जून 2026

पुस्तकखुदा करे सब खैरियत हो     Posted: January 1, 2020

सब खैरियत है(लघुकथा-संग्रह): मार्टिन जॉन ,प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर ।लघुकथा संग्रह मूल्य : 200 रूपये,पृष्ठ : 128 ,प्रथम संस्करण :2018

लगभग एक दशक लम्बी यात्रा के बाद भी आलोचकों ने लघुकथाओं को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, तथापि अनेक लघुकथाकारों ने इस विधा को स्थापित करने में सतत प्रयास किया है और वे अपने इस प्रयास में सफल भी हुए हैं जिनकी लेखन-क्षमता ने देर-सवेर पाठक जगत में अवश्य ही एक विशिष्ट स्थान बनाया है। पिछले एक दशक के दौरान छपने वाली लगभग हर पत्रिका में लघुकथाओं का छपना इस विधा की कामयाबी की दास्ताँ कहता है, अभी पत्रिकाओं में लघुकथाओं पर विशेषांक आना भी नए इतिहास की ओर संकेत करता है, जोकि निसंदेह इस विधा के रचनाकारों, पाठकों और उन्हीं में से तैयार हुए समीक्षकों-आलोचकों के लिए सुखद स्थिति की ओर इशारा करता है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ से ही अन्य विधाओं की तुमना में लघुकथाएँ अधिक लिखी गयी हैं। लघुकथाकारों की एक पूरी पीढ़ी इस दौरान अस्तित्व में आई है। इन सबसे अलग मार्टिन जॉन जैसे सशक्त रचनाकार पश्चिमी बंगाल के सुदूर ग्रामीण अंचल में रहकर हिन्दी के रचनाकार के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

भारतीय साहित्य के इतिहास में बंग-साहित्य का विशिष्ट स्थान रहा है, मार्टिन भी उसी परम्परा के रचनाकार हैं। वे स्वयं लिखते हैं-“तीन दशकों से लघुकथा लेखन से जुड़ा हूँ, मुझे इस बात का मलाल नहीं कि संख्या की दृष्टि से अपने समकालीन लघुकथाकारों की तुलना में कम ही लिखा…. । बकौल अशोक भाटिया-“मार्टिन जॉन हिन्दी लघुकथा के एक उपेक्षित लक्ष्मण हैं।“…बीसवीं सदी के अंतिम दशक से इक्कीसवी सदी के इस वर्ष तक की लघुकथा यात्रा पर गौर करें तो पाएँगे कि शिल्प और कथा-विन्यास से लेकर कथ्य चयन पर लेखकों की स्वयं की रचनाओं में एक बड़ा बदलाव आया है। बलराम अग्रवाल के शब्दों में कहूँ तो यह बदलाव इसे ‘कौंध’ से बहुत आगे की विधा सिद्ध करता है। मार्टिन की लघुकथाएँ अपने समय की गंभीरता से पड़ताल करती हैं, मार्टिन एक ऐसे रचनाकार हैं जो विधा के पूर्व-निर्धारित मानदंडों की परिधि में घूर्णन मात्र करना ही लेखकीय कर्म नहीं समझते, वे कथ्य के अनुसार ही शब्द-संचयन करते हैं, और वहीँ से उनकी रचनाएँ विस्तार पाती हैं, उनकी रचनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि लघुकथा विधा के शब्द-विस्तार और शब्द संकुचन की बातें महज थोथरी हैं, जिन्हें समय के साथ स्वयं ख़ारिज हो जाना है, यथार्थ के साथ मुठभेड़ रचनाकार का स्वयं का सगल है, और यही सबलता उनकी रचनाओं में बार-बार झलकती भी है।  

