
वर्तमान समय को लघुकथा का स्वर्ण काल कहा जाए तो अतिशयोक्ति नही होगी। लघुकथाएँ पढ़ने में जितनी सरल लगती हैं ,उनकी रचना या लेखन उतना ही कठिन है।सोशल मीडिया ने जितना इस विधा को पुष्ट किया उतना ही संक्रमित भी।मेरे शब्दों में “एक संवेदनशील रचनाकार के वैचारिक मंथन से प्राप्त नवनीत है लघुकथा।” लघुकथा में मानवीय मूल्य,संबंधों का पोषण एवं क्षरण ,सामाजिक विसंगति ,अंतर्विरोध, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक चित्रण होता है । लघुकथा अपने नन्हे कलेवर में यक्ष प्रश्नों को उठाने और समाधान तक सुझाने का दमखम रखती है इसीलिए यह साहित्य साधकों के साथ – साथ आम पाठकों को भी प्रिय है।
डॉ० उपमा शर्मा का लघुकथा संग्रह ‘कैक्टस एवं अन्य लघुकथाएँ’ में सम्मिलित लघुकथाएँ ये बताती हैं कि, उपमा जी का संवेदनशील व्यक्तित्व उनकी लेखकीय चेतना को किस प्रकार प्रभावित करता है। ऊपर लिखी बातों में से सभी बातों का समावेश मुझे इस संग्रह की लघुकथाओं में मिला ,कथाकार ने विविध विषयों के माध्यम से अपने समय का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत किया है।मैंने इस संग्रह को पढ़ ,अपने अनुसार विषयों के आधार पर लघुकथाओं को वर्गीकृत करने का प्रयास किया है ,हालाँकि बहुत सी लघुकथाएँ एक से अधिक वर्गों में स्थान रखती हैं।इसी वर्गीकरण का ब्यौरा प्रस्तुत है जो संग्रह के अनुक्रम से मेल नही रखता ।

‘तलाश’ सांकेतिक सुंदर बिम्ब प्रयोग जिसमे चुनरी का नारी अस्मिता के प्रतीक के रूप में प्रयोग,सटीक सधे संवाद इस संवादात्मक शैली की लघुकथा को अनूठा बनाते है ,यह सामाजिक विसंगति पर करारा प्रहार करती है।इसी स्वर की अन्य लघुकथाएँ हैं ‘अनाथ बच्चा’ जिसमे एक अनाथ बच्चे को किसी की सहायता बालश्रम कानून के डर से नही मिल पाती और ठंड व भूख से उसकी मृत्यु हो जाती है, समाज को आइना दिखाती, यह लघुकथा पाठक को उद्वेलित करती है। वहीं बेटों को अधिक महत्त्व देने वाले पुरुष प्रधान समाज में ‘ बहन बेटी ‘ लघुकथा बेटियों या स्त्री के महत्व को स्थापित करने का प्रयास करती है।
गरीबी , समाज की एक बड़ी विडंबना है जिसके अलग -अलग रूप को चित्रित करती संग्रह में कई लघुकथाएँ है जिनमे से ‘सूतक’ ,पूजा ,उम्मीद ,तितली,गरीब की पीड़ा प्रमुख हैं। सूतक में मृतक के घर का स्वादिष्ट भोजन सूतक लगने के कारण फेंकने के बजाय कामवाली बाई अपने बच्चों के लिए रख लेती है उसका यह कहना -“गरीबी ,भूख से बड़ा कोई सूतक नही “ पाठक हृदय को द्रवित कर देता है।‘पूजा’ जिसमें एक संपन्न महिला द्वारा इष्टदेव को अर्पित करने लाई गई भोग सामग्री एक गरीब बच्चे को देने पर दूसरी महिला के टोकने पर उस सहृदय महिला द्वरा कही गई पंक्ति- “यदि यह पाप है, तो यह पाप मैं रोज करने के लिए तैयार हूं” आडंबर को किनारे कर मानवीय आदर्श को स्थापित करती है। अन्य लघुकथाओं में भी यही पीड़ा अनुभूत होती है।
स्त्री को मुखर करती लघुकथाएँ परिवर्तन, बंद मर्तबान, सीता न बनना, भंवर, प्रतिकार, कैक्टस, पहचान, अस्तित्व, नया सबक, तहज़ीब, बीया, अहिल्या, जननी, आदि लघुकथाएँ स्त्री जीवन की समस्या, पीड़ा, विडंबनाओं को प्रस्तुत करती है। ‘परिवर्तन’ लघुकथा में लड़के की माँ का भावी बहू से यह कहना “खाना तो बाई भी बना सकती है पर वो मरीज को सही नही कर सकती” सामाजिक परिवर्तन का सुखद संदेश देती है।जहां अब तक कामकाजी महिलाओं पर घर-बाहर की दोहरी जिम्मेदारी होती थी वहीं आज की पीढ़ी समानता पर ज़ोर देते हुए घर-बाहर के कामों में आपसी सामंजस्य की पैरवी करती है,नए प्रतिमान स्थापित करती है।