्चित रूप से देती रही हैं | इक्कीसवीं सदी में तो शोधों और आलोचनापरक साहित्य भी स्त्री विमर्श को और अधिक गति देते दृष्टिगोचर होते हैं | लेकिन स्त्रीवाद पर अभी आलोचना साहित्य इतना प्रगल्भ नहीं हो पाया है | फिर भी अनामिका, रोहिणी अग्रवाल इसे गति दे रही हैं |

कमल चोपड़ा की लघुकथाओं में विषय वैविध्य है इसमें संदेह नहीं और उनकी लघुकथाएँ अपने समय और समाज को बखूबी अभिव्यक्त भी कर रही हैं | स्त्री विमर्श की दृष्टि से देखा जाए तो कमल जी ने अपनी लघुकथाओं में स्त्री जीवन की समस्याओं और प्रश्नों को सशक्तता से उठाया है | इनकी स्त्री पात्र किसी एक तबके की भी नहीं हैं अपितु समाज के हर वर्ग से वें अपना स्वर मुखरित करने हेतु प्रयत्नशील हैं | स्त्री जीवन के हर रूप की अभिव्यक्ति इनके यहाँ देखी जा सकती है – माँ, पत्नी, बहन, कुमारी, वेश्या जीवन की त्रासदी आदि | लेकिन यह बात काबिलेगौर है कि उनकी स्त्रियाँ विशेषत: औसत भारतीय स्त्री का प्रतिरूप हैं | वेदप्रकाश अमिताभ इस संदर्भ में लिखते हैं “कमल चोपड़ा के लघुकथाओं की माताएँ अब भी ‘माता कुमाता न भवति’ की अवधारणा के पास ठहरी हुई हैं |”लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि वें सशक्त नहीं हैं | वें पर्याप्त विद्रोही हैं, सशक्त हैं |

लघुकथा ‘हरगिज नहीं’ की कांता उम्र बढ़ने और विवाह हेतु रिश्ते न आने की त्रासदी झेल रही है जिसमें उसके परिवारवाले भी शामिल हैं | वह ताने सहने के लिए अभिशप्त है | इसलिए कैसा भी रिश्ता आए शादी कर इस जंजाल से मुक्त हो जाने का निर्णय करती है | ऐसे में रामशरण बिचौलिया उसके लिए एक रिश्ता लेकर आया और रिश्ता भी कैसा ? पहली पत्नी को दहेज के चक्कर में जलाकर मार देने वाले आदमी का | लेकिन कांता शादी के लिए तैयार नहीं होती और कहती है “मैं लूले – लंगड़े से शादी कर लूँगी पर उस लालची दरिंदे के साथ हरगिज नहीं |” यह उसका प्रतिकार ही है | कुँआरी लड़कियों की यह सजगता और जागरूकता वर्णित की गई है कि वें किसी भी परिस्थिति में दहेज के भूखे लड़कों से शादी नहीं करेंगी | वहीं ‘दास प्रथा’ लघुकथा समाज और पितृसत्ता के उस घिनौने रूप को सामने लाती है जिसमें स्त्री को मात्र बंधुआ मजदूर समझा जाता है | बड़े भाई बीमार हैं और उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है | उनके लिए एक नर्स रखने की जो उनकी देखभाल करें आवश्यकता महसूस की जाती है किंतु कौन खर्च करेगा ? दोनों – तीनों भाई पल्ला झाड़ देते हैं और छोटा भाई सुझाव देता है कि एक लड़की से उनका विवाह कर दिया जाए क्योंकि हमारे देश में पत्नी का मतलब ही सेवा, त्याग और ईमानदारी है | और यही लघुकथा का अंत हो जाता है | यह हमारे यहाँ की सच्चाई है कि शादी की ही इसलिए जाती हैं कि एक मुफ़्त की नौकर मिल जाए जो सहती रही खपती रहे पर प्रश्न न करे | लगभग ऐसी ही परिस्थिति का चित्रण कमल की ‘खुला बंधुआ’ में भी दृष्टिगोचर होती है जिसमें पति ने गाँव से घर में काम करने हेतु केवल पाँच सौ रुपयों में नौकर लाया है | लेकिन वह अपनी पत्नी को भी बंधुआ मजदूर ही समझता है और अपने काम करवाता है | उसकी पत्नी भी काम करती है लेकिन उसे पहले पति का काम करना जरूरी है | लेकिन कमल की नायिका बोलने वाली औरत है और सुनाती भी है “मुझे तो तुमने उलटी गाँठ से बाँध रखा है | मुझे तो तुम उल्टा एक लाख का दहेज लेकर लाए थे |” यहाँ दहेज की समस्या तो है ही स्त्री की मुक्ति और स्वतंत्रता का प्रश्न भी मुखरित हो जाता है |

