अरे राधेलाल, फिर चाय का ठेला! तुम तो अपना धंधा समेटकर अपने बेटे और बहू के घर चले गए थे।”
“अरे सिन्हा साब! वह घर नहीं, काला पानी है काला पानी! सभी अपने ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हैं कि न कोई मुझसे बात करता और न कोई मेरी बात सुनता। बस सारा दिन या तो टीवी देखो या फिर छत और दीवारों को ताको। भाग आया। यहाँ आप लोगों के साथ बतियाते और चाय पिलाते बड़ा अच्छा समय बीत जाता है। अरे, आप किस सोच में पड़ गए?”।
“सोच रहा हूँ कि मैं तो तुम्हारी तरह चाय का ठेला भी नहीं लगा सकता। बेटा बहुत बड़ा अफ़सर जो ठहरा।”-फीकी हँसी के साथ सिन्हा साहब ने चाय का प्याला होठों से लगा लिया।
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