साहब को प्रार्थना पत्र देते हुए वह बोला-‘‘सर कई बार एप्लीकेशन दे चुका हूँ, पर अभी तक सुधार होकर मार्कशीट नहीं आयी है।’’
प्रिंसिपल-नाम के अक्षरों में इतनी जल्दी सुधार होकर नहीं आता बेटा! कुछ समय लगता है। कुछ लेना-देना पड़ता है।’’
वह बोला-‘‘कितना पड़ेगा सर जी!’’
प्रिंसिपल-बाबू से मिल लो, लगभग दो-तीन हजार तक मान कर चलो।’’
वह मुँह बिसूरते हुए बोझिल-उदास कदमों से चल पड़ा।
प्रिंसिपल के पास में बैठे एक अध्यापक उसे पीछे से जाते देख बोले, -सर यह छात्र बड़ा परेशान लग रहा है। ये यूपी बोर्ड वाले पता नहीं क्यों इतनी गलतियाँ करते हैं।’’
प्रिंसिपल-कमाई के लिए। ठीक भी है। कुछ हमारा फायदा होता है। कुछ बोर्ड में बैठे बाबुओं का।’’
‘‘लेकिन गरीब बच्चा तो दुःखी और परेशान होता है।’’
“आप और हम क्या कर सकते हैं। जब ऊपर ही तमाम गिद्ध बैठे हैं नोचने के लिए।’’
वह अध्यापक उठे और फौरन प्रिंसिपल के रूम से बाहर आ गए। उनका दम घुट रहा था। ऐसा लग रहा था, गंदे बूचड़खाने से बाहर आएँ हो, वहाँ की दुर्गंध से,सड़न से, उनका मन खराब होने लगा, जी मिचलाने लगा।
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