‘बंद मर्तबान’ जो कि लघुकथा में घुटन के संकेत के रूप में उसे अधिक प्रभावी बनाता है ,यह गृहणी द्वारा अपने आप को घुटन से बाहर निकालने के सफल प्रयास की कथा है।‘सीता न बनना’ एक पत्र शैली की सुंदर लघुकथा है, जिसमें एक माँ अपनी बेटी के वयस्क होने पर उसे पत्र के माध्यम से सीख देती है कि जीवन में कभी अत्याचार न सहना सीता नही दुर्गा बनना ।‘प्रतिकार’ एक कामकाजी महिला के विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने काम को छोड़ गृहणी बन कर रह जाना लेकिन लंबे अंतराल के बाद अपनी खुशी के लिए निर्णय ले, फिर से कामकाजी बनना हर स्त्री के होठों पर मुस्कान बिखेर देता है।यह लघुकथा स्त्री जीवन में प्रतिकार के महत्व को स्थापित करती है। ‘भंवर’ में दबाव में न आकर अपनी मर्जी के फैसला करने वाली वंशिका आज की सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है। पर्यावरण पर आधारित मकड़जाल और सजा पाठक को झकझोरते हुए उसे प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से बचने, पर्यावरण की रक्षा के लिए सचेत करती है। 360 डिग्री टर्न, बौनी व्यवस्था, कायजा, हार ने शासन पर करारा प्रहार किया है। ‘360 डिग्री टर्न’ बढ़ते अपराध पर शासन , सरकार की चुप्पी पर चिंता जताते समूह में जब एक ऐसी पार्टी बनाने की बात चलती है जहां सब ईमानदार हों तो सारे लोग 360 डिग्री का टर्न ले लेते हैं बहुत उत्कृष्ट लघुकथा है जो मानव स्वभाव की विडंबना को उद्घाटित करती है ।सभी को अपराध भ्रष्टाचार से शिकायत है पर जब उसे मिटाने के सच्चे प्रयास की बारी आती है तब वे सारे लोग मुँह मोड़ लेते हैं। इस लघुकथा में शीर्षक ही पंच पॉइंट भी है। तो वहीं हनी ट्रैप ने बाज़ारवाद पर शिकंजा कसा है किस तरह लोग ऑफर के मीठे प्रलोभन में फांस कर ठग लिए जाते हैं और उन्हें खुद ही इसका भान नही होता। हनीट्रैप एक बेहद खूबसूरत सांकेतिक शीर्षक को सार्थक सिद्ध करती लघुकथा है।‘दंश’ में दंगों की भयावहता को उजागर करते हुए कथाकार ने बताया है कि, इस प्रकार की घटनाएँ किस प्रकार व्यक्ति को विवेकशून्य कर देती हैं। दंगे के कारण दम्पति द्वारा अपने ही बेटे के दरवाजा खटखटाने पर भी दंगाइयों के होने के भ्रम और डर की वजह से द्वार न खोलना और बाद में बेटे का शव दरवाजे पर होने की घटना पाठक को मार्मिकता की चरम पर ले जाता है। ‘हिजड़ा’ पाठक को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि वास्तव में हिजड़ा कौन ? ‘मिट्टी’ वैश्याओं को सम्मानपूर्वक जीवन देने उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने के वास्तविक प्रयासों की कथा है। ‘अधूरी ख्वाहिशें चकाचौंध के पीछे के अंधेरे से पर्दा उठाती है।‘टीस’ में अपनों के परायेपन का दर्द है। ‘सुख’ लघुकथा केवल पूजापाठ आदि उपक्रमों से सुख नही मिलता उसके लिए परिवार के सदस्यों का एक दूसरे के प्रति आत्मिक लगाव, प्रेम आवश्यक है ,इस बात की पुष्टि करती है।
वर्तमान पूंजीवादी उत्तर आधुनिकता ने सबसे अधिक मानवीय संबंधों को प्रभावित किया है। समष्टि से व्यष्टि पर केंद्रित होते मनुष्यों के संबंधों की डोर कमजोर होकर टूटती जा रही है। माता-पिता और संतान के संबंधों के वर्तमान स्वरूप को स्पष्ट करती उसहित, बचपन, नीम का पेड़, खुशी, फादर्स डे, रीप्ले आदि लघुकथाएँ पाठक के मन मस्तिष्क में हलचल पैदा करती है। ‘उसहित’ में त्योहार पर अपने बच्चों की उत्सुकता से प्रतीक्षा करती माँ का बार- बार दरवाजे तक जाकर देखने पर टोकने से वह पति से कहती है “मैं तो मोहल्ले के बच्चे अमरूद न चुराएँ ये देख रही हूँ” यह कथन पाठक के मन को भिगो देता है। ‘नीम का पेड़’ भी एक खूबसूरत सांकेतिक लघुकथा है जिसमें नीम का पेड़ का अर्थ घर के बुजुर्गों के साये से है,जिसमें फल भले ही न हों पर उनकी उपस्थिति सदा लाभदायक है, इस बात को पुख्ता करती है।