डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति का नाम पंजाबी लघुकथा में आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पंजाबी में मिनी कहानी लेखन ही नहीं बल्कि इसके विकास और संवर्धन में डॉ.दीप्ति ने एक लम्बी उद्देश्यपरक यात्रा की है।साहित्य उनके लिए एक महती सामाजिक सरोकार के रूप में रहा है, महज शौक और मनबहलावे के रूप में नहीं। उनकी समूची रचना-धर्मिता मानवीयता के पक्ष में और झूठ व आडम्बर के विरोध में रही है। अंधेरे से उजाले की ओर, अविश्वास से विश्वास की ओर, असंवेदनशीलता से संवेदना, वैमनस्य से सौहार्द की ओर यात्रा करती उनकी लघुकथाएँ आम जन की दुःख-तकलीफ़ों को पूरी संवेदना और संलग्नता के साथ प्रस्तुत
करती हैं। यूँ तो डॉ. दीप्ति की साहित्य और साहित्य से इतर चिकित्सा विज्ञान आदि को लेकर ढेरों किताबें प्रकाशित हुई हैं, लेकिन यदि हम उनके लघुकथा लेखन को लेकर बात करें तो पंजाबी में उनके तीन मौलिक लघुकथा संग्रह
– ‘बेड़ियाँ, ‘इक्को ही सवाल’ और ‘ग़ैर हाज़िर रिश्ता’ प्रकाशित हो चुके हैं और अनेक हिंदी पंजाबी लघुकथा संकलनों का इन्होंने संपादन किया है। वर्ष 2014 में डॉ. दीप्ति का पहला हिंदी लघुकथा संग्रह ‘गै़र हाज़िर रिश्ता’ शीर्षक से राही प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है जिसमें उनकी 91 लघुकथाएँ संग्रहित हैं। इस पुस्तक के अंत में पंजाबी के युवा लघुकथा लेखक जगदीश राय कुलरियाँ द्वारा डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति से लिया गया साक्षात्कार भी शामिल किया गया है जो लघुकथा, विशेषकर पंजाबी लघुकथा को लेकर डॉ. दीप्ति की सोच को भी हमारे सम्मुख रखता है। डॉ. दीप्ति अपने जवाबों में जो बात कहते नज़र आते हैं, उसे वे अपनी लघुकथाओं में भी लागू करते आए हैं। पंजाबी लघुकथा को दिशा देने की उनकी सोच बहुत साफ़ है। वहाँ कोई धुंधलका नहीं है। वह लेखकों, पाठकों के बीच परस्पर विचार-विमर्श का एक पुल बनाते रहे हैं और इस ओर अभी तक पूरे मन से सक्रिय हैं। जो बिन्दु, जो विचार, जो बातें, लघुकथा के विकास, उसके संवर्द्धन के लिए कारगर साबित हो सकती हैं, उन्हें न केवल स्वयं अपनाते हैं अपितु पंजाबी की नई लघुकथा पीढ़ी को भी उसकी ओर निरंतर प्रेरित करते रहते हैं।
‘ग़ैर हाज़िर रिश्ता’की सभी लघुकथाओं से गुज़रने के पश्चात लेखक की लघुकथा विधा के प्रति स्पष्ट सोच और धारणा से पाठक रू-ब-रू होता है। ये रचनाएँ साधारण -सी स्थितियों से असाधारणता की ओर यात्रा करती प्रतीत होती हैं। लघुकथा को असरदार, प्रभावशाली बनाने का हुनर इस लेखक के पास बखूबी है और वह व्यंग्य, ध्वनि अथवा व्यंजना की शक्ति को पहचानते हुए अपनी लघुकथाओं को आकार देता चलता है।
संग्रह में संकलित लघुकथाओं के विषयों की विविधता और उनकी मारक व मर्मस्पर्शी प्रस्तुति देखते हुए यह स्पष्टतः प्रकट होता है कि लेखक किसी एक लीक पर निरंतर चलते रहने का कायल नहीं है। शब्दों के उपयुक्त और सटीक चयन के साथ साथ सहजता को बरकरार रखते हुए रचना की संप्रेषणीयता पर यह लेखक अधिक ज़ोर देता प्रतीत होता है।