मार्टिन नौवे दशक के प्रखर रचनाकार के रूप में प्रकट होते हैं। तथापि उन्होंने संखात्मक की अपेक्षा गुणात्मक दृष्टि से लेखन किया है। प्रस्तुत संग्रह की भूमिका में मार्टिन स्वयं  लिखते हैं-“लेखन की प्रचुरता किसी लेखक की श्रेष्ठता का पैमाना नहीं बल्कि रचनाओं की गुणवत्ता, स्तरीयता और सशक्तता ही श्रेष्ठता का मानदंड है।’ वे स्वयं भी इस उक्ति पर खरे उतरते दिखाई देते हैं। स्वयं पाठक भी संग्रह की इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों में खुद इस कथन को प्रमाणित होते हुए पाता है।

अशोक भाटिया एक स्थान पर लिखते हैं-“रचना का सबसे बड़ा नियम यही होता है कि उसे लिखने का कोई नियम नहीं होता; स्व-अनुशासन तो होता ही है| जिस प्रकार उद्गम के पश्चात नदी अपने दो किनारे स्वयं बनाती है, इसी प्रकार रचना का वस्तु-जल अपना स्वरूप स्वयं निश्चित करता है| विश्व-साहित्य में शास्त्र सदा रचना के पीछे चला है| श्रेष्ठ रचनाएँ ही नए-नए प्रतिमान बनाया करती हैं और यह क्रम अनवरत चलता रहता है| जड़ता का भला रचना से क्या सम्बन्ध?’ मार्टिन की रचनाओं की बात करें तो अशोक भाटिया के उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। लघुकथा ‘सुपरस्टार’ में अभिनेता रौशन के माध्यम से पुरुष अहम और लिंगभेद के सामाजिक कोढ़ पर प्रहार हो या ‘धर्मरक्षक’ के माध्यम से भगवान के सामर्थ्यवान होने पर प्रश्न या फिर ‘मेक इन इण्डिया’ के बहाने बाजारवाद की अभद्र मानसिकता और ग्राहक का दोहन, और ‘खबर की मौत’ की आड़ में प्रशासन और मिडिया का संवेदनाओं के स्तर पर पतन दर्शाना, लेखक की संजीदगी, निडरता और लेखकीय कौशल को प्रमाणित करता है। कितनी ही जगह मार्टिन व्यंजनात्मक प्रयोग का सहारा भी लेते हैं। ‘झूठ बिकता है’, बापू के आँसू’, सबसे बड़ी खुशी’,’ख्वाबों के परिंदे’ कुछ ऐसे शीर्षक हैं, जहाँ पाठक पढ़ते हुए स्वयं चिंतन करता है और रचना के अंत तक आते-आते उसका मस्तिष्क कुलमुलाने लगता है, शब्द उसे झकझोरने लगते हैं। एक उदाहरण देखें-’ऊँचें लोगों ने बापू की मूर्ति इतनी ऊँची शायद इस सोच के तहत बनवाई थी कि हम जैसे आम आदमी की पहुँच उस ऊँचाई तक कभी न हो।’(बापू के आँसू), …. ‘धर्म इतना कमजोर क्यों है, जिसकी रक्षा के लिए रक्त बहाना पड़ता है।’(धर्मरक्षक),…. ‘वो ब्लडी संजीव कुमार तुम्हारे साथ हॉटसीन …।’(सुपर स्टार)……यहाँ लेखक अनायास ही संवाद में माध्यम से एक बड़े वर्ग की आवाज बनकर लेखकीय दायित्व का निर्वाह करता है।

मरुभूमि के लघुकथा विशेषांक में अतिथि संपादकीय में डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा लघुकथा को परिभाषित करते हुए अपने विचार प्रकट करते हैं- ‘लघुकथा आंतरिक सत्य की सूक्ष्म और तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है जो पाठक की चेतना को झकझोरती है तथा यह आज के व्यस्त जीवन में पाठक को कम समय में अधिक प्रदान करने की क्षमता रखती है।’ जॉन मार्टिन की समस्त लघुकथाएँ पढकर ये वक्तव्य पुष्ट हो जाता है। ‘डिस्कनेक्ट’; ‘डिलीट होते रिश्ते’; ‘झूठ बिकता है’;  ’डिस्चार्ज’, ‘लोकतंत्र की बेदी पर’ जैसी अनेक लघुकथाओं की लम्बी फेहरिस्त है जो सत्य की सूक्ष्म और तीक्ष्ण अभिव्यक्ति की कसौटी पर मानक लघुकथाएँ कही जा सकती हैं।

