शिवनारायण
लघुकथा रचनाशीलता के स्तर पर लघुता में प्रभुता का दर्शन है। समकालीन जीवन के तिक्त यथार्थ को कम से कम शब्दों में व्यापक संवेदना के साथ जिस शिल्प में प्रस्तुत किया जाता है, उसे लघुकथा कहते हैं। लघुकथा अपनी पूर्णता में संज्ञा है, जो जीवन की बहुविध घटना-परिघटना, प्रसंग, मूल्य, संस्कृति-विकृति, समरूपता-विरूपता, उत्कर्ष-अपकर्ष, उपलब्धियों का संकेतात्मक किंतु क्षिप्र व्यंजक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। जीवन को किसी कोण विशेष से संपूर्णता में देखने-परखने का कथाशिल्प है लघुकथा। खंड-खंड में अखंड जीवन विस्तार का कथा-दर्शन है लघुकथा। कथात्मक आवेग, प्रभविष्णुता और पाठकीय हृदय की मंथन-क्षमता के साथ प्रतीकात्मक व्यंजनात्मक शैली इसके प्राण तत्व हैं; जबकि पारदर्शिता और स्पष्टता, शब्द और अर्थ की अन्वितिमूलक परस्परता, मितव्ययिता और सारता लघुकथा की कसौटी है। इसकी बनावट-बुनावट, भूमिकाविहीनता, बिना लागलपेट की संप्रेषणीयता ही इसकी पहचान है। लघुकथा बिंब, प्रतीक, रूपक और मिथक में व्यंग्यगर्भित जीवन-सत्य का उद्घाटन करती है। तनाव और प्रभाव की सृष्टि में भाषा सीधे चुभने वाली नहीं होती है, बल्कि कुरेदने वाली होती है। इसके कथ्य, शिल्प और भाषा के सौंदर्य में क्रांति ही इसका अभिप्रेत है। संक्षेपतः क्षण का विस्फोट ही लघुकथा है।
एक विधा के रूप में लघुकथा का महत्त्व काल, परिवेश और रचनात्मक त्वरा तीनों दृष्टि से उपादेय है। विश्व बाजार संस्कृति ने मनुष्य को इतना एकांगी बना दिया है कि वस्तुवादी दृष्टि से वह समाज सापेक्ष नहीं रह गया है। वह केवल अपने बारे में सोचता है और सुख-समृद्धि के सारे सितारे खुद तोड़ लेना चाहता है। इस अंधी दौड़ में उसे अपने जीवन का अमृत तत्व दिखाई ही नहीं पड़ता। वह भाग रहा है, क्योंकि वह देख रहा है कि उसके इर्द-गिर्द सारे लोग भाग रहे हैं। उसे पता नहीं कि वह कहाँ पहुँचने के लिए भाग रहा है। बस, वह भाग रहा है। इस भागमभाग की जिंदगी में लघुकथा पल दो पल का सुकून भर देती है। यह सुकून मनुष्य को संवेदित कर ऐसे परिवेश में ले जाता है, जहाँ उसे अपने होने का अहसास होता है अपनी अस्मिता का बोध होता ही वह असीमित रचनात्मक त्वरा के आवेग से भर जाता है और उसे अपने आदमी होने का अहसास होने लगता है। इस मानी में लघुकथा का सर्वोपरि महत्त्व है कि वह आदमी को आदमी होने का अहसास करा देती है। शिल्प की दृष्टि से लघुकथा का लोकप्रिय होने का यह बहुत बड़ा कारण है। इन विशेषताओं के कारण आज लघुकथा के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं।
देखा जाए तो आज कमोबेश हर विधा के सामने चुनौती है कि वह समकालीन विसंगतियों या जटिल सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों और अंतरविरोधों को व्यक्त करने में अपने को कितना सक्षम महसूस करता है। मेरा मानना है कि किसी भी विधा में रचनाकार जब अपने समय के निर्मम यथार्थ को संवेदना के धरातल पर रचने की चुनौती स्वीकार कर लेता है तो वह सार्थक रचनाकर्म करता है अन्यथा केवल कुछ लिखने के लिए लिख भर लेने से वह कभी मुख्यधारा में परिगणित नहीं हो सकता। अनेक लेखक हैं जो लघुकथा को शिल्प में छोटा और आसान विधा मानकर धड़ल्ले से लिखे जा रहे हैं और किताब पर किताब छपवाते जा रहे हैं। उनका कोई नामलेवा भी नहीं मिलता। लेखक को भी कुंठा होने लगती है कि प्रचुर लेखन के बावजूद उनका मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है। केवल लिखना भर ही काफी नहीं होता, बल्कि समय की जटिलताओं से मुठभेड़ की चुनौती को स्वीकार