
शाम की खिड़की खुली। ट्रे सजाकर कमरे के अंदर लेकर आती विभा के हाथ अचानक कांप गये। ऑफिस से लौटकर सोफे पर पसरे अजय के हाथों में इस वक्त विभा का ही फ़ोन था , किसकी स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए उसकी त्यौरियाँ चढ़ती चली जा रही थीं। हाथों पर महसूस होती गर्म चाय की छीटों की जलन के बावजूद विभा ने अपनी चिंता छिपाने को एक झूठी मुस्कुराहट ओढ़ ली, जो अगले ही पल अजय की तेज चिल्लाहट से गायब भी हो गई।
“ये क्या ऊटपटाँग लिखके पोस्ट करती रहती हो तुम !! हैं ? और ये लोग कौन हैं ,जो वाह वाह लिखे डाल रहे हैं ? बन्द करो ये सब फ़ौरन !समझीं ?
विभा ने कुछ हिम्मत बटोरी- ” वो…कविता…लिखी थी…बस .”
अच्छा!!” अजय की आवाज़ ज्यादा तेज थी या फर्श पर पटक दिए गए कप के टूटने की खनक… बताना मुश्किल था। फिर भी झुककर टुकड़े बीनती विभा की कराह उसे सुनाई पड़ ही गई ,”…ख़ुद तो अपने फ़ोन को खोलने का…पासवर्ड तक नहीं…बताते…और…हमें…!”
सोफे से उठते अजय के चेहरे पर सोशल मीडिया का आभासी सभ्यता का मुखौटा चटखने लगा था।
खिड़की बन्द हो चुकी थी।
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