दहेज की समस्या को लेकर ही कमल जी की एक और लघुकथा है ‘आखिरकार’ जिसमें बहू की प्रताड़ना भी की जाती है यहाँ तक कि उसे जलाने की कोशिश भी होती है लेकिन पुलिस आ जाने से सब कुछ सामने आ जाता है और दुलारी बच जाती है | वह अपने मायके में है | लेकिन कमल समाज की उस सोच पर जिसमें पुन: लौटकर उसी घर में जाना है जहाँ उसकी डोली गई थी, करार प्रहार करते हैं | चाहे ससुराल जी का जंजाल ही क्यों न बन जाए स्त्रियों से सुलझाने और जोड़े रखने की कला ही छटी के दूध के साथ – साथ घोंट- घोंटकर आजीवन सिखाई और समझाई जाती है | लेकिन दुलारी इसका विरोध करती है और लोगों को चुप करा देती है |

कन्या भ्रूण हत्या जैसा क्रूर और अमानवीय कृत्य आज भी किसी न किसी रूप में समाज में व्याप्त है | हम जितनी प्रगति कर रहे हैं या कि करने का दंभ भरते हैं ऐसे घिनौने कृत्य उसके शून्यता की पोल खोल कर रख देते हैं | ‘भ्रूण हत्या’ में ‘भ्रूण हत्या’ की समस्या अतिशय नवीन रूप में चित्रित है | पूँजीवादी वर्ग द्वारा सर्वहारा स्त्री के शोषण की व्यथा और पति द्वारा उपेक्षिता होना वहीं दलित विमर्श भी | बुधनिया गरीब है और गर्भ से है | पति शहर गया तो लौटकर नहीं आया चार – पाँच महीनों से ज्यादा समय हो चुका है | ऐसे में बुधनिया को खुद ही काम करना पड़ रहा है | वह मजबूर है | थोड़ा – सा काम करती है कि उसकी सांसें फूल जाती हैं | ऊँची जात कहलानेवाले के यहाँ वह काम करती है और बदले में रूखी – सूखी खाकर पड़ी रहती है | चौधरी की बहू भी गर्भ से है लेकिन बुधनिया देखती है कि उसके लिए तो नौकर – चाकर सब हैं | देखभाल की व्यवस्था भी उत्तम है | इसके द्वारा लेखक ने उच्च और निम्न वर्ग के बीच की खाई को दिखाया है | यदि वह काम नहीं करेगी तो मालिक रोटी नहीं देगा | और वह उस दिन दुगुना काम करती है और अपने बच्चे को खो देती है तीसरी बार | और खून से सने कपड़े लाकर मालिक के यहाँ फेंक देती है | वह चिढ़कर उसे मारने उठता है लेकिन तभी पंडित आकर कहता है “नीची जात का जीव खंडित होना शुभ होता है | आपके वंश हेतु चमार की औलाद ने कुर्बानी दी है | इसे तो इनाम मिलना चाहिए|“ वहीं ‘मिठास’ की जमादारनी आत्मसमान से भरी हुई है | गली के लोग उससे सफाई करवाने हेतु उसे उल्टा – सीधा कहते हैं | यहाँ तक कि कार्पोरेशन के साहब तक आकर उसे डराते और धमकाते हैं लेकिन वह तस से मस नहीं होती | लेकिन एक बच्चे के केवल प्यार से अम्मा जी कहकर कहने से वह सीधे उठ खड़ी होती है और काम करने लगती है |