करना भी महत्त्वपूर्ण है। हिंदी लघुकथा में ऐसे अनेक सक्रिय लेखक हैं जो इस जटिल चुनौती से मुकाबला कर रहे हैं। विश्व बाजार ने मनुष्य को उपभोक्ता में बदलकर जो उसकी जीवन-संरचना को यांत्रिक कर दिया है, उसकी बहुस्तरीय पीड़ा को अनेक लघुकथाकार व्यक्त कर रहे हैं। यह जरूर है कि बहुसंख्य लघुकथाओं में ब्यौरे के आधिक्य के कारण रचनाशीलता की संवेदना फिसल जाती है और इसलिए उत्कृष्ट लघुकथा होने की संभावना मात्र ही उस रचना में रह जाती है। फिर भी ऐसी लघुकथाएँ बहुतायत में हैं जहाँ युगीन संत्रास अपनी तमाम रचनात्मकता एवं प्रयोगधर्मिता के साथ विद्यमान हैं।
किसी भी विधा में एक अच्छी रचना को निरंतर प्रयोगधर्मिता के परीक्षण से गुजरना होता है या उसे गुजरना चाहिए। लघुकथा के स्वत्व, तेज, त्वरा में प्रयोग प्रकृत अवस्था है। जो विधा शिल्पगत दृष्टि से जितनी छोटी होगी, उसमें प्रयोगशीलता की उतनी ही अधिक गुंजाइश रहती है। यही उसकी जीवंतता को बनाए रखती है और पाठकों से भी जोड़े रखती है। लघुकथा में प्रयोग की संभावना शिल्प, भाषा, शैली और प्रस्तुति इन सभी स्तरों पर है। प्रस्तुति अर्थात ट्रीटमेंट लघुकथा के प्राण हैं। जाहिर है कि उसमें जितने प्रयोग किए जाएँगे, उतना ही वह रोचक और जीवंत होगा। हालाँकि तात्विक दृष्टि से रचना में प्रयोग की स्वायतता नहीं रहती, लेकिन विनियोग में वही उसकी रोचकता के प्राण हैं। एक श्रेष्ठ रचनाकार को निरंतर अपने सृजनकर्म में प्रयोगधर्मी होना चाहिए।
लघुकथा की लोकप्रियता जिस तेजी से फैली है, उसे देखते हुए उसके मूल्यांकन के, आलोचना के औजार अभी विकसित नहीं हुए हैं। कहानी और उपन्यास की आलोचना के औजार से लघुकथा का मूल्यांकन संभव नहीं है। किसी एक विधा की आलोचना का निकष दूसरी विधा की आलोचना का निकष नहीं हो सकता। होना यह चाहिए कि किसी रचना के मूल्यांकन के लिए उसके भीतर से ही आलोचना के औजार निर्मित करने चाहिए। समाजशास्त्रीय आलोचना इसी पद्धति की वकालत करती है। हिंदी लघुकथा के मूल्यांकन में इस आलोचना-दृष्टि को विकसित नहीं किया गया। प्रायः अन्य नई विधाओं की तरह लघुकथा में संभ्रम की स्थिति है। लघुकथा आंदोलन के आरंभिक दौर में ही कई-कई मठ बनाए गए और उसके संयोजकों द्वारा ऐसे कथित आलोचकों की शृंखला तैयार कर दी गयी, जिसने लघुकथा की आलोचना के नाम पर अपनी सारी आलोचकीय बुद्धि मठाधीश की लघुकथा के महिमामंडन में खर्च कर दी। लघुकथा आलोचना के नाम पर ऐसी किताबें छपती रहीं, जिसने स्वतंत्र आलोचना दृष्टि की जगह आलोचना के अराजक जनपद को ही समृद्ध किया। ऐसे में हिंदी लघुकथा की आलोचना फिलहाल मठाधीशों के चतुर्दिक हाँफ रही है। इसलिए सधे लघुकथाकारों को इसकी चिंता न करते हुए अपने रचना-कौशल को अधिक से अधिक धारदार बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
लोकप्रियता के बावजूद लघुकथा साहित्य की मुख्यधारा में नहीं है। अक्सर ऐसा कहा जाता है। देखा जाए तो साहित्य की मुख्यधारा बदलती रहती है। इसकी मुख्य प्रतिद्वंद्विता में कविता, कहानी, उपन्यास आदि विधाएँ ही केंद्रीयता लिए रहती हैं। ऐसे में लघुकथा को मुख्यधारा में लाने के लिए भगीरथ प्रयास करने होंगे। यह दो तरह से होंगे–आंतरिक और बाह्य प्रयास। बाह्य प्रयासों में लघुकथा सम्मेलन-संगोष्ठी, पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक जैसे आंदोलनात्मक प्रयास करने होंगे, जबकि आंतरिक प्रयासों में श्रेष्ठ लघुकथा रचने की प्रविधियों-प्रक्रियाओं में तेजी लानी होगी। लघुकथाकारों के आंतरिक संवाद-परिसंवाद के साथ-साथ लघुकथा में सामाजिक पक्