जून 2026

मेरी पसन्दजीते-जागते पात्र     Posted: January 1, 2023

लेखन की सभी विधाओं में शायद लघुकथा- लेखन जितनी कठिन विधा है, उतना ही कठिन है लघुकथाओं पर लिखना। मेरे जैसे अनभ्यस्त लघुकथा के विद्यार्थी के लिए तो ये और भी मुश्किल है क्योंकि उसकी पूरी समझ लाना अभी बाक़ी है। विद्वजनों को पढ़ना और गुनना अभी बाक़ी है।

फ़िर भी, अपनी पसंदीदा लघुकथाएँ प्रस्तुत करने से पहले , अपने कुछ नोट्स साझा करने की अनुमति चाहूंगी। मेरे लिए लघुकथा लिखना , मतलब उसकी कथावस्तु को पहले भरपूर सोचना , वक़्त लगाकर उसकी जांच करते जाना, विचारों को  बार-बार कागज़ पर उतारना और फ़िर ख़ुद के लिखे को ही बार-बार ख़ारिज करते जाना है। तब तक, जब तक उसके पात्र जीते-जागते दीखने न  लगें, उनके अहसासात ख़ुद लेखक को अपने भीतर  महसूस होने न लग जाएं। ये प्रक्रिया चाहे दिनों हफ्तों या महीनों तक चले , लेकिन पूरी तरह ज़ेहन के आँवें में पकने के बाद ही कागज़( या स्क्रीन)पर उतरे। कहानी और कविता विचारों का विस्तार मांगती हैं , जबकि लघुकथा महीन तराश। नियत शब्द सीमा में कसकर बंधना होता है उसे। एक अच्छी लघुकथा वो है जिसमें न कोई गैरज़रूरी भाव होता है, न  गैरजरूरी क़िरदार और न ही एक भी बेमक़सद लफ्ज़। ऐसी गठन हो उसकी कि जैसे एक भी ईंट खिसकाने से भवन ढह जाता है, वैसे ही लघुकथा से एक भी शब्द हटाया न जा सके। 

ऐसा ही हो उसमें कहन…या  संवाद। ज़रूरी है कि  लघुकथा लिखते हुये  लेखक स्वयं को किनारे कर दे। भाषा और मनोभाव उसके नहीं, पात्रों के अनुरूप हों। सपाट या कृत्रिम नहीं, सहज स्वाभाविक आम बोलचाल ही लघुकथा का सबसे प्रभावी चित्र खींचती है। इसलिए लेखन ऐसा हो जिसमें पात्रों की उम्र, लिंग, वर्ण, वर्ग, वेशभूषा, भाषा,चाल चलन ,उनका मानसिक पारिवारिक सामाजिक राजनैतिक परिवेश इनको अलग से बताना न पड़े। ये सबकुछ  उनकी लघु बातचीत मात्र से प्रदर्शित हो सके। 

विषयवस्तु की बात करें, तो हर बार कोई नया या चमत्कारी प्लॉट नहीं सोचा जा सकता। लेकिन हां, दिल से लिखी रचनाएँ.. दिल तक पहुंचने में सक्षम होती हैं।  लघुकथा ऐसी हो जिसे पहली बार एक रौ में पढ़ा जा सके। लेकिन फ़िर पाठक ठिठक जाएं,  दोबारा पढ़ें। फ़िर शायद तीसरी और चौथी बार भी। कुछ ऐसा हो उसके प्रस्तुतिकरण में जो मन को बांध ले, हर बार नए मायने निकालकर सामने रख दे। लघुकथा चाहे एक या दो ही लिखी जाए मगर ऐसी हों कि बरसों बाद भी अगर ज़िक्र हो तो वो रचना पाठकों की स्मृति को ठकठका दे।

एक और चीज़ जो मुझे जरूरी लगती है, वो है अपने सुधी पाठकों पर विश्वास रखना। कई बार लघुकथाकार किसी दृश्य, या भाव या पात्र,  सामाजिक समस्या या किसी नैतिक मूल्य को इतना अधिक समझाने लग जाते हैं कि लघुकथा व्याख्यान में बदल जाती है। उसकी स्वाभाविक खूबसूरती चली जाती है। मुझे लगता है, अगर लेखक में सम्प्रेषण की  क्षमता हो, तो पाठक उसे भलीभांति समझने में भलीभाँति सक्षम हैं । 