भूमंडलीकरण के इस दौर में स्त्रियों की स्थिति और चिंताजनक दिखती है | ह्यूमन ट्राफीकिंग, देह व्यापार के दलदल में रोज न जाने कितनी ही बच्चियाँ धकेल दी जाती हैं | व्यवस्था तो अब कुव्यवस्था में बदल चुकी है | जो रक्षक कहे जाते हैं उनका ही भक्षक रूप रह – रहकर सामने आता है | ‘चंगुल’ शीर्षक लघुकथा में कमल ने इसी समस्या को उठाया है सारी सच्चाई के साथ ! नायिका देह व्यापार में फँसा ली जाती है | और माता – पिता उसके मिल जाने पर और पुलिस द्वारा फोन करके इसे ले जाने पर कन्नी काटते हैं | अपने ही पेट के जायों को यह भी सहना पड़ता है यह बहुत दर्दनाक है | आज भी स्त्रियों को परिवार की इज्जत से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति समाज में देखी जा सकती है | लेकिन थानेदार बहुत समझदार है जो पाठक को दिलासा जरूर देता है और माता – पिता को समझाता है “अपनी बेटी को वापिस नहीं लाओगे तो उन गुंडों और आप में फर्क ही क्या रह जाएगा ?”६  

समकालीन समाज और समय में स्त्रियों की सुरक्षितता का प्रश्न अहम हो गया है यह हम सभी जानते हैं | और उसी के अनुरूप ही उनके पालन – पोषण में माता – पिता संलग्न हैं | ‘मिनी को सजा’ में लेखक ने यही प्रश्न उठाया है जिसमें मिनी के माँ – पापा गुंडों के डर से उसे घर से बाहर निकलने ही नहीं देते, खेलने ही नहीं देते | रात – दिन वह कमरे में रहती है, डरती है | बालमनोविज्ञान की दृष्टि से यह लघुकथा उत्तम बन पड़ी है वहीं बच्चियों के सुरक्षितता का प्रश्न भी मुखरित हुआ और लगभग यही समस्या इनकी ‘खौफ’ लघुकथा में भी देखने मने आती है | इसकी बच्ची को माँ न जाने कितनी नसीहतें देती है कि बाहर न जाओ, समय बहुत खराब है, तुम कहीं महफ़ूस नहीं हो, लड़कियों को बहुत सँभलकर रहना चाहिए | लाख हियादतें देकर माँ उसे बाहर न जाने हेतु मना लेती है और कहती है कि कोई बेटा – बेटा कहे तो भी जाना नहीं | शाम को पापा आए और अपनी बेटी को बेटा, बेटा कहकर बुलाने लगे | लेखक ने जो लिखा उसे ज्यों का त्यों उद्धृत करना जरूरी लगता है “बच्ची लोहे की अलमारी के पीछे छिपी हुई थी | चेहरा पीला जर्द | डर से थर – थर कांपती हुई !!!”७  कमल के यहाँ दंगों – फसाद, धार्मिक हिंसाचार, धार्मिक उन्माद परक कथ्यों की विविधता है | इसमें कोई संदेह नहीं कि इन सभी बर्बरताओं को औरत का शरीर ही सबसे अधिक झेलता और प्रताड़ित होता है | अफगानिस्तान में स्त्रियों की यह दशा हम देख चुके हैं मूकद्रष्टा बनकर ! ‘उल्टा आप’ लघुकथा धार्मिक हिंसाचार और उन्माद से घिर जानेवाली लड़की की है | दंगों के भड़क जाने से मास्टर जी के घर पढ़ाई करने गई अन्य धर्म की लड़की फँस जाती है | उसे वहीं उनके घर रहना पड़ता है और जब वह आती है तो उसके धर्मवालों के अविश्वास और शक के चलते मास्टर जी पर प्रहार होते हैं और लड़की भी मार खाने को विवश है | वास्तविकता तो यह है कि मास्टर जी ने उसे अपनी बेटी की तरह रखा था | स्त्रियों को वस्तु से अधिक कुछ न समझने की कुप्रवृत्ति ‘निशानी’ में देखी जा सकती है |