‘बचपन’ एकल परिवार में आया के भरोसे रहने वाली नव्या नामक बच्ची का दर्द पाठक के दिल में टीस पैदा करता है।‘पैट’ की मासूम लवी का अकेलापन आपकी आँखें जरूर नम करेगा। ‘आकांक्षा’ की रुचिका का छिनता बचपन भी आपको परेशान करेगा ।और ऐसी घटनाओं से जुड़े लोगों को एक बार अपने किये पर सोचने को विवश जरूर करेगा। पौराणिक संदर्भों का बहुत सुंदर उपयोग डॉक्टर उपमा की ‘शापित देवी’,’गुरु’,’चयन’,’अभिमन्यु नही मैं’, लघुकथाओं में देखने को मिलता है।
‘शापित देवी’ में घर पर होने वाली देवीपूजा में पंडित जी द्वारा उच्चारित सटीक श्लोकों और समाचार में लड़कियों, औरतों पर होते अत्यचार की घटनाओं का संयोजन एक अलग तरह की वर्णनात्मक और संवादात्मक शैली की उम्दा लघुकथा को सामने लाता है।वहीं ‘गुरु’ में प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग द्रोण और एकलव्य का संदर्भ लेते हुए योग्यता को महत्व देने की बात कही गई है । शीर्षक चयन में कथाकार को महारत हासिल है ये बात तो अब तक ऊपर लिखी बातों से स्पष्ट हो ही चुकी है। गिद्ध, बोन्साई, तलाश, हिजड़ा, बन्दमर्तबान, हनीट्रैप, बीया, हुर्छन, कायजा, 360 डिग्री टर्न, तितली और गर्भपात बड़े ही सांकेतिक रूप में प्रयुक्त शीर्षक है। जिसमे गर्भपात में कथाकार ने वर्तमान समय के कलाकारों, रचनाकारों द्वारा अपरिपक्व रचना के जन्म को ‘गर्भपात’ शीर्षक दिया है। वहीं ‘गिद्ध’ मानव समाज के उन स्वार्थी लोगों को इंगित करती है जो किसी की मृत्यु में भी अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे होते हैं। बिया का शाब्दिक अर्थ है बीज जो स्त्री शक्ति का प्रतीक है। जहाँ माँ बेटी को औरत के लता होने, बगैर सहारे के नष्ट हो जाने की बात कहती है वहीं आत्म निर्भर बेटी माँ को यह आभास कराती है कि स्त्री लता नही बीज है। यही एक पंच लाइन और शीर्षक के साथ संवादों का सुंदर ताना-बाना लघुकथा को श्रेष्ठ बनाता हैं। ‘हुर्छन’ और ‘कायजा’ ने मुझे हिदी डिक्शनरी की सहायता लेने को मजबूर किया वहीं ये शब्द मेरे मस्तिष्क में छप से गये जैसे, हुर्छन एक स्वार्थी महिला की कथा है जो अपने स्वार्थपूर्ण कार्य को भी परोपकार के रूप में समाज में प्रस्तुत करती है। ‘कायजा’ संकेतों और बिम्ब प्रयोग का बहुत अच्छा उदाहरण है।कायज़ा का अर्थ होता है घोड़े की लगाम में बँधी हुई वह डोरी जो दुम में फँसाई जाती है। यानि डोरी आदि का वह फंदा जिसे कहीं भी फँसाया जा सकता है।
विकास वही कायज़ा है जिससे घोड़े (जनता) को हाँका जाता है। जिसमे शासन के विकास के नाम पर दिखावे और वास्तविकता के अंतर को बेपर्दा करती यह बहुत अच्छी लघुकथा है। उपमा जी की भाषा सरल, संतुलित है बिम्ब, प्रतीकों, संकेतों का प्रयोग करना वे भलीभांति जानती हैं। शीर्षक रचना को पढ़ने की उत्सुकता जगाने वाले हैं। उपमा जी की लघुकथाएँ संग्रह के नाम ‘कैक्टस’ के अनुरूप ही आकर्षक और चुभती हुई हैं। एक अच्छे संग्रह को पढ़ने के बाद जो प्रसन्नता मैंने अनुभव की, आशा करती हूँ लघुकथा प्रेमियों को यह संग्रह ‘कैक्टस और अन्य लघुकथाएँ’अवश्य ही पसंद आएगा।लघुकथा के विद्यार्थियों के लिए यह संग्रह बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा ऐसा मेरा विश्वास है। लघुकथा जगत में डॉ०उपमा की उपस्थिति को मजबूत करते इस प्रथम संग्रह पर मेरी बधाई और आगे के सोपानों के लिए शुभकामनाएँ।
– कैक्टस और अन्य लघुकथाएँ: डॉ. उपमा शर्मा, पृष्ठ संख्या :167, मूल्य:300रुपये, संस्करण:2023, प्रकाशक: ज्ञान विज्ञान एजूकेयर , नई दिल्ली