सिद्धांत या शास्त्रीय निकष पर जब हम किसी रचना का मूल्यांकन करते हैं, उसके गुण और दोषों
को रेखांकित करते हैं , उसके अस्तित्व तथा महत्व को नकारते या स्वीकारते हैं, रचना और रचनाकार को मूल्यांकित करते हैं, तब उसके आकार प्रकार, उसकी विधागत विशेषताएँ और उसकी विषय वस्तु सभी पर ध्यान जाता है किसी भी समीक्षक या आलोचक का । उससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है । किंतु जब उन रचनाओं को एक पाठकीय दृष्टिकोण से देखा जाता है, तब वहां पर शास्त्रीय पक्ष कम, विषयगत पक्ष अधिक उभर कर सामने आता है ।
किसी भी साहित्य के विकास में जितनी समीक्षक और आलोचक की भूमिका रही है, उससे कुछ कम पाठकों की नहीं । भले उन रचनाओं का मूल्यांकन पाठकों के पत्र यानी विभिन्न पाठकों की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से होता हो ।
हमारे हाथ में भी एक पुस्तक है कनक हरलालका की लघुकथा कृति ‘ कितना कुछ अनकहा’, जिनका मूल्यांकन मैं एक समीक्षक के आधार पर नहीं, बल्कि एक पाठकीय दृष्टिकोण के आधार पर करूँगा और आगे भी प्रयास करूँगा कि मैं एक पाठक बनकर किसी की कृतियों का मूल्यांकन कर सकूँ ।
सुप्रतिष्ठित लघुकथा लेखिका कनक हराललका की इस कृति की लघुकथाओं में समाज की विसंगतियों पर इस तरह से प्रहार किया गया है, जो बहुत कुछ बयां करने के बावजूद भी बहुत कुछ अनकहा सा रह जाता है। रफ कॉपी, स्वतंत्रता दिवस, सड़क और फूल, जीवन का सत्य, गांधी को किसने मारा, भूख, नक्शे कदम,खो गई छांव आदि ढेर सारी ऐसी लघुकथाएँ इस कृति में शामिल हैं, जो अपनी विषय वस्तु के माध्यम से हमारा ध्यान अपनी ओर खींच लेने में सक्षम हैं। भले इन लघुकथाओं में पूरी बात बयां न की गई हो, किंतु लघुकथा का जहां पर अंत होता है, वहीं से पाठक कुछ और अनकही बातों को गढ़ने में कामयाब हो जाते हैं और यही लघुकथा की विशेषता भी है ।
बेकसूर होकर वह गरीब सिर्फ इसलिए मार खाता है, क्योंकि वह किसी व्यक्ति से नहीं बल्कि किसी महत्वपूर्ण नेता से पंगा लेता है । और पंगा भी लेता है तो गांधी जी की तरह अहिंसक बनकर यानी एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरे गाल को बढ़ा देने की वजह से। आज के परिवेश पर गांधीगिरी की क्या स्थिति है, इस पर करारा तमाचा मारा है लेखिका ने अपनी लघुकथा ‘गांधी को किसने मारा’ के माध्यम से !
ठीक उसी प्रकार इस कृति में उनकी सर्वाधिक चर्चित लघुकथा ‘प्यास’ और ‘ जानवर’ भी मालवीय उद्दंडता की पराकाष्ठा को स्पर्श करती हुई एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने में कामयाब दिखती है । जानवर ‘लघुकथा’ तो कम शब्दों में एक पूरा उपन्यास कहने की क्षमता रखती है- “हाँ, तभी तो मैं हूँ ऐसे जानवर की जगह गाँव घर में ना होवे है “- गुलाब ने कहा । शहर के गुंडे जब साँड की तरह उदंडता पर उतर आते हैं ,तब गुलाब का यह कहना लघुकथा को जबरदस्त मोड़ देता है -” ठीक है, तो मैं ही पुलिस और जंगल विभागवालों को खबर कर देता हूँ, पकड़कर जंगल में छोड़ आवेंगे !”- गुलाब ने कहा ।
“और जंजीर तोड़कर फिर बाहर आ जाए तो ?”
” तो फिर बेशक गोली मार देंगे !”- सरपंचाइन की हुंकार से ग्राम सभा में सन्नाटा छा गया ।
‘जानवर’ कई मायने से इस संकलन की श्रेष्ठ लघुकथा है । लघुकथा में संवाद अदायगी का महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप होता है, जिसमें कनक हरलालका ने दक्षता प्राप्त कर रखी है। कहा – अनकहा के विविध संदर्भों से परिपूर्ण हैं कनक हरलालका की लघुकथाएँ !
-0- कितना कुछ अनकहा (लघुकथा संग्रह) : कनक हरलालका ; प्रकाशक: दिशा प्रकाशन, 138 / 16, त्रिनगर, दिल्ली 110035, प्रथम संस्करण :2021; पृष्ठ :120, आवरण चित्र: डॉ. सुरेश सारस्वत , मूल्य:300रुपये (सजिल्द )
-0-सिद्धेश्वर/ ईमेल: sidheshwarpoet.art@gmai.com