जून 2026

देशगहरा विश्वास     Posted: July 1, 2015

अपने घर की तरफ वह मुड़ा ही था कि सामने से आते हुए हफीज भाई से भेंट हो गई। दुआ सलाम के बाद हफीज भाई ने कहा– ”भाई हरिराम! मैं तुम्हारे घर से चला आ रहा हूँ। तुम्हें पता ही होगा कि शहर में कई जगह दंगे हो रहे हैं और किसी भी वक्त यहाँ भी दंगा हो सकता है। इसलिये मैं अपनी बेटी अमीना को तुम्हारे घर छोड़ आया हूँ। वैसे तो यह मुसलमानों का मुहल्ला है पर मेरा घर मेन रोड पर सबसे पहले पड़ता है। बाहर से हमला हुआ तो सबसे पहले मेरे ही घर पर होगा। तुम्हारा घर अंदर है और महफ़ूज है इसलिए… क्या हुआ? तुम्हारी आँखों में आँसू?”
”हफीज भाई, मैं भी तुम्हारे ही घर से लौट रहा हूँ। जाते वक्त मैं पिछली गली से गया था, इसीलिए तुमसे मुलाकात नहीं हो पाई। दरअसल मैं भी अपनी बेटी सरला को तुम्हारे घर यह सोचकर छोड़ आया हूँ कि इस मुहल्ले में तुम्हारे मजहब के लोग ज्यादा हैं। हमारे धर्म के लोगों के तो बस दो–चार घर ही हैं। मेरी बेटी मेरे घर से भी ज्यादा तुम्हारे घर में सुरक्षित रहेगी….”
”हमारी इज्जत साँझी है…. सुख–दुख साँझे हैं,फिर भी….? मेरे होते तुम चिंता मत करना….तुम्हारी बेटी, मेरी बेटी। एक ही बात है….”
एक–दूसरे के गले लग गये थे वे दोनों। विवशता और गहरा प्यार दोनों की आँखों से पानी बनकर बह निकला था। इतने विश्वास और गहरे रिश्ते के बावजूद हम पर बार–बार ये खतरे क्यों मँडराने लगते हैं?

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