वह सदैव अपनी पत्नी से कहता रहता कि , “जानेमन !मेरी जिन्दगी तो एक खुली किताब की तरह है …जो चाहे सो पढ़ ले ।’’ इसी खुली किताब के बहाने कभी वह उसे अपने कॉलेज में किए गए फ्लर्ट के किस्से सुनाता , तो कभी उस जमाने की किसी प्रेमिका का चित्र दिखाकर कहता – “ये शीला …उस जमाने में जान छिड़कती थी हम पर….हालाँकि अब तो दो बच्चों की अम्मा बन गई होगी।”
पत्नी सदैव उसकी बातों पर मौन मुस्कुराती रहती | इस मौन मुस्कुराहट को निरखते हुए एक दिन वह पत्नी से प्रश्न कर ही बैठा –“यार सुमि ! हम तो हमेशा अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर तुम्हारे सामने रख देते हैं , और तुम हो कि बस मौन मुस्कुराती रहती हो । कभी अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर हमें भी तो उसके किस्से सुनाओ। ’’
मौन मुस्कुराती हुई पत्नी एकाएक गम्भीर हो गई , फिर उससे बोली-“मैं तो तुम्हारे जीवन की किताब पढ़ – सुनकर सदैव मुस्कुराती रही हूँ ; लेकिन एक बात बताओ ….मेरी जिन्दगी की किताब में भी यदि ऐसे ही कुछ पन्ने निकल गए ,तो क्या तुम भी ऐसे ही मुस्कुरा सकोगे ?”
वह सिर झुकाकर निरुत्तर और मौन रह गया।
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