
“काकी, एक हफ्ते में यह आर्डर पूरा हो जाना चाहिए। न हो तो गाँव से और कारीगर ले आओ। इतना बड़ा आर्डर रोज- रोज नहीं मिलता। पिछले बार जगन सेठ ने हमारा काम देखा था, तभी तो हमें यह काम सौंपा। कला और आदमी के पारखी है। एक बार बाजार में साख बन गई, तो अगले साल होने वाले विश्व मेले में जाने का रास्ता साफ हो जाएगा।” टीकाराम भावनाओं के अतिरेक में बहे जा रहे थे।
“भैया, अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश डाल रहे हैं; पर इस बार आढ़ती बाजार के नुक्कड़ वाला छगन सेठ, थान देने में बहुत हील- हुज्जत कर रहा था। बड़ी मुश्किल से दस बारह थान खींच पाई।” पान की जुगाली करती काकी के माथे पर सिलवटें उभर आईं।
“अरे ! वहाँ कहाँ पहुँच गई काकी तुम! छगन तो एक नंबर का मक्कार है। जरा मेरे कान में बात डाल देती, थान के थान लदवा देता।”
एक पल काकी ने टीकाराम को देखा और मन ही मन दो चार सुनाई। “तुम कौन कम मक्कार हो। पाँच के दस लेते हो और तैयार माल पर अलग कमीशन खाते हो”, पर सामने चुप लगा गई।
काकी बाजार के बहाव से अच्छी तरह वाकिफ थी और फिर इतने दिन से इसी काम में लगी थी। अपने साथ काम करने वाले कारीगरों के हाथों के हुनर और लोकप्रियता को वे अच्छे से पहचानने लगी थी। जब सब काम उनका ही था, तो बीच के इस बिचौलिये टीकाराम का क्या काम था ?
काकी ने कुछ दुकानदारों के नंबर जोड़ कर रख लिये। मन ही मन कुछ ठाना और मशीन पर अपने हाथ तेजी से चलाने लगी।
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