लघुकथा में जहाँ लघुकथा का प्रारम्भ बहुत महत्वपूर्ण माना जाता हैं वहीँ लघुकथा का अंत उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है, इस संदर्भ में योगराज प्रभाकर का मत कुछ यूँ हैं-’लघुकथा का अंत करना एक हुनर है। लघुकथा का अंत उसके स्तर और क़द-बुत को स्थापित करने में एक बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिकतर सफल लघुकथाएँ अपने कलात्मक अंत के कारण ही पाठकों को प्रभावित करने में सफल रहती हैं। विद्वानों के अनुसार लघुकथा का अंत ऐसा हो जैसा लगे अचानक किसी ततैया ने डंक मार दिया हो, जैसे किसी फुलझड़ी ने आँखों को चकाचौंध कर दिया हो, जैसे किसी ने एकदम सुन्न और सन्न कर दिया हो ! एक ऐसा धमाका जिसने बैठे-बिठाए हुओं को हिलाकर रख दिया हो, जो इतने प्रश्न-चिन्ह छोड़ जाए कि पाठक एक से अधिक उत्तर ढूँढने पर मजबूर हो जाए। जो विचारोत्तेजक हो, जो पाठक के विचारों को आंदोलित कर दे। जो किसी भी सूझ वाले व्यक्ति को मुट्ठियाँ भींचने पर विवश कर दे। यहाँ मार्टिन की कुछ लघुकथाओं को देखा जा सकता है- डाकू और डाकू हसीनाओं के किस्से न सुनने से शुरू कर ‘तरक्की’ का अंत देखिए-’अब ये सारे असेम्बली और पार्लियामेंट में एक्टिव हो गए हैं।’ ‘लोकतंत्र की बेदी पर’ लघुकथा में मुर्दा जलने के पुश्तैनी काम को कथ्य के रूप में लेकर अंत इस पंक्ति के साथ किया गया है-’ये लो भईया, आपको यह भी नहीं पता कि कल से इलेक्शन होने वाला है। पिछला चुनाव पुलिस वालों ने ज्यादा टाइट कर दिया था तो सिर्फ तीन ठो मिला था।’ ‘मेक इन इंडिया’ में साप्ताहिक बाज़ार को केंद्र में रखकर कथा को बुना गया है, लगता है लेखक स्वयं बाज़ार लगाकर कह रहा हो और हताश हो गया हो-’उसे लगा वे ग्राहक नहीं बल्कि चील-कोए हैं जो उसे नोचने खसोटने के लिए अपनी अपनी चोंच धारकर रहे हैं।’

मार्टिन लिखते हुए किस कदर सम्वेदनाओं के समुन्दर में गोता लगाते हैं, इसका एक उदाहरण देखिये-’….खोलते पानी में किसी ने बर्फ की सिल्ली रख दी। वह ठण्डा पड़ गया। उसकी ऑंखें स्वतः मुँद गई। पिंटू और रिंकू उसके सामने खड़े थे-तमाम तरह की काबिलियत, भरी-भरकम डिग्रियों को सीने से चिपकाए चार साल से बेरोजगारी की मार झेलता उसका बेटा पिंटू।… मुरझाया, कुम्हलाया, चिडचिडया, हताश, निराश, अवसादग्रस्त, समय ही नौजवानी के रस से महरूम निचुड़ा, सिकुड़ा चेहरा।’ समाज में फैली बेबसी, हताशा निराशा का प्रतिफल है ये रचना, पढ़ते हुए मुझे स्वयं लगा कि ये मार्टिन नहीं मैं हूँ जो अपनी आपबीती लिख रहा हूँ।

