गोविन्द मूँदडा (संपादक) एवं अतिथि संपादक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी के सम्पादन में आया ‘पुष्पांजलि’ का अंक बहुत ही प्रभावशाली बना है। अतिथि संपादक की कलम से सशक्त लघुकथा सृजन बारे लिखे शब्द- ‘‘वही रचना जीवन्त हो सकती है, जो अपनी प्रभविष्णुता से पाठक को प्रभावित करती है। जिस रचना में गहन संवेदना होगी, नवीनता होगी वही अधिक प्रभावी रचना होगी, सोचने को विवश करती है।’’
हरभगवान चावला की लघुकथा ‘माली’ जिसमें एक माली की पौधों के प्रति उसकी उदात्त सोच को दर्शाया है। माली बच्चों के लिए माँ समान होता है, तो कोई माँ अपने बच्चों को कोई आँच कैसे आने दे सकती है, डॉक्टर द्वारा बेड रेस्ट दिए जाने पर भी वह पौधों को बिना पानी मुरझाते हुए कैसे देख सकता है। उसकी आत्मा उसे कचोटती है। मानवीय मूल्यों को उजागर करती बेहतरीन लघुकथा।
सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘अपनी-अपनी बरसात’ आर्थिक विषमता को दर्शाती, देश में गरीबी- अमीरों के बीच गहरी होती खाई, पाठकों को सोचने को विवश करती है।
महेश शर्मा की लघुकथा ‘जायका’ एक नए विषय के साथ उपस्थित है। लघुकथा का अंत कैसे पाठक को हिलाकर रख देता है, इसमें देखा जा सकता है। अंत पढ़कर पाठक हतप्रभ रह जाता है और उसके बाद पाठक के सोच की प्रक्रिया आरम्भ होती है- माँ के हाथों से बनाए खाने में जो आनंद,जो मन को तृप्ति की अनुभूति होती है, बाजार के खाने में कहाँ।
रचना श्रीवास्तव की लघुकथा ‘चकोर’ गूँगे के गुड़-सी अनुभूति करवा रही है। कुछ कहते ही नहीं बन रहा। लेखिका ने इस लघुकथा में जो कथ्य बुना है, लाजवाब है, शायद इसी को प्रेम कहते हैं। प्रेम शरीर का नहीं, मन का विषय है, आत्मा का विषय है, प्रेम में रंग रूप या कोई कोई शारीरिक कमी कहाँ देखी जाती है, उसमें तो मन की सुनी जाती है, जो चीज मन को भा जाए है फिर मन किसी की कहाँ सुनता है।
प्रियंका गुप्ता की प्रतीकात्मक लघुकथा‘भूकम्प’ नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती बेहतरीन लघुकथा है। भूकम्प यहाँ नकारात्मक विचारों का भी है। जब हमारे विचार नकारात्मक हो जाते हैं तो वह भी एक तरह से भूकम्प ही है। नकारात्मक विचार व्यक्ति की बुद्धि, चेतना,उसकी अपनत्व की भावना सब को दबोच लेती है; परन्तु उसी भूकंप में जिसमें एक बेटा अपने पिता को भूकंप में इसलिए छोड़ आना चाहता है कि उसे पिताजी पर कोई खर्च न करना पड़े; परन्तु वही पिता उसी नालायक बेटे के बेटे को बचा लाता है। एक घटिया सोच के बेटे के मुँह पर तमाचे जैसा है। थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहती है लघुकथा।
सीमा सिंह की लघुकथा ‘समझदार’ संकेत करती है कि किसी के सामने इतना भी न झुको कि लोग उसे सीढ़ी बना ले, ऐसी समझदारी भी किस काम की कि उसे मूर्ख ही समझा जाने लगे। गलत बात का विरोध होना चाहिए। अपनी आत्मा की आवाज सुननी चाहिए। लघुकथा की पात्र मंजरी जब गलत बात का विरोध करती है, परिवारवालो की जैसे नीद सी टूटती है। विचारप्रधान लघुकथा।
छवि निगम की लघुकथा ‘फाँक’ बुजुर्गों की दयनीय स्थिति को उजागर करती चिंता एवं चिंतन को बाध्य करती लघुकथा है।
भावना सक्सैना की लघुकथा ‘परिवर्तन’ समसामयिक मुद्दे पर रचित है। आजकल फेसबुक पर सब ‘अपनी प्रतिभा’ को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। सब रातो-रात स्टार बनना चाह रहे हैं। लघुकथा का कथ्य पाठक को चरमोत्कर्ष पर ले जाता है और जब अंत में फेसबुक का जिक्र आता है, तो न जाने कितने ही चित्र पाठकों की आँखों के सामने तैरने लगते है।
सभी लघुकथाओं के साथ चित्र बेहद आकर्षक एवं प्रतीकात्मक लिये हुए है। शानदार अंक के लिए संपादन मंडल एवं विशेष रूप से रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को बधाई। मेरी लघुकथा ‘दो प्यासे परिन्दे’ भी पढ़ सकते हैं।
राधेश्याम भारतीय