जैसा कि ‘लघुकथा’शब्द से ही इंगित होता है कि ऐसी कथा जो लघु हो। अर्थात् ‘संक्षिप्तता’ में प्रभावकारी ढंग से कथा कहने का गुण लघुकथा अपने में समाहित किए है। पंजाबी में यह ‘मिनी कहानी’ नाम के तहत लिखी और पढ़ी जाती है। इसमें भी वही गुण प्रकट होता है जो ‘लघुकथा’ शब्द में है। कहने का तात्पर्य यह कि पंजाबी में लिखी जा रही लघुकथा भी इस गुण को केन्द्र में रखकर कथा को कहती आई है और अभी भी इस गुण को बरकरार रखे है। हिंदी की तरह पंजाबी में भी इसके शिल्प, इसके कथ्य, इसकी प्रस्तुति को लेकर प्रयोग होते रहे हैं और हो रहे हैं। डॉ. दीप्ति की एक बहुत छोटी लघुकथा है – ’सीमा’। यह अपनी संक्षिप्तता में बहुत कसी हुई और प्रभावकारी लघुकथा है और इसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। हदें, सीमाएँ जो मनुष्य ने धरती पर खींची, वे तब मनुष्य के लिए अस्तित्वहीन हो जाती हैं जब वह आँखों से नहीं, दिल से इस धरती के गीतों के सुरीले बोल सुनकर उन्हें पार कर जाता है और उसे खबर भी नहीं होती कि वह किसी दूसरे, दुश्मन देश में प्रवेश कर गया है।
संग्रह की लघुकथाओं के केन्द्र में बच्चे, स्त्रियाँ, पुरुष, बूढ़े-बुजुर्ग लोग अपने अपने ढंग से अपनी बात लेकर प्रस्तुत होते हैं। बच्चों को केन्द्र में रखकर ‘सज़ा, ‘बीज से बीज’ और ‘बैड गर्ल’ लघुकथाएँ पाठक का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेने में सक्षम हैं। इसी प्रकार स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखी अनेक सशक्त लघुकथाएँ इस संग्रह में हैं जिनमें लघुकथा ‘स्वागत’ पर बात करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। उंगली पकड़कर पौंहचे तक पहुँचने वाले पुरुषों की गन्दी और नापाक हरकतों को सामाजिक भय और दबाव के तहत हमारे समाज की स्त्रियाँ चुपचाप सहने को विवश रहती आई हैं। लेकिन लड़कियों के शिक्षित होने पर उनमें अब धीरे धीरे ही सही, पर ऐसी हरकतों का पुरज़ोर विरोध करने और पुरुष को सबक सिखाने का साहस पनपने लगा है। स्त्री अपने हक और अस्मिता की रक्षा के लिए जागरूक हुई है। इसी का श्रेष्ठ उदाहरण हमें ‘स्वागत’ लघुकथा में मिलता है।
आज हमारी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि हम सच बोलकर काम नहीं करवा सकते। हमें झूठ बोलने को विवश किया जाता है। इस व्यवस्था में रहकर यदि मनुष्य को अपने हित में काम करवाना है तो उसे झूठ का सहारा लेना पड़ता है। इस बात को ‘माँ की ज़रूरत’ लघुकथा बखूबी रेखांकित करती है और अपने पाठ के बाद कुछ सवाल छोड़ जाती है।
लेखक अपनी बहुत सी लघुकथाओं में ‘सांकेतिकता’ का सहारा भी लेता है। यह सांकेतिकता लघुकथा में नये अर्थ और शक्ति पैदा कर देती है। ‘डाकिये’ को लेकर लिखी एक लघुकथा ‘अ-संवाद’ इसका अद्भुत उदाहरण है। पचास रुपये का मनीआर्डर देते हुए पोस्टमैन एक एक करके पहले दस दस के नोट बढ़ाता है। फिर एक पाँच का, फिर दो के दो-दो नोट और अन्त में एक रुपये का नोट। और फिर वह मनीआर्डर प्राप्त करने वाले की ओर देखने लगता है। इस लघुकथा में जो अनकहा है, वही इसकी शक्ति बनता है। यदि वह कह दिया जाता तो लघुकथा अपने उद्देश्य में असफल रह जाती।
लेखक चूंकि पेशे से एक डॉक्टर है, इसलिए वह मनुष्य की भीतरी तहों को समझने-पकड़ने की एक मनोवैज्ञानिक दृष्टि भी रखता है। विशेषकर स्त्रियों, बूढ़ों और बच्चों के मन के भीतर की तहों तक वह पहुँचने में सफल होता है। हमारे समाज में बूढ़े-बुजुर्ग लोगों की स्थितियाँ बड़ी भयानक हैं। वे अकेलेपन और उपेक्षा के शिकार होते हैं। घर परिवारों में उनकी हालत बड़ी दयनीय होती है। इस संग्रह में अनेक ऐसी संवेदना भरपूर लघुकथाएँ हैं जो इन्हीं बुजुर्ग व्यक्तियों की दुःख-तकलीफ़ों को विभिन्न कोणों से बयान करती हैं जैसे – ‘दिन रात का फर्क़, ‘दीवारें’‘हमदर्दी, ‘बाप की आत्मा’। ये लघुकथाएँ बूढ़ों-बुजुर्गों की दशा-दुदर्शा को बयान करती सफल और विशिष्ट लघुकथाएँ हैं। ‘असली बात, ‘कानून पसंद’ पुरुष मानसिकता को प्रकट करती बेहतरीन लघुकथाएँ हैं। वर्जनाओं के घेरे में आने वाले स्त्री-पुरुष के रिश्तों को बड़ी खूबसूरती और सूक्ष्मता से पकड़ने की सफल कोशिश हमें ‘तुम्हारे लिए’ और ‘नाइटी’ लघुकथा में मिलती है।