प्रसन्नता है कि इन्हीं मापदंडों पर आधारित लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। हमारे मार्गदर्शक के रूप में हमारे आदरणीय वरिष्ठ लघुकथाकार इसी परिप्रेक्ष्य में निरन्तर श्रेष्ठ सृजन कर रहे हैं। सौभाग्य है उन्हें पढ़ना। उनकी लघुकथाएँ बेहद प्रभावी एवं प्रिय हैं, लेकिन उनके विषय मे कुछ भी लिखना सूरज को दिया दिखाना होगा। अतः अपनी  सूक्ष्म समझ और अपर्याप्त अध्ययन के मद्देनजर मैं उन दो अन्य लघुकथाओं का उल्लेख करना चाहूँगी, जो अपेक्षाकृत नये लघुकथाकारों ने लिखी हैं और जो मुझे पसंद आयीं। मापदंडों पर खरी उतरती ये दोनों ही रचनाएं बदलते वक्त के दबाव को झेलते समकालीन परिवार के बारे में हैं। पढ़ते हुए लगता है जैसे पाठक के रूप में हम भी लघुकथा में चित्रित परिवार के ही सदस्य बन गए हैं। इसीलिए जो चुनौतियाँ ये परिवार झेलते नज़र आते हैं, जैसे संघर्ष उन्हें करने पड़ते हैं और अंत मे जिस तरह ये दोनों लेखक नाज़ुक पारिवारिक मूल्यों को कायम कर ले जाते हैं वो दिल को छू जाता है। 

माधुरी महलवाला जी की  लघुकथा ‘सामंजस्य ‘ में कोई संवाद नहीं। केवल एक माँ की फ़िक्र ही क़िरदार का काम कर जाती है। मल्टीनेशनल कंपनी, वर्क फ्रॉम होम जैसे लफ़्ज़ों का प्रयोग बिल्कुल सहज है। ये बिल्कुल हमारे-आपके आसपास की ही बातें  लगती हैं। हाल में ही इन परिस्थितियों से गुज़रे हैं हम सब जब एक ही घर के भीतर अनेकों मकान बन गए थे…हर सदस्य का अपना कोना और वहीं से ऑनलाइन पढ़ाई या बाक़ी कामकाज। उस व्यस्तता और सम्वादहीनता के दौर ने हर परिवार को कमोबेश प्रभावित किया ही था। यही कारण है कि इन अपने-से लगते पात्रों से सहज जुड़ाव महसूस होने लग जाता है। ” भले ही एकदू-सरे के लिए वक़्त कम था, परवाह ज्यादा थी ” जैसा छोटा वाक्य कितनी बड़ी आश्वस्ति दे जाता है। आखिरकार सब पूर्ववत हुआ…पारिवारिक ढांचा भी, रिश्ते भी।” अरसे बाद उन्हे सुकून की नींद आने वाली थी ” ये वाक्य पाठक के होंठों पर मुस्कान छोड़ जाता है। 

इसी तरह दूसरी लघुकथा ‘भूकंप’ में प्रियंका गुप्ता जी ने भी आधुनिक परिवारों में बुजुर्गों की सामान्यतः अनदेखी और दुर्दशा की बात की है। लेकिन बिना बेटे-बहू को खलनायक बनाये। ये लघुकथा एक बड़े फ़लक की ओर इशारा करती है, जहां  वर्तमान पीढ़ी दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। बमुश्किल गृहस्थी की गाड़ी खींचते पति-पत्नी के पर उनके अशक्त और अक्षम होते जाते बुजुर्गों, और अपने बच्चों की भी जिम्मेदारी का बोझ हुआ करता है। जबकि संसाधन कम होते जाते है। ख़ुद की शारीरिक और मानसिक सीमाएं भी तनाव की वजह से टूटने की कगार पर हैं। ऐसे में भूकंप एक प्रतीक है, जो उसे मजबूर करता है कि वो सिर्फ़ एक विकल्प को ही चुनें, अपने पिता को या बच्चे को।  दुविधा मार्मिक है, पर लघुकथाकार ने इसे बोझिल होने से बचा लिया है। ये तथाकथित भूकम्प सिर्फ़ उनके घर को ही नहीं,उनके अंतर्मन को भी हिला डालता है। ” वो गिरते-गिरते बच गया था ” ये अल्फ़ाज़ केवल एक बेटे को ही नहीं , अपने पिता के प्रति उसकी अपाहिज़ मानसिकता को भी उबार लाते हैं। 

