गार्ड ने हरी झंडी दिखाई और इंजन के हॉर्न संग ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगी। लाल साड़ी और गहनों से सजी प्रिया सिमटकर खिड़की के पास बैठ गई।
आँखें बाहर ही कुछ खोजती रहीं। मम्मी-पापा के उदास चेहरे धुँधले हो गए। हाथ हिलाते हुए उसने गालों तक बह आए आँसू पोंछ लिये।
धीरे-धीरे सब कुछ पीछे छूटता जा रहा था। साथ था तो आशु का साँवला मुस्कराता चेहरा।
आशु! उसकी आँखें फिर भरभरा कर बरसने लगीं। शादी के साल भर बाद ही तो आशु को कैंसर ने ऐसा जकड़ा कि…और उसकी दुनिया रंगहीन हो, श्वेत-श्याम रंगों में सिमट कर रह गई। आँखें ही नहीं पथराई, वे जड़ भी हो गईं।
और एक दिन….सामने खड़ी पहाड़-सी जिंदगी का वास्ता देकर उसके हाथ फिर पीले कर दिए।
‘‘आशु! आशु!’’ खिड़की संग चलता चेहरा? ‘‘आशु!’’ आँखें बेचैन हो उसे ढूँढने लगीं।
‘‘प्रिया! थक गई होगी, थोड़ा आराम कर लो।’’ बड़े प्यार से कंधे पर हाथ रख डॉ. प्रफुल्ल ने प्रिया की आँखों में झाँकते हुए खिड़की बंद कर दी….
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