
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अमृतलाल मदान मूलतः नाटककार हैं। इनकी सृजन यात्रा पाँच दशकों से अबाध गति से चल रही है। इस दीर्घ यात्रा में वे निरंतर राहों के अन्वेषी रहे हैं। इन्होंने कविता, कहानी, आलोचना, उपन्यास व लघुकथा सहित सभी विधाओं पर साधिकार ट्ठलम चलाई है। इसलिए इनकी सरल और सहज आत्मीयता से रचित लघुकथाओं में कवि का हृदय, निबंधकार की शैली, नाटककार की संक्रमण-चेतना और उपन्यासकार का ठहराव पाठकों को बाँधे रखता है। वर्ष 2012 में ‘बूढ़ा सूरज व अन्य लघुकथाएँ’ शीर्षक से इनका पहला एकल लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ था और अब आठ वर्षों बाद ‘मोम के पाँव’ का प्रकाशन इनकी परिपक्वता और धैर्य का परिचायक है।
इस संग्रह की लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता है इनकी भाषा। बोलचाल की आडंबरहीन भाषा में तीक्ष्ण विश्लेषणात्मकता छिपी हुई है। संक्षिप्त व फ़ुर्तीले व्यंग्यात्मक नाटकीय वाक्यों के बीच यह विशेषता इस प्रकार घुलमिल गई है कि पहली बार तो उसकी ओर ध्यान ही नहीं जाता। इन लघुकथाओं के शब्द निर्माण और चयन में इनका शिल्प कौशल देखते ही बनता है। ‘हत्या एक मुहावरे की’ लघुकथा में सांप्रदायिकता की अँधेरी के चलते गुरूचरन की माँ उसके बाल कटवा देती है और इस संबंधी पूछने पर वह सिर में खुजली का बहाना बनाती है। पड़ोसी द्वारा उसे चिंता न करने तथा ‘एक भी बाल बाँका न होने देंगे’ का आश्वासन उनकी भाषा को नई कथन-भंगिमा प्रदान करता है। ‘मुहावरे’ का सीधा सरल अर्थ ‘अभ्यास’ माना जाता है। सदियों से हिन्दुओं और सिक्खों के मिलजुल रहने के कारण यहाँ प्रयुक्त शब्द ‘मुहावरा’ लेखक के विशाल अनुभव और भाषा के स्फूर्त द्वंद्वात्मक संबंध की विरल बानगी है।
प्रस्तुत लघुकथाओं में प्रतीकों के सहज प्रयोग दर्शनीय है। प्रतीक वे अनुभूति संकेत होते हैं जो भावाभिव्यक्ति को गहराई प्रदान करते हुए अर्थ को उसकी तह से संप्रेषित करते हैं। स्वानुभूति के जिन अंशों को सामान्य अभिव्यक्ति के प्रचलित साँचों में ढालने में मुश्किल आती है उनकी अभिव्यक्ति प्रतीकों द्वारा सरलता से हो जाती है। ‘नया पता’ का पोस्टमैन मानवीय संवेदनाओं का व ‘आयाम अपने-अपने’ में कुत्ते स्वार्थ के प्रतीकार्थ हैं। ‘रेत हुए रिश्ते’ की अंतिम पंक्ति, ”भाई कोई सा कर दे। क्या फ़र्क पड़ता है। आजकल तो सीमेंट भी रिश्तों जैसी रेत हो गई है। कहकर मिस्त्री पुरानी ईंटों से सीमेंट खुरचने लगा जिसने ईंटों को अभी भी बाँधकर रखा था।” में प्रतीकों के बल से सूक्ष्म और स्पष्ट भावों की अभिव्यक्ति पाकर भाषा में नई अर्थशक्ति का संचार परिलक्षित होता है। ‘पता नहीं’ में गिलहरी, मेंढकों और उद्यान को प्रतीक बनाकर सूक्ष्म को साकार करते हुए उसे मनोनुकूल आवरण प्रदान करके अभिव्यक्ति को अधिक सशक्त और प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ‘धुंध’ लघुकथा में धुंध को प्रतीक बनाकर विभाजन की विभीषिका का दंश झेलकर पलायन को मजबूर वर्ग के अब भी ‘रिफ़्यूज़ी’ होने की पीड़ा को सशक्तता से उभारा गया है। ”हूँ, साला रिफ़्यूज़ी बामण।“ मूँगफली वाले ने मुँह के जूठे छिलके टोपी की पीठ के पीछे उछाले। जाने कैसे धुंध और भी गहरा गई… और वह धुंध आज तक भी नहीं छँटी।“
व्यंग्यशीलता इन लघुकथाओं में एक अनिवार्य भंगिमा के तौर पर उभरकर सामने आई है। बाह्य यथार्थ की कलुषित तथा अमानवीय स्थितियों से निपटने के लिए यह लघुकथाएँ धारदार हथियार का कार्य करती प्रतीत होती हैं। इन लघुकथाओं में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक असंगतियों के साथ-साथ साहित्यकार-बुद्धिजीवी के रूप में मनीषी वर्ग की विडम्बनामय स्थितियों, उनके अनुचित व्यवहार, यश-लिप्सा, छद्म स्वार्थों एवं तत्प्रेरित साहित्यक गतिविधियों को भी लक्ष्य बनाया है। ‘ग़ैर-राष्ट्रीय’ लघुकथा में ”मुझे लगा ज्यों इस सारे परिदृश्य में बस वह दिवंगत मृतक ही द्दौर-राष्ट्रीय पशु था।“ ‘बढ़िया नस्ल’ में ”छात्र-छात्राएँ भी उससे कन्नी काटकर अपने डिजिटल संसार में खो जाते।“, ‘मोटी चमड़ी’ में ”मैं राशि का लिफ़फ़ा सफ़ेद कुर्ते की जेब में डाल अपनी पीठ थपथपा ही रहा था कि वहाँ ज़ोर का साँटा पड़ा।“ तथा ‘भूख-दो’ में ”सम्मानों का भूखा पुरस्कृत कवि और लेखक तो मैं स्वयं भी था।“ आदि इसके सटीक उदाहरण हैं।
