गढवाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
तेज बथौं कि वजै सि, मैहला द्वार – मोरि खड़ाक–खड़ाक की आवाज करिक खुल गेनि।
हॉल म सज्यां फानूस, थरथराण लगि गेन।
पाळि पर टँगी फोटु, संगमरमरा मिळवटा मां पड़ी गे अर सीसा, चटकी कि चूर–चूर ह्वे गे।
पाळि पर यकी कील दिखेणी छै।
कुछ मैना इ ह्वे होला।
तेज बथौं, हॉल म कै तरौं सि फिर भितर ऐ गे। वे थैं हॉल म एक पैलि पछांणक कील दिखे।
कील पर पैलि से बड़ी फोटु टँगी छै।
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