गढ़वालीः अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट
मंदिरै सीढ़ियों बिटि उतरदि बगत खुट्टा भौं कखि पड़ी गेन अचानक दादी कु चश्मा सीढ़ियों का काख परैं गंदी नाळी माँ पड़ी गे । तबारि नीस खड़ा सफाईकर्मी न तुरंत नाळी माँ हाथ डाळि क चश्मा निकाळि अर साफ पाणी म हाथ ध्वे कि मंदिरै सीढ़ियों माँ रखिक अफ्फु डरिक दूर खडू ह्वे गै!
दादी कु हाथ पकड़ी 7 सालै की छुट्टी न दादी तैं पूछी – “कन दादी यु चश्मा त अब छुँये गी न?”
तुम तैं पाप लगलु; किलै कि रोज मंदिर बिटि वापस औंण क बाद तुम यूँ लोखू तैं समणि देखिक अफु पर गंगाजल छिड़कण नी भूलदि छैं।
नतणी की बात सुणिक दादी न सीढ़ियों माँ धार्यूं गीलू चश्मा अपणी सूती साड़ी क पल्ला न साफ कैरी अर सफाईकर्मी तैं नजदीक बुलैकि प्रसाद कु लड्डू देंदी बगत बोली, लगदु च कि अब्बि तक गलत नम्बरौ कु चश्मा पैरी कि मंदिर औंदि छै। अब चश्मा कुछ ज्यादा साफ दिखेणू च।
दादी की बात सूणिक नातणी न उछळि क मंदिरै की घण्टी बजै द्याई।
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