मॉर्निंग वॉक करने के बाद उस पार्क की बेंच पर बैठनेवाले हम दो लोग ही हैं।एक वे वृद्ध हैं जिनके पैरों में साइटिका का दर्द रहता है और एक मैं हूँ जो कराओके गीत की रिकॉर्डिंग के लिए बैठता हूँ। वैसे तो और भी बेंचेस हैं लेकिन वो मेरे पास ही आकर बैठते हैं।मेरे रोमांटिक फिल्मी गीतों को सुनकर वे भी एक–आध भजन सुना देते हैं और सलाह देते हैं – “क्या ये फिल्मी गीत गाते रहते हो!भगवान में मन लगाओ।भजन गाओ।’’ मैं हँसकर टाल देता हूँ। आज भी आ गए।दूर से एक पक्षी की आवाज़ जंगल से आ रही थी। लग रहा था कोई तीन शब्द बोल रहा है। उन्होंने इसी को लेकर मेरे सामने प्रश्न रख दिया- “बताओ ये क्या बोल रहा है?’’ मैं अनभिज्ञ बनकर फिर हँसकर रह गया, तो थोड़ा जोर देकर बोले- “बताओ,बताओ,’’
मैंने भी कल्पना के घोड़े दौड़ाए और उन्हें चिढ़ाते हुए कहा- “ये शायद अपनी प्रेमिका को सुना रहा है कि काटे नहीं कटते ये दिन ये रात, कहनी थी जो तुमसे ये दिल की बात वो आज मैं कहता हूँ,आई लव यू।” अंतिम तीन शब्दों पर मैंने खास जोर दिया। मेरे जवाब पर उन्होंने सड़ा मुँह बनाकर राम–राम कहते हुए अनमनी- सी प्रतिक्रिया व्यक्त की, तो मैंने एक और उत्तर पेश कर दिया- “तुम्हीं तो लाई हो जीवन में मेरे प्यार,प्यार,प्यार।”
अब तो उखड़ते हुए उन्होंने कहा- “अरे ये बोल रहा है जय सिया राम ।” फिर उन्होंने एक कथा सुनाई, जिसमें यही स्थिति एक सब्जीवाले,एक पहलवान और साधु के बीच थी। सब्जीवाले ने कहा- “यह पंछी बोल रहा है- धनिया, मिर्ची,अदरक।” पहलवान ने उसकी बात को नकारते हुए कहा- “नहीं, यह बोल रहा है- दंड, बैठक,कसरत।” अब साधु ने उन दोनों के कथन को झुठलाते हुए कहा- “राम, सीता, दशरथ ।” यह कथा सुनाकर वे उठ खड़े हुए और जाते–जाते बोले- “समझे नहीं समझे, जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत तिहूं देखी तैसी।” पंछी अभी भी तीन शब्दों की पुकार लगाए जा रहा था और मैं अगले गीत की तैयारी में लग गया–‘भूल गया सब कुछ,याद नहीं अब कुछ,बस यही बात,न भूली जूली,आई लव यू।’