डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
जंगल की संसद में भारी दंगल था । मामला ही कुछ ऐसा था । जंगल रक्षक दल के दाँत और पंजे पैने करने वाले पत्थर कम होते-होते ग़ायब हो गए ,खाद्य आपूर्ति घटिया और जरूरत से बहुत कम थी ,पीने के पानी की ओर किसी का ध्यान न था । ऐसे में जंगल की सुरक्षा का क्या ? विपक्ष पानी पी-पी कर वर्तमान सरकार को कोस रहा था और सरकार इस सब का दोष विपक्ष की पूर्ववर्ती सरकार के मत्थे मढ़ कर प्रसन्न थी ।
“पिछली सरकार का रक्षा बजट भी कितना कम था…आपको रक्षकों के जीवन की चिंता ही कहाँ थी ?” नए रक्षा मंत्री ने कहा।
“तो आपने ही कौन सी भारी रक़म दी है!” पलटकर लोमड़ी देवी बोली ।
“आपने छोड़ा ही क्या था..ख़ाली ख़ज़ाना , दाँत पैने करने के पत्थर तक बेच खाए! अब आप लोग ही बताएँ – हम रक्षक अपने दाँत कैसे पैने करें?” उत्तर पर और हंगामा हो गया । लगा पक्ष-विपक्ष अब मारा-मारी पर उतरे ।
“आपस में लड़ना बंद कर मेरे सुझाव सुनिए”-भालू दादा बोले ,” सभा के हर सदस्य के परिवार से एक सदस्य रक्षक दल में शामिल हो और प्रत्येक सदस्य अपने मासिक वेतन से एक दिन का वेतन रक्षा बजट के निमित्त दान करे ।आख़िर कितनी ही सुविधाएँ तो आपको मुफ़्त जैसी ही प्राप्त हैं !’’
“क्या बेवक़ूफ़ी भरी बात है” -विपक्ष से कोई चिल्लाया ।
“हाँ हाँ ..ऐसा कैसे हो सकता है” सरकारी आवाज़ आई .’.हम सरकार चलाएँ या मोर्चे पर लड़ें ? इतना वेतन भी कम पड़ जाता है!’
‘आपको अपनी जान बहुत प्यारी है न, इसलिए। सीमा पर रक्षक दल में शामिल होकर देखिए,तो पता चले !! यहाँ बरगद की ठंडी छाँव में बैठकर बहस करना बहुत आसान है’-अध्यक्ष हाथी दादा ने फटकार लगाई ।
‘’नहीं – नहीं यह बिल्कुल भी संभव नहीं ! और कितना बेहूदा सुझाव है !’ पक्ष-विपक्ष की आवाज़ें गड्डमड्ड हो गईं ।
गिरगिट हैरान थे ।
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