कमल की लघुकथाओं में बहनापे के सूत्र भी जुड़ते दिखाई देते हैं | ‘दु:ख जोड़ेंगे’ की जमादारनी और पंडिताईन में जाति – पाँति के बंधन टूट जाते हैं और इनके घरों के एक जैसे दु:ख इन्हें जोड़ देते हैं | ‘बिरादरी’ भी इसी कथ्य को वर्णित करती है | जैसाकि पहले ही कहा गया कि कमल के लघुकथाओं की पत्नी पात्र औसत भारतीय स्त्रियों का ही प्रतिरूप कहीं – कहीं जरूर प्रतीत होता है | इनकी ‘ख्याल रखना’, ‘पत्नी’ सरीखी लघुकथाएँ इस बात को प्रमाणित करती हैं | बीमार होकर पति के दूसरी शादी हेतु अनुमति देनेवाली, वहीं पति किसी दूसरी स्त्री के साथ भाग जानेपर भी पत्नी उसके मित्र से उसका हाल – चाल पूछती है | वहीं इनकी माँ पात्र भी इसी प्रवृत्ति की दिखाई देती हैं | ‘छिपा हुआ दर्द’ बहुत सुंदर और सशक्त लघुकथा है | वृद्ध सास – ससुर से मिलने बेटा और बहू आए हैं | यह वृद्ध दंपति विपन्नता में जीवन जी रहे हैं | इसकी खबर बेटे और बहू दोनों को है और वृद्ध दंपति द्वारा इनकी आवभगत में कमी न रह जाए इसलिए उनकी उकताहट को भी जानते हैं | लघुकथा की बहू बहुत समझदार है तभी तो वह कहती है “माँ जी, हम तो शहर से स्पेशली आपके हाथ की बनी मक्के की रोटी खाने आए हैं, साग अगर एक दिन का बासी हो तो अगले दिन और स्वादिष्ट लगता है पर हाँ उसमें घी – मक्खन मत डालना | हमें डॉक्टर ने मना किया है | और बाबूजी आप हमारे पास बैठिए ना, हम तो आपकी तबीयत का हालचाल पूछने आए हैं ……”८   कमल जी के यहाँ इस प्रकार की सकारात्मकता देखते ही बनती है |

निष्कर्ष :

इस प्रकार स्पष्ट है कि कमल चोपड़ा की लघुकथाओं में स्त्री विमर्श अपनी संपूर्णता में चित्रित है | दलित स्त्री, ग्रामीण स्त्री, शहरी स्त्री, निम्न वर्ग की स्त्री सभी उनकी लघुकथाओं में आकर अपनी जमीनी हकीकत बयाँ करती हैं और मुक्ति की राहें तलाश रही हैं | वें संघर्षशील हैं वहीं जद्दोजहद करते हुए अपने अधिकार पाने हेतु प्रयत्नशील भी | कमल अपने समाज को जानते हैं और उसकी पुरुषप्रधान व्यवस्था की दुरूह संरचना को भी | और यह सब जानते हुए वें उसकी शल्य – चिकित्सा भी बखूबी करते हैं | वें एक प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में हिंदी साहित्याकाश में अपनी सामाजिक – सांस्कृतिक और स्त्रीवादी चेतना के लिए अवश्य ही साधुवाद के पात्र हैं |

संदर्भ सूची :

डॉ. पी. वी. सुमित, अनामिका के साहित्य में स्त्री विमर्श, के. एल. पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ – १६५

कमल चोपड़ा, अन्यथा (भूमिका भाग से), अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली, पृष्ठ – ७

कमल चोपड़ा, फंगस, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ – ७०

कमल चोपड़ा, अभिप्राय, पंकज प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ – ३२

वही, वही, पृष्ठ – ११२

कमल चोपड़ा, अकथ, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ – २८

वही, वही, पृष्ठ – ४१

कमल चोपड़ा, अन्यथा, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ – ३१       

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