जून 2026

देशगुप्त-धन     Posted: August 1, 2024

कल रात ही बुड्ढा मर गया…बस पता आज दोपहर चला, जब काँखता-कराहता बुड्ढा अपनी कोठरी से इतना दिन चढ़ने के बाद भी नहीं निकला…।

सबसे पहले अहसास बड़की बहू को ही हुआ, काहे की आदतन बुड्ढा रोज उसको ही हर बात के लिए आवाज लगाता था । उसकी कोठरी में बाबा आदम के ज़माने की जो घड़ी लगी थी, वह चलती नहीं थी… और अगर चलती भी, तो कौन- सा उसको दिखाई ही पड़ता ? उसके साथ तो, जब जागे, तब सवेरा वाला हाल था…। जब पेट कुलबुलाया, तब ही अपनी कोठरी से रेंगते-रेंगते वाली चाल से बाहर निकलकर आँगन में रसोई के पास खड़े होकर बड़की बहू को अपनी कँपकँपाती स्वर-लहरी से आवाज लगाता…बदले में बड़की बहू अपने कमरे से ही सप्तम् सुर में चिल्लाकर उसे बता देती, “रोज ही पता रहता है कि कोठरी के बाहर स्टूल पर खाना ढका रहता है, पर नहीं…जब तक दुनियावालों को पता ना चले कि वह अभी तक भूखे हैं, तब तक करेजा कैसे ठंडा हो इनका…? राम जाने बुड्ढे ने शादी क्यों नहीं की…? शादी कर लेता तो कम से कम उसकी औलादें भुगतती…हमारी छाती पर मूँग तो न दलता…”

इस भुनभुनाहट में छोटकी बहू पर भी गुस्सा निकलता, पर धीमे-धीमे…। घर का आधा से अधिक खर्चा छुटके के कमाई से ही चलता था, इसलिए बड़की बहू छोटी बहू से खुलकर पंगा नहीं लेती थी।

बड़की बहू और भी जाने क्या-क्या भुनभुनाती रहती, पर बुड्ढे पर कोई असर ना होता…। वह उसी तरह डगमगाते हुए वापस अपनी कोठरी की ओर मुड़ जाता और खाना खाकर थाली आँगन में लगे हैंडपंप के पास सरका देता । जब तक उसके बड़े भाई ज़िंदा रहे, बुड्ढे को कभी सीधे-सीधे अहसास नहीं हुआ कि वह अपने भतीजों और उनकी पत्नियों के आसरे है। पर तीन साल पहले भैया क्या गए, बुड्ढे को ये  बहुएँ मानो हमेशा याद दिला देती हैं कि वो उनके मत्थे मुफ़्त की रोटी तोड़ रहा, सिर्फ इस वजह से कि उसके आगे-पीछे कोई नहीं।   खैर! पेट में निवाला डालकर वह हमेशा की तरह अंदर जाकर कोठरी का किवाड़ उड़काकर अपनी खटिया के नीचे से एक जंग खाई संदूकची निकालता…अपनी धोती के किनारे बँधी चाबी से उसका बड़ा- सा ताला खोलता और जाने उसमें से क्या-क्या निकालकर मिचमिची आँखों के पास ले जाकर देख-देखकर वापस रख देता…।

एक बार किवाड़ खुला रह जाने की वजह से बड़की बहू ने किसी काम से अंदर झाँक लिया था, तब से उसकी भुनभुनाहट में उस संदूकची को लेकर भी बुड्ढे को गरियाया जाने लगा था।

कुल मिलाकर बुड्ढा हर किसी पर बोझ ही था, तो उसके मरने से घर में हर किसी ने राहत की साँस ही ली। किसी रिश्तेदार को तुरंत बुलाने की जहमत किसी ने नहीं उठाई, बस आसपास के दो-चार लोगों की सहायता से फटाफट ले जाकर उसका क्रिया कर्म भी निपटा दिया गया। कौन यहाँ कोई उसकी  औलादें बैठी थीं, जो तेरहवीं-बरसी तक मातम करती, सो रात के खाने के बाद ही तय पाया गया कि उसकी कोठरी धुला-पुँछवाकर, उसकी शुद्धि के लिए वहाँ पुताई करवाने के बाद उसको अनाज-पानी रखने का भंडार- गृह बना दिया जाए। बुड्ढे के रहते गाँव से आया भी सभी कुछ रसोई घर में रखना पड़ता था। चाहते तो सब थे, पर उसके जीते जी उसे निकालना संभव भी नहीं था ना। आखिर यह सारी जमीन जायदाद थी, तो उसी की…और उसने बड़ी चालाकी से अपनी सेहत रहते वसीयत भी कर दी थी, जिसमें साफ-साफ लिखा था-यदि उसने अंतिम साँस कहीं और ली, तो सारी जायदाद एक ट्रस्ट को चली जाएगी…बनिस्बत उन सबके…।

कोठरी से बुड्ढे का सारा सामान पहले ही बाहर फिंकवा दिया गया था, पर किसी को उन सामानों में कोई संदूकची कहीं नहीं मिली। किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ा था, क्योंकि उसकी बाबत सिर्फ बड़की बहू को ही पता था।

सबके सो जाने के बाद अपना कमरा बंद करके बड़की बहू ने चुपके से पलंग के नीचे बड़ी जतन से छुपाई  संदूकची को निकालकर उसका ताला खोला। उसे पूरी आशा थी सब कुछ उन सब को सौंप देने के बावजूद बुड्ढे ने जरूर इस संदूकची में कोई गुप्त धन छुपाकर रखा था, तभी तो रोज इसे ताकता-जाँचता था।

संदूकची खुली तो बड़की बहू की आँखें आश्चर्य से फैल गई। संदूकची में थे तो बस- कुछ टूटी चूड़ियों के टुकड़े…बालों में बाँधा जाने वाला मटमैला-सा लाल रिबन…एक पैर की पायल…एक चुनरी और बहुत जतन से रखा हुआ एक जर्जर मटमैला सा कागज…जिस पर लगभग मिट चुकी इबारत में लिखा था-

‘मुझे हमेशा तुम्हारा इंतजार रहेगा…।’

बड़की बहू के सामने बुड्ढे का सारा गुप्त-धन बिखरा पड़ा था, पर वह खुश नहीं थी…।

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