‘‘ठहरिए जनाब, आपको थानेदार जी बुला रहे है।’’ अपनी कार की फाटक खोलने के लिए ज्यों ही मैंने रिमोट की दबाई, ट्रॉफिक सिपाही ने मुझे टोका। ‘आपकी कार ‘नो पार्किग’ में खड़ी है, चालान होगा। अपना नाम-पता बताओ।’’ थानेदार ने उड़ती नजर से मुझे देखा और मेरा चालान भरने लगा। ‘‘प्लीज एक मिनट सर….मैं तो सिर्फ दो मिनट के लिए सामने की दुकान पर रखा मेरा बेग लेने गया था….फिर सर कार तो रोड लाइनिंग के अंदर ही खड़ी की है। मैंने थानेदार से विनती की। ‘‘तुमको यह नो पॉर्किंग का बोर्ड दिखाई नहीं देता क्या? मेरा टाइम खराब मत करो, फटाफट अपना नाम-एड्रेस लिखाओ और अपना डी.एल. (ड्राइविंग लाइसेंस) भी दिखाओ।’’ थानेदार गुर्राया।
कथित नो पॉर्किंग बोर्ड तो उस पर एक पोस्टर चिपका होने से ढका हुआ था, कोई उसे कैसे पढ़ सकता था। लेकिन पुलिस से बहस का कोई फायदा नहीं था। अचानक से आई इस मुसीबत से परेशान सा मैं अपनी कार में रखे डी.एल. को लेने गया। उधर मैंने देखा कि कुछ ही दूरी पर उस रोड लाइनिंग के भी बाहर डीएसपी पुलिस की जिप्सी खड़ी थी और उसमें से शायद उनकी फैमिली उतर रही थी। मैं कुछ क्षण रुका। वह जिप्सी वहीं खड़ी रही।
ये देख लीजिए मेरा डी.एल. और हाँ एक रिक्वेस्ट है सर आपसे। मेरा चालान भरने से पहले उस जिप्सी का भी चालान भरिए।’’ मैंने कुछ दूरी पर खड़ी पुलिस जिप्सी की ओर इशारा करते हुए कहा। इतने में कुछ लोग भी वहाँ इकट्ठे हो गए। उन्होंने भी मेरी बात का समर्थन किया।
थानेदार ने जीप से नीचे उतर कर अपनी गर्दन ऊँची कर वहाँ खड़ी डीएसपी की जिप्सी को देखा और अपना सिर खुजाने लगा।
‘‘आप तो अपनी गलती की परवाह करो…..हूँ…पढ़े-लिखे होकर कानून तोड़ते हो, चलो हटाओ अपनी कार। आइन्दा ध्यान रखना।’’
थानेदार ने अपनी हेकड़ी बरकरार रखते हुए चालान बुक को अपने बैग में रखा और मुझे जाने का इशारा किया।