शाम की सैर को वह आलीशान कोठी से निकला, तो गली के चार आवारा आगे पीछे हो लिये। अपनी भाषा में उनसे बतिया लेता था वह । उसे बतियाने दिया जाता थोड़ी देर कि मालिक समझदार थे, जानते थे कि अपनी भाषा में बतियाना ज़रूरी है सबके लिए।
पहला बोला-“जानता है आज हमने बड़े गुरद्वारे तक दौड़ लगाई। क्या आनंद आया! है न रॉकी।”
“हाँ यार मज़ा तो बहुत आया, लेकिन गर्मी ज़बरदस्त है आजकल”, रॉकी बोला।
तीसरा भूरा, बोला, “सुन जैकी, तू चाहे तो तू भी हमारे संग आ सकता है। बलिष्ठ, हृष्टपुष्ट है, जब चाहे इस कमज़ोर से लड़के से पट्टा तुड़ाकर भाग सकता है। आज़ादी का स्वाद चख सकता है।
नहीं यार मैं ऐसे ही ठीक हूँ।
इस पट्टे की बंदिश में क्या सुकून मिलता है तुझे?
हमें देख आज़ाद पंछी, जब जहाँ मन हुआ, चल दिए।
छोड़ यार, उसने बात बदलते हुए कहा- “भूरी संग नहीं है आज तुम लोगों के? कहाँ गई?”
“पार्क में पड़ी है गर्मी से बेहाल, कल पानी नहीं मिला था कहीं उसे। हमें भी बड़ी मुश्किल से मिला था यार। गर्मी में रोटी पानी सबके लाले पड़ जाते हैं।”
“दोस्त इसीलिए नहीं छुड़ाता यह पट्टा। खाना पानी, आराम सबकी चाभी है यह!”