जून 2026

देशकवच     Posted: November 1, 2023

हाथों से मेहँदी का रंग अभी छूटा भी न था कि चूड़ियों को आपस में टकराकर तोड़ दिया गया। साड़ी का रंग लाल से सफेद हो चुका था और हँसी- मुस्कुराहट इतिहास की बातें। सास भी अपने इकलौते बेटे को खोने के गम में डूब जाना चाहती थी; मगर बहू का चेहरा देख सँभल जाती। इस बीच मँझले ननदोई। का आना-जाना बढ़ गया था। पहले जो मज़ाक आँखों तक  ही सीमित रहता था,वह अब शब्दों और छुअन की ओर बढ़ने लगा था।

पति को याद करने और भगवान को कोसने के सिवा कोई दूसरा चारा भी तो न था उसके पास । आज फिर आए थे मालदह आम लेकर ।

वह ननदोई के लिए आम काटकर कमरे में ले गई।

“बैठिए न! खड़ी क्यों हैं?” ननदोई ने बड़े प्यार से कहा ।

“जी… मैं ठीक हूँ।”

“ठीक कहाँ हो! अजी! जो होना था सो हो गया। अब इस तरह पहाड़-सा जीवन थोड़े ही न कटेगा।” कहते हुए जबरदस्ती हाथ पकड़कर अपने नजदीक बिठा लिया।

“ये क्या कर रहे हैं आप?”- अनीता ने उठने की कोशिश करते हुए औपचारिक हो कहा, “आम खाइए न आप!”

“तुम भी मालदह आम से कम थोड़े न हो! साले साहब के जाने के बाद मेरी भी तो कुछ ज़िम्मेदारी बनती है न!” और हाथ ने मर्यादा की सीमा रेखा पार करने की कोशिश की।

अनीता झटके से अपने आपको छुड़ाती हुई आँगन की ओर दौड़ पड़ी। सास की अनुभवी आँखों को घटनाक्रम आँकने में एक पल भी न लगा। पीड़ा व रोष- मिश्रित भावों में सास ने ज़िम्मेदारी लेनी चाही मगर “आगे का कठिन सफ़र  तो उसे अकेले ही तय करना होगा” यह सोच उसने बहू को अपने पास बिठा लिया।

“सुन बहू! मैं जब ब्याह कर ससुराल आई, तो सास का साया सिर पर नहीं था। ससुर ने सारी जिम्मेदारी अकेले ही सँभाली थी। कभी कोई कमी महसूस न होने दी। फिर एक दिन वे भी चल बसे। पर मरने से पहले तेरे दादा ससुर ने अपनी खड़ाऊँ मुझे देते हुए कहा था कि बहू! यह खड़ाऊँ मैं विरासत के रूप में तुझे देता हूँ। सँभालकर रखना इसे, ज़रूरत पड़ेगी।”

बहू के कन्धे पर हाथ रख उसने भर्राये गले से कहा, “बेटी, मुझे तो इसकी जरूरत अब तक न पड़ी, लेकिन तुझे अब इसकी सख्त जरूरत है। पुरखों की बिरासतें यूँ जाया नहीं जातीं।” कहते हुए सास ने खड़ाऊँ को ज़ोर से ज़मीन पर पटक दिया। खड़ाऊँ छिटका, गुलाटियाँ मारते हुए बरामदे से कमरे की ओर दौड़ी। अन्दर से चीखने की आवाज़ – सी आई ।

अनीता ने आश्वस्त नज़रों से सास की तरफ़ देखा और अपना सिर सास के कन्धे पर टिका दिया

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