कुछ अन्य लघुकथाओं की बात की जाए तो ‘ख्वाबों के परिंदे’ आधुनिकता बनाम ममत्व की गाथा है, ‘सबसे बड़ी ख़ुशी’ में विदेशी ऐश-ओ-आराम पर लेखक अपने वतन आकर गुल्ली डंडा खेलने को तरजीह देता है। ‘शुरुआत’ एक मजदूर के दर्द लेखक की मंशा के संवाद को उकेरती रचना है। ‘रामदुलारियों के सपने’ संकेत करती है उस और जहाँ से सांस्कृतिक कार्यक्रमों में परफोर्मेंस के लिए मौलिक एनेंट्स हों। ‘पुरस्कार’ में लेखन ने हिन्दी प्रेमी को ट्रांसफर का तोहफा थमाकर चेताया है कि भाषा प्रेम आपके प्रोफेशन को किस कदर प्रभावित कर सकता है? ‘इश्क, आशिक, और किताब’ समय से आगे की कथा है जिसके माध्यम से लेखक बहुपत्नी, बहुपति के बाद बहुप्रेमी, बहुप्रेमिका की ओर बढती युवा पीढ़ी से समाज को चेताने का प्रयास करता है।

मार्टिन की स्वयं की परवरिश एक धार्मिक माहौल में हुई है तथापि उनकी रचनाओं को पढ़कर एक सुखद अनुभूति ये होती है कि वे हर धर्म में आई कुरीतियों पर जबरदस्त प्रहार करते हैं, प्रस्तुत संग्रह में कई रचनाएँ इसका प्रमाण हैं उदाहरण के तौर पर ‘ईंटो के आँसू’ (मजहबी दंगो पर बेहतरीन रचना, जैसे ईंट तक में सम्वेदना है वहीँ मानव की सम्वेदना को दीमक ने चाट खायी हो), ईश्वर की इच्छा’ (ईश्वरवाद पर करारा तंज), ‘मजहब की लाश’(पढ़कर ऐसा लगता है आज कबीर जैसा फ़कीर जिन्दा होता तो उसकी लाश पर भी कई लाशें और बिछा दी जाती), ‘भगवान के नाम पर’ (अचानक वह भिखारिन मंदिर की ओर मुड़ी और अपनी लाठी तथा कटोरे को नीचे रखकर दोनों हथेलियों से केले को पकड़ कर चीखने लगी-’देख ले भगवान, तेरे नाम पर मिला सडा केला और पैसे से मिला बढ़िया केला।’)। ‘धर्मरक्षक’ भी दिमाग को झकझोरने वाली रचना है। ‘विभाजक’ भी एक बेहतरीन विमर्श छोडती रचना है।   

मार्टिन कई मायनो में बनी-बनायी रीतियों से अलग संतुष्टिदायक तरीके से रचनाधर्मिता का निर्वाह करते हुए रचना को बेहतरीन अंत तक ले जाते हैं। उनका कहन इतना जबरदस्त है कि जब रचना पाठक की आँखों के सामने आती हैं तो अंत तक जिज्ञासा बनी रहती है पाठक सोचता है आखिर क्या है इसमें? पाठक अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए कथा को अंत तक पढता है।