इस संग्रह की लघुकथाओं को पढ़ने के बाद यह साफ़ हो जाता है कि लेखक की लेखकीय दृष्टि और उसकी सोच कितनी व्यापक है। वह समाज के हर हिस्से पर अपनी पैनी नज़र रखता है और अपने आसपास के सामाजिक यथार्थ से आँखें नहीं मूंदता। समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता का ज़हर, असंवेदनशीलता, अंधविश्वास, अमानुषिकता, उन्माद, रिश्तों में दरकन, धार्मिक पाखंड और धार्मिक उन्माद, गरीबमार, बच्चों की मनोभावनाओं के संग खिलवाड़, विश्व स्तर पर फैला बाज़ारवाद का शिकंजा, बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा, वैमनस्यता, हर वस्तु का राजनीतिकरण। कहने का तात्पर्य यह कि डॉ. श्याम सुंदर ‘दीप्ति’ एक बेहद सजग और जागरूक लेखक है और अपने समय तथा समाज से गहराई तक जुड़ा है। वह कड़वे सामाजिक यथार्थ को अपनी रचनाओं में एक सामाजिक कार्य मानकर अभिव्यक्ति देने के लिए प्रतिबद्ध है।
डॉ. दीप्ति की लघुकथाओं में पाठक को अपनी गिरफ्त में लेकर सोचने को विवश करने की अद्भुत क्षमता है। पाठक पर उसका असर बहुत देर तक रहता है। पढ़ी गई रचना के बाद पाठक यदि स्वयं से आत्मसाक्षात्कार करने को विवश होता है, भले ही कुछ पल के लिए तो निःसंदेह रचना की सामाजिक और लेखकीय सौद्देश्य पूरी हो जाती है।
अपनी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों, जर्जर हो चुकी परंपराओं, अंधविश्वासों पर प्रहार करने की लेखक की इच्छा उसके सामाजिक सरोकारों और सामाजिक उद्देश्य को प्रकट करती है। लेखक लेखक होने से पूर्व पहले एक मनुष्य और सामाजिक प्राणी है। उसका लेखन महज एक शौक और स्वयं को लेखक कहलाने तक के लिए नहीं होता। उसकी अपने समाज और पूरी मनुष्यता के लिए एक अलिखित प्रतिबद्धता होती है जिसके चलते वह अपने लेखन को सौदेश्य बनाता है। कहना न होगा कि डॉ. श्याम सुंदर ‘दीप्ति’ अपनी रचनाओं में इसी सामाजिक सोद्देश्य को बनाये रखने में पूरी शक्ति लगा देते हैं और हर गलत, अतर्कपूर्ण बात जो समाज और व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसका अपनी रचनाओं में विरोध करते दीखते हैं। वह मनुष्य को अधिक जागरूक, सजग और बेहतर बनाने की कामना लेकर ही अपना लेखन करते हैं।
‘मुसीबत’, ‘दादी’, ‘साइकिल, ‘भूख का धर्म, ‘कम्बल, ‘माँ, ‘खून का रंग, ‘पाठ, ‘फासला, ‘जात’, ‘खुशबू, ‘डर’ जैसी अन्य बहुत सी लघुकथाएँ इस संग्रह में हैं जिन्हें पढ़कर निःसंदेह डॉ. दीप्ति के साथ साथ पंजाबी लघुकथा पर गर्व और प्रसन्नता की अनुभूति होती है। ये वो लघुकथाएँ हैं जिन्हें पढ़कर पंजाबी की नई पीढ़ी के लघुकथा लेखक अच्छा और बेहतर लिखने की प्रेरणा ले सकते हैं। ‘गै़र हाज़िर रिश्ता’ संग्रह की समस्त लघुकथाएँ पंजाबी हिंदी के लघुकथा प्रेमियों के साथ एक ऐसा रिश्ता बनाने में पूर्णतः सक्षम हैं जो कभी गै़र हाज़िर नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
-आर जैड एफ़ -30 ए, दूसरी मंजिल,एफ़ ब्लॉक, काली मंदिर के पीछे, वेस्ट सागर पुर,
पंखा रोड, नई दिल्ली-110046
फोन : 09810534373
ग़ैर हाज़िर रिश्ता (लघुकथा संग्रह),लेखक – डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति;राही प्रकाशन, एल-45, गली नं. 5,करतार नगर, दिल्ली-110053,मूल्य: 300 रुपये।
