ठाकुर साहेब !! आपको हमारी कसम मत ले जाए इसे, मैंने नौ महीने कोख में पाला इस जीव को,आप कैसे किसी और को दे सकते। हाय री किस्मत ! ब्याह के 10 बरस बाद दिया तो वोह भी ठूँठ! मेरे लिए तो मेरी संतान, मैं कही जंगल में रहकर पाल लूँगी। कम से कम माँ तो कहेगा मुझे,अभी तक बाँझ कहलाती थी,अब तो ना जाने क्या-क्या कहेंगे लोग’-बिलखती ठकुराइन की गोद से चंद घंटे की संतान को ज़बरदस्ती ले जाते हुए ठाकुर भी फूट-फूटकर रो दिए
’‘हम बाप बनकर भी ना बन सके। कैसे रखें इस गोल -मटोल प्यारे से बच्चे को अपने पास, तुम इसे पढ़़ाना’ अच्छा इंसान बनाना। तुमको पैसे की कभी कमी न होगी -कहकर रजनी किन्नर को सौंप आए। आज 28 बरस बाद वह ठूँठ अपने शहर का मेयर बना हुआ हैं। पुराने सब लोग जानते हैं-किसका बेटा हैं। आखिर ऊँचा माथा सुतवाँ नाक खानदानी रुआब वाला चेहरा चुगली कर रहा था टी-वी-पर शपथ कार्यक्रम देखते हुए दो जोड़ी बूढ़़ी आँखें एक दूसरे का हाथ थामे जार-जार रो रही थीं और कोस रही थी समाज को।
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