कई हफ्तों बाद आज वे फिर मिले। दोनों भरे थे, पर चुप्प! बात वहीं से शुरू हुई, जहाँ से अब तक हर बार शुरू होती रही है। छुटका आज मानसिक रूप से तैयार होकर आया था।
‘‘कहाँ थे इतने दिन?’’ बड़के ने प्रश्न किया।
‘‘यहीं।’’ संक्षिप्त-सा उत्तर छुटके का।
‘‘…..स्कूल का क्या रहा?’’
‘‘बन्द कर दिया।’’
‘‘क्यों?’’ बड़के ने अपनी निगाहें उसके चेहरे पर गड़ा दीं।
‘‘आपस में कॉन्फ्लिक्ट्स हो गए थेे, फिर एडमिनिस्ट्रेशन का नोटिस….।’’
‘‘नोटिस-वोटिस में बहलाने की कोशिश मत करो। तुम्हारे काम करने का ऑपरेशन ही गलत है, सफलता मिले कहाँ से?’’
छुटका चुप रहा।
‘‘तुम्हारी असफलता का कारण है, तुम्हारा अपना गलत क्लैरिफिकेशन…..तुम्हारी अपनी कमजोरी…..।’’
‘‘क्या मैं नहीं चाहता ‘सेट’ होना!’’ छुटके ने कुछ कठोर होने का प्रयास किया।
‘‘पिछले चार सालों में तुमने अपने कैरियर में क्या जोड़ा? तुम्हारी चाह से ही रास्ते नहीं खुल जाएँगे।’’
फिर थोड़ी देर खामोशी छाई रही। भावज चाय रख गई थी। बड़का चाय को सिप करने लगा था।
‘‘रोटी तो कुत्ता भी खा लेता है। जितना तुम ट्यूशनें करके कमाते हो, उतना तो एक पानी की टंकी धकेलनेवाला भी कमा लेता है। फिर तुम…?’’
छुटके को कड़वाहट झेलते देख, बड़का बोलता रहा।
‘‘आपने शायद कुछ ‘प्रूफ’ पढ़ने के लिए बुलाया था….!’’ छुटके ने विषय पर आते हुए कहा।
‘‘पहले अपने आपको मानसिक रूप से तैयार करो, फिर आना। जिन्दगी में कुत्तों की तरह रोटी खाना ही ध्येय….।’’ बड़का निरन्तर मन की बातें उगलता रहा…तभी ध्यान दूसरे भरे प्याले की ओर गया।
‘‘चाय पियो।’’ बड़के ने भरा प्याला उसकी ओर सरकाते हुए कहा।
छुटके का ध्यान उस ओर न था, वह खामोश कुछ सोच रहा था। उसे चुप देख, बड़के ने दुबारा कहा, ‘‘पियो न!’’ उसके स्वर में तल्खी थी।
‘‘नहीं, मैं इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हूँ।’’ छुटके ने दृढ़ता से कहा।
वह उठा और उसके कदम दरवाजे की दहलीज लाँघ गए।
-0-