अमृतलाल मदान ने अपनी लघुकथाओं की संप्रेषण समर्थता में वृद्धि तथा कथ्य में बोधगम्यता व शिल्प सौंदर्य लाने हेतु बिंबों का बाखूबी प्रयोग किया है। इससे उनकी लघुकथायों की अर्थवत्ता में विस्तार होने के साथ-साथ युगीन जटिल मनोवैज्ञानिक स्थितियों की सूक्ष्म-सहज अभिव्यक्ति हुई है। उदहारणार्थ भावों की सूक्ष्म सुगंध और दुर्गंध को व्यक्त करता घ्रातव्य बिंब द्रष्टव्य है- ”वह संकोच के मारे भूखा ही बैठा रहा, उनकी डकारों से भी रोटी-मिर्ची की गंध लेता हुआ।“, ”वहाँ जाकर टिफ़िन खोला तो देखा और सूँघा कि तेज़ गर्मी के कारण पॉलिथीन में बंद टिफ़िन के परांठे बदबू मार रहे थे।“ (बदबू)। इसी प्रकार ‘कफ़्र्यू’ में’ ”रात के अँधेरे को चीरती हुई कभी-कभी गोलियों की आवाज़ें सुन दिल दहल जाता… कभी-कभी सैनिक वाहनों की गुर्राहटें भी सुनाई दे रही थी।“ दंपति की भयभीत मनःस्थिति बिंब रूप में अभिव्यक्त हुई है।
चूँकि अमृतलाल मदान मूलतः नाटककार हैं इसलिए उनकी लघुकथाओं में नाट्य कला की छाप दिखनी स्वाभाविक है। ‘भय भीड़तंत्र का’, ‘निशाने’, ‘वर्जित फल’, ‘पूछें गूगल देवता से’, ‘कछुआ’, ‘सुरंग और कॉरीडोर’ तथा ‘नमो नारायण’ एकांकी शैली में रचित हैं। इन लघुकथाओं की विशेषता इनमें निहित अंतद्र्वंद्व है। संघर्ष (द्वंद्व) मौलिक रूप में नाट्य कला का शब्द है। जमूरा और जमीरा के साँटे के रूप में अंतद्र्वंद्व व्यक्ति को एक निश्चित दिशा प्रदान करने का सार्थक कार्य करता है क्योंकि अंतद्र्वंद्व जैसी अनिश्चितता के दौर से गुज़रकर ही व्यक्ति सही दिशा की ओर अग्रसर होता है।
स्मरण करना स्वभाविक मानवीय वृत्ति है। जीवन में अनेकानेक ऐसे क्षण, व्यक्ति व घटनाएँ होती हैं जो जीवनपर्यांत याद रहते हैं। ऐसी ही कुछ मधुर व कटु स्मृतियों से राख में कंदराए कोयले को अनुकूल हवा का झोंका मिलने पर फिर से सजग होने तईं इस संग्रह की संस्मरणात्मक लघुकथाओं के रूप में सवाक् प्रकट हुई हैं। दरअसल जीवन और जगत् इतना विस्तीर्ण है कि किसी भी स्रोत से कथानक ग्रहण किया जा सकता है, कथानक किसी भी घटना से निर्मित हो सकता है। ध्यान केवल इस बात का रखना है कि रचनाकार अपने जिस अनुभव को संप्रेषित कर रहा है वह दूसरों के लिए भी अर्थपूर्ण हो अर्थात् कथानक की कसौटी समाज सापेक्षता है। सामाजिक संदर्भों से असंपृक्त रचना अपनी सार्थकता और प्रभाव नहीं छोड़ पाती। प्रस्तुत संग्रह में 15 के करीब संस्मरणात्मक लघुकथाएँ है, जिनमें से कुछ को छोड़कर अधिकांश प्रभावित करने में सफल सिद्ध हुईं हैं।
और अंत में… इन लघुकथाओं का फ़लक अत्यंत विस्तृत है। इनका वस्तु यथार्थ किसी एक थीम पर केन्द्रित होकर उसे महामंडित नहीं करता अपितु इन लघुकथाओं की प्रकाश रश्मियाँ काँच के त्रिपार्श्व पर आपतित होते हुए इंद्रधनुषी रंगों में विभाजित होकर जीवन के विभिन्न रंगों के रूप में अपनी छटाएँ बिखेर रहीं है। इन लघुकथाओं का परिप्रेक्ष्य संवेदनहीन मानवीय स्वभाव, जन्मभूमि से बिछड़े व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा, संवादहीनता, अपने ही देश में शरणार्थी होने के दंश, अर्थाभाव में पिसते रिश्तों, प्रौढ़ उम्र में प्रेम के कोमल भावों, अपनों की अपेक्षा का शिकार और अपने अस्तित्व को तलाशते मानव तक फैला हुआ है। मेरा ध्रुव विश्वास है कि लघुकथा जगत् में इन लघुकथाओं को पाठकों व आलोचकों का भरपूर स्नेह व सम्मान मिलेगा।
-0-रवि प्रभाकर, उपसंपादक ‘लघुकथा कलश’,पटियाला (पंजाब) चलभाषः 98769-30229