जून 2026

संचयनचोर-संहिता     Posted: May 1, 2015

‘‘मारो…मारो…..सालों को….।’’
भीड़ दो चोरों को मार रही थी। पहला मरियल, कमजोर चोर रिरिया रहा था, ‘‘म म…..मुझे छो…ड़–दो। मैं तुम्हारे..पाँव …पड़ता हूँ। अरे मार….डा…ला…रे।’’
दूसरा कड़ियल बलिष्ठ चोर, मजबूरन पिट तो रहा था, परन्तु पीटती हुई–भीड़ को घूर–घूर कर देखने का प्रयास कर रहा था।
थोड़ी देर में दूसरे चोर की बलिष्ठ काया, घूरती नज़र का असर होने लगा। भीड़ ‘सेफ गेम’ खेलती हुई बलवान चोर को छोड़ कर, निर्बल चोर की पिटाई में जुट गई।
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