
हम लोग गाँव छोड़कर सड़क किनारे वाले घर पर रहने लगे थे। मेरे पड़ोस में एक घर बना था पर उसमें कोई रहता नहीं था। कुछ दिनों के बाद एक नया परिवार उसमें रहने आया। हम टकटकी लगाकर उन्हें देख रहे थे। माँ- बाप के साथ दो सुंदर- सुंदर चुलबुली लड़कियाँ थीं, जो बोलती थीं, तो लगता था कि चिडियाँ चटर- चटर कर रहीं हों। उनका सामान उतर रहा था। दो मजदूर काम कर रहे थे और हम ताक में थे कि वे हमसे भी कुछ मदद माँगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सामान के साथ ही पड़ोसी परिवार सहित घर में गुम हो गए।
हमारी नजर उनके दरवाजे पर ही लगी रहती। एक दिन पड़ोसी ने पिता जी के पास आए। ज्यादा बात नहीं हुई। उन्होंने पूछा- “कोई अच्छा बढ़ई हो तो बताएँ।”- पिताजी ने बता दिया। दो दिन बाद एक बढ़ई आया और खटर- पटर शुरू हो गया। मकान के आगे- पीछे जालीदार दरवाजा लग गया। ये जालीदार दरवाजे तभी खुलते, जब उन्हें बाहर आना होता या अंदर जाना होता। इसके अलावा वे चौबीसों घण्टे बंद रहते।
कभी- कभी घर की मालकिन निकलती, तो माँ से कुछ बात करती। फिर वे अंदर हो जाते। शाम को चारों प्राणी ट्रैक- सूट में निकलते और स्टेडियम चले जाते। फिर अँधेरा होने पर आते। माँ आँगन में अक्सर लौकी- कददू रोपती थी। जब फल आते, तो वह पड़ोसी को देने चली जाती। हम इंतजार करते। माँ काफी देर बाद लौटती और बताती कि चाय- पानी करते उसे देर हो गई।
सुबह सुबह दोनों बेटियाँ स्कूल चली जाती और पति- पत्नी ड्यूटी। पड़ोसी का लंबा- चौड़ा सहन दिन भर सूना रहता। धीरे- धीरे उनकी उदासीनता हमें खलने लगी। हम उन्हें देखते, तो न जाने कैसा कसैला भाव उमड़ने लगता। मन ही मन गाली देते और उनकी तरफ थूकते। हमारा माथा तब भिन्ना जाता, जब हमें लगता कि उन्होंने हमारी तरफ गौर ही नहीं किया। मन करता कि क्या ऐसा करें कि पड़ोसी जलभुनकर गालियाँ बकना शुरू कर दें। पर वे हमेशा शांत दिखाई पड़ते। इससे हमारी जलन बढ़ जाती। हम पान खाते तो पड़ोसी की तरफ थूक देते। चिप्स- गुटके और अन्य सामानों की पन्नियाँ उनके द्वार पर ही फेक देते। हमें अंदाजा था कि पड़ोसी जरूर किसी दिन भड़केंगे। माँ उनको अब तक बहुत सारा लौकी, तरोई, कददू और गन्ना दे चुकी थी। अब उन्हें भी उनका व्यवहार खटकने लगा था। जबकि जब वे ये सामान उनके घर में देने जाती तो चाय- नाश्ता जरूर करके आती। पर वे अक्सर कहतीं कि पड़ोसन में बहू- बेटी वाला गुण नहीं है। माँ- बाप ने कुछ सिखाया- पढ़ाया नहीं। अंग्रेजन है। उन्हें सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि हमारी जाति जानते हुए भी उसने उनके पैर नहीं छुए थे; इसलिए उनका मन भी खट्टा हो गया था। इधर हमने पड़ोसी के सामने खूब गन्दगी फैला दी थी और अनुमान लगा रहे थे कि धैर्य का घड़ा फूटने ही वाला है कि अगले इतवार को हमने देखा- एक मजदूर ने साफ- सफाई करके पड़ोसी का अगवाड़ा- पिछवाड़ा चकाचक कर दिया। हमें लगा कि किसी ने हम पर घड़ों पानी डाल दिया और हम ठिठुरकर सिकुड़ गए हों। हम भी जिद पर आ गए। अब हम दोस्तों के साथ वहीं बैठते और गम्मज करते। जितने पुकार- पुड़िया खाते, सब पड़ोसी के सामने फेक देते और धृष्टता से सोचते कि कभी बात चली, तो कह देंगे कि हवा से उड़कर गया है। हवा को हम रोक नहीं सकते।
हमें पूरा भरोसा था कि दो लड़कियों के बाप को हमारे जैसे उजड्ड लोगों का बैठना जरूर चुभेगा। लेकिन ऐसा न हुआ। एक दिन पड़ोसी ने मजदूर लाकर अपने द्वार के दोनों किनारों पर क्यारी बनाकर झाड़ रोप दिए। अब हम इस पार और वो उसपार हो गए थे। झाड़ बड़े और घने हो गए और हमें चुभने लगे।