बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और शादी-ब्याह के चक्कर में जीवन के पचपन वर्ष कब बीत गए, राममेहर को पता ही नहीं चला। तनख़्वा थोड़ी थी; ट्यूशन से भी नाम मात्रा की कमाई होती थी। अतः मुश्किल से ही गुज़र-बसर हो पाती थी। उस जैसे स्कूल टीचर के लिए अपने घर की बात सोचना भी बेमानी था। अतः तीस वर्षों का सेवाकाल किराए के मकानों में ही सामान जमाते-उठाते बीत गया।
आज राममेहर खुश है। पचपन की उम्र में ही सही, उसने अपना एक छोटा-सा घर बना लिया है। कुछ पैसे उसने बचाए, कुछ एरियर मिल गया तथा कुछ पीएफ से लोन ले लिया और इस प्रकार उसका अपने घर का सपना साकार हो गया। अतः वह खुश है, बहुत खुश; इतना खुश कि जितना वह अपने विवाह और बच्चों के जन्म पर ही शायद हुआ हो।
राममेहर ने गृह-प्रवेश से पूर्व ही अपना सारा सामान नए घर में जंचा दिया है। दस बजे हवन है और फिर गृह-प्रवेश। बेटा-बेटी, दोनों विशेष रूप से आए हैं, इस अवसर पर।
लेकिन घर और घर की साज-सज्जा को देखकर दोनों उखड़ जाते हैं, कहते हैं-‘‘यह क्या डैडी ! एक तो सौ गज का छोटा-सा मकान, ऊपर से आपने अपना सारा पुराना सामान इसमें भर दिया है। अब यह घर नहीं कबाड़-घर लगता है।’’
इतना कहकर बच्चों ने, उसके द्वारा बनाए गए चित्रों, पुस्तकों तथा दूसरी ज़रूरी चीज़ों को वहाँ से हटाकर, स्टोर में रखना शुरू कर दिया। देखते-ही-देखते घर का नक्शा ही बदल गया। लेकिन यह तो वह घर नहीं, जो राममेहर ने अपने लिए बनवाया था।
राममेहर को लगता है, जैसे वह एक बार फिर किराएदार बन गया है। बस, अन्तर इतना है कि पहले वह किसी अन्य के घर में किराएदार था, अब अपने ही घर में।
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लघुकथा.com
जून 2026
संचयनकिराएदार Posted: June 1, 2015
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