यदि लेखक के दुर्बल पक्षों की बात की जाए तो मुझे कहना होगा कि लेखक को जज्बाती होने से बचना चाहिए, मार्टिन स्वयं इतने भावना-प्रधान हैं कि उनकी रचनाओ में भी यह बात प्रमुखता से प्रकट होती है। वे भावना के रचयिता हैं। ‘असहिष्णुता’ एक बढ़िया लघुकथा हो सकती थी, लेकिन अत्यधिक भावप्रवणता के चलते दृष्टान्त के नजदीक पहुँच जाती है, हाँ ये कहना भी उचित है कि दृष्टान्त के लिहाज से यह अपनी ऊँचाई को स्वतः ही प्राप्त करता है। ‘आतंक’ शीर्षक को सिद्ध करती रचना है तो ‘कोई खबर नहीं’ एक अनावश्यक रचना है जिसे लेखक को स्वयं की रचना होने के मोह को त्याग संग्रह में स्थान नहीं देना चाहिए था। ‘वजूद अपना-अपना’ में रचनाकार चाहता तो अनावश्यक विस्तार से बच सकता था। ‘ये कौन सी डगर है’ भी कहानी के नजदीक प्रतीत होती है। (संस्कार किसी प्लेट में परोसा गया खाना नहीं है, नेता तुम्ही हो कल के लिखते समय नेताजी सुभाष जैसे नेता की कल्पना की गयी होगी, आज के नेता उससे अलहदा हैं) ‘मेरा सुप्रीम पॉवर’ में लेखक ने बताया है कि सौन्दर्य के लिए नुमाईश जरुरी है, नुमाइश का सम्बन्ध बाजारवाद से है, यह रचना पाठकों को पढ़ते हुए थोड़ी अटपटी लग सकती है लेकिन वास्तविकता से रूबरू कराती रचना मैं इसे मानता हूँ। विश्वसुन्दरी, ब्रह्माण्ड सुन्दरी, देश सुन्दरी, नगर सुन्दरी का चयन का तरीका और प्रयोजन इस बात से तय होता है कि आयोजकों/प्रायोजकों को कहाँ नया बाज़ार विकसित करना है?

इससे इतर लेखक व्यंग्यात्मक रचनाएँ भी कहने में सक्षम है, ‘लाइक’ एक व्यंग्यात्मक लघुकथा है जिसमें व्यंग्य स्वयं अपनी ऊँचाई पाता है। ‘झूठ बिकता है’ के माध्यम से लेखक ने ‘दिखता है तो बिकता है’ उक्ति को चरितार्थ किया है, यहाँ लेखक बताना चाहता है कि मोस्ट फेवरेट अदाकारा के विज्ञापन से कैसे बिक्री का खेल खेला जा रहा है? ‘सब खैरियत है’ को पढ़कर संतुष्टि होती है कि वास्तव में यह प्रतिनिधि रचना पुस्तक शीर्षक को जस्टीफाई करती है।
मैं अधिकतर कोई भी लघुकथा पढ़ते हुए सबसे पहले उसके विषय पर ध्यान देता हूँ। यहाँ विषय स्वयं रचना को बयान करते हैं यह रचनकार और रचना दोनों की खूबसूरती है। मार्टिन के इस संग्रह में कुछ लघुकथाएं पारिवारिक विषयों के विभिन्न तानों-बानों पर भी बुनी गयी हैं हालांकि पारिवारिक विषय अधिकतर पुराने होते हैं और रचनाएँ संदेश की बजाय सीख देती हुई हो सकती हैं, उनमें से कई लघुकथाएं न केवल पठन योग्य हैं बल्कि चिंतन योग्य भी।

कोई भी प्रयास सौ प्रतिशत सम्पन्न हो जाये, ऐसा होना संभव नहीं। कुछ लघुकथाएं बोध-कथाओं सरीखी भी हैं। कुछ शीर्षक ऐसे भी हैं जो पाठकों को रोचक नहीं लग सकते हैं अथवा उनके दिमाग में उत्सुकता नहीं जगा सकते हैं। लघुकथाकारों को न केवल पाठक वर्ग बढ़ाने के लिए बल्कि वर्तमान पाठक संख्या के अनुरक्षण के लिए भी शीर्षकों पर अधिक ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है। कुछ लघुकथाएं अंत तक पहुँचने से पूर्व ही अपने अंत का भान करा देती हैं तो कुछ लघुकथाएं ऐसी भी हैं कि जिनका अंत लघुकथा की प्रकृति के विपरीत निर्णयात्मक भी है। लेखक को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा। एक बात और जो मैं अक्सर आलोचना लिखते हुए कहता हूँ-’वर्तनी और व्याकरण’, मार्टिन भी इससे अछूते नहीं हैं, गैर-हिन्दी बेल्ट से होने के चलते वर्तनी को अनदेखा किया जा सकता है लेकिन हिन्दी व्याकरण की गलतियाँ पढ़ते हुए जरुर अखरती हैं।

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