प्रस्तुत हैं उक्त दोनों लघुकथायें। सादर एवं साभार

1-सामंजस्य / माधुरी महलवाला

आज  माधवी की आंखों में फ़िर से नींद नही थी। परेशानी का कारण था वो सभी पारिवारिक बिखराव की पढ़ी सुनी घटनाएं जो उनकी चिंता बढ़ाये जा रही थी। उसके बेटे बहू की भी नई शादी थी। बेटे का ऑफिस दिन का था और मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत बहू का काम वर्क फ्रोम होम होने के बाद से ही शाम से लेकर देर रात तक का। न साथ बिताने का वक़्त था उनके पास, न सामंजस्य बैठाने का। दोनों के बीच बढ़ती  दूरियां  माधवी की परेशानी को भी बढ़ा रही थी।  उसका छोटा-सा परिवार भी कहीं ……इसी अंदेशे से कई रातें करवट बदलती रही माधवी की आंखों से नींद आज भी कोसों दूर  थी ।

            तभी अचानक  खटर पटर की आवाजों से  वह चौंक गयी। कहीं उनमें कोई झगड़ा तो नहीं…….  

जल्दी से माधवी उनके कमरे की तरफ बढ़ी,लेकिन बेटे को  रसोई से निकलते देखकर  ठिठक गयी। उत्सुकतावश उसने झांक कर देखा ,बेटे ने बहू के सामने काफी का प्याला रखकर उसके कंधे पर हाथ रखा और बहू ने मुस्कराकर अपना सर उसकी ओर झुका दिया.

 माधवी की चिंता दूर हो गयी। बच्चों के पास वक़्त भले ही कम था, एकदूसरे की परवाह ज्यादा थी।वापस आकर वो मुस्कराते हुए चादर ओढ़ कर लेट गयी। अरसे बाद उसे सुकून की नींद आने वाली थी ।

2-  भूकंप / प्रियंका गुप्ता

अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास-सी पत्नी कमरे में आई, “जल्दी बाहर निकलिए… । बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या…भूकंप आ रहा। चलिए तुरंत।” वह उसकी बाँह पकड़ कर लगभग खींचती हुई उसे घर से बाहर ले गई।

पत्नी को यूँ रुआंसा देख कर जाने क्यों ऐसी मुसीबत की घड़ी में भी उसे हँसी आ गई। बाहर लगभग सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था। एक अफरा-तफरी का माहौल था। कई लोग घबराए नज़र आ रहे थे। कुछ छोटे बच्चे तो बिना कुछ समझे ही रोने लगे थे।

सहसा उसे बाऊजी की याद आई। वह तो चल नहीं सकते खुद से…और इस हड़बड़-तड़बड़ में वह उनको तो बिलकुल ही भूल गया। वह जैसे ही अंदर जाने लगा कि तभी उसके पाँव मानो ज़मीन से चिपक गए। बाऊजी की ज़िन्दगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है। वैसे भी उनका गू-मूत करते-करते थक चुका था वो…और उसकी पत्नी भी। ऐसे में अगर भूकंप में वह खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएँ तो उस पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा।

अभी कुछ पल ही बीते थे कि सहसा पत्नी की चीख से वह काँप उठा। उनका दुधमुँहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था।

अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता कि गोद में उसका लाल था।

जाने भूकंप का दूसरा तेज़ झटका था या कुछ और…पर वह गिरते-गिरते बच गया था।

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