
“दादा! इस बार फसल के लिए डर लग रहा है।” सुखिया ने अपनी चिंता गाँव के प्रधान के सामने रखी।हर बार की बाढ़ आधी फसल को निगल जाती और पीछे रह जाती किसान की मेहनत रोते बिलखते।
“कोशिश तो कर रहा हूँ बाँध के प्रार्थना पत्र की मंजूरी की। देखो सरकार के कानों में जूँ रेंगती है कि नहीं।” प्रधान ने बुझे मन से जवाब दिया।
चौपाल पर बैठे सभी लोग सन्नाटा ओढ़कर बैठ गए। उमस भरी धरती पर सन्नाटे की चादर अजीब सी दुर्गंध दे रही थी। यह दुर्गंध भूखी अंतड़ियों से उठ रही थी शायद।
“बारिश न होने की दुआ भी नहीं माँग सकते….।” भीरू ने सन्नाटा तोड़ा।
“बावला है! ऐसी बात सोचना भी मत। क्या पता इंद्र तेरी दुआ सुन ले।” सुखिया ने भीरू को झिड़कते हुए कहा।
” बिना चढ़ावे के इंद्र भी नहीं सुनता।” इतना कह भीरू हँस पड़ा।
“इंद्र के कान तो सुन भी लेंगे, लेकिन वो जो अफसर बैठा है उसे चढ़ावा लेने के बाद ही सुनाई देता है। चलो चढ़ावा दे भी दें अपने-अपने पेट बांधकर लेकिन पिछली बार की तरह बेकार न हो जाए। पानी तो जैसे फसलों की मौत बनकर आता है।” प्रधान बोला।
“तो क्यों बैठे हो सरकार की ओर आँखें टिकाए! अरे कन्हैया क्यों नहीं बन जाते!”
“कहना क्या चाहता है तू भीरू?” प्रधान ने भीरू की ओर कुछ गुस्से से देखा।
” कहना क्या है! रिश्वत देने से अच्छा उस पैसे को बांध बनाने में खर्च कर दो। कान्हा की तरह छोट़ी उँगली तो नहीं लेकिन मेहनती हाथ तो हैं हमारे पास!” भीरू कुछ ऊँचे स्वर में बोला।
भीरू की आवाज़ में शामिल आत्मविश्वासी शब्द सबके कानों में उतर गए, जो भूखी अंतड़ियों की दुर्गंध को हटाने लगे।
कई आवाजें एक साथ सन्नाटे में गूँजने लगी। इस शोर की खनक से उमस भरी धरती भी शीतलता देने लगी।
-0-गुडगाँव हरियाणा