ब्राह्ममुहूर्त की वेला और गंगा के किनारे तक तंबुओं में टिमटिमाती रोशनी में भक्तजन ‘जय गंगा मैया’ के उद्घोष के साथ गंगा-स्नान करन जा रहे हैं। कुछ गंगा-स्नान का पुण्य लाभ करके लौट रहे हैं। उनमें वे पाँच भी हैं, जो पिछले दिनों से गंगा के एकांत छोर पर अपना डेरा जमाए हुए है। तंबू में प्रवेश करते उनमें से एक बोला, ‘‘यार, आज स्नान में कुछ भी आनंद नहीं आया। एक भी ढंग की चीज नज़र नहीं आई।’’ दूसरे ने टोका, ‘‘अबे चुप भी कर, अभी रात बाकी है। अपनी लाल परी निकाल।’’ तीसरे ने ताश फेंटने शुरू किए। अब वे पाँचों शराब के दौर और ताश की बाजी में खो गए।
एक नारी-स्वर ने पाँचों को चौंका दिया। उनमें से एक बाहर आया तो देखा: एक प्रौढ़ा भिखारिन एक शिशु को गोद में लिये एक अबोध की उँगली पकड़े याचना की मुद्रा में खड़ी है। उसने सिर से पाँव तक उसको भरपूर दृष्टि से देखा और भीतर बुला लिया। पाँचों ने कुछ खुसर-पुसर की और सौदा पटा लिया। भिखारिन ने बच्चे को एक ओर बिठा दिया।
थोड़ी देर बाद ज्यों ही वह बाहर निकली, उनमें एक ने कहा, ‘‘मुझे एक बार फिर गंगा-स्नान करना पड़ेगा।’’
चारों एक साथ बोल पड़े, ”हमें भी।’’
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