
‘‘एक तो चार बजे शाम को खाना खाने आये। थोड़ा आराम तो कर लो। कुछ बातें भी करूँगी। अभी जाओगे तो नौ बजे रात तक लौटोगे। तुम्हें रोज देर हो जाती है। तुम्हारे बिना मैं भी खा नहीं पाती।’’ कहकर अनुभूति शर्मा ने पति की टाई पकड़ ली और सोफे पर थोड़ी देर बैठ लेने का इशारा किया, किंतु नरोत्तम नागर ने हलके झटके से टाई छुड़ाई और कहा, ‘‘अनु मैंने कितनी बार कहा, खा लिया करो। मैं काम में लगा रहता हूँ। व्यापार में समय तो देना ही पड़ता है। धन आएगा तो सुख तुम्हें ही मिलेगा। ओ. के. बाई।’’
फिर नरोत्तम नागर ने स्प्रिंग के दरवाजे खोले, खटखट सीढ़ियाँ उतरे और कार का हार्न बजा सर्र–से ओझल हो गए। अनुभूति तीसरी मंजिल की खिड़कियों से एकटक देखती रही। मुड़कर देखा, तो स्प्रिंग डोर अब भी हिल–हिलकर चों–चों कर रहा था। उसने हाथ पकड़कर दरवाजे स्थिर किए और ड्रांइगरूम के कोने मे पड़े छोटे से ऐक्वेरियम को देखने लगी। लाल–लाल मछलियाँ शीशघर में ऊपर–नीचे, दाएं–बाएं तैर रही थीं। जब कभी तेज दौड़तीं तो शीशे की दीवार से टकरा जाती। अनुभूति खड़ी–खड़ी सोचने लगी। पहले तो ऐसा नहीं था, और हमारा तो प्रेम विवाह था। नरोत्तम की बेहद चाहत पर मैं समर्पित हुई थी। उसने कहा था, वह मुझे आगे भी पढ़ने देगा, लेकिन बी. ए. पास करने के बाद उसने एम. ए में मुझे दाखिला लेने नहीं दिया। कहता है, पढ़ने की क्या जरूरत? पैसे हैं, और होंगे, घर सँभालो। कोई बच्चा भी तो नहीं कि मन लगाऊं। पहले तो हम शाम को घूमने भी जाते थे, परंतु साल लगते–लगते सबकुछ बंद। इस घर में मैं एक अदद खूबसूरत सामान बनकर रह गयी हूं।
आस–पड़ोस के लोग–बाग मिलते–जुलते भी नहीं। उन्हें पसंद भी नहीं। हमारा शहर छोटा जरूर था, पर इतना बेगाना नहीं। यह महानगर तो बेजान है। शादी के बाद इस अपार्टमेंट मे आयी और दूसरी सुबह पूरब की खिड़की खोली। सामने के अपार्टमेंट की तीसरी मंजिल की बालकनी में एक युवक उसे बेझिझक देखते हुए लगातार खड़ा रह गया था। दूसरे दिन, तीसरे दिन भी जब उसे खड़ा पाया तो उसने नरोत्तम से बातें बता दी। तबसे खिड़की बंद रखी गयी।
अनुभूति ने मछली के शीशे पर से आंखें उठायीं तो खिड़कियों पर झूलते हुए पदेर् पर ध्यान गया। खजुराहों की मिथुन–मूर्तियों से चित्रांकित ये पदेर् कुछ धूमिल हो गए–से लगे। उसने कमरे के सारे पर्दे खोलकर धोबी को दिये जानेवाले कपड़ों के ढेर में डाल दिये। पूरब की खिड़की सालभर से खुली न थी। पर्दे खोलने वक्त उसने देखा, पर्दे और खिड़की के बीच मकड़ी का जाला लग गया है।
आज साढे़ चार बजे अनुभूति ने जैसे ही खिड़की खोली, वह हैरान रह गई। उसके मुँह से अचानक एक आवाज निकली, ‘‘माई गॉड, यह लड़का पिछले सालभर से इंतजार में ऐसे ही खड़ा है?’’
-0- ( 17 अगस्त 2025 को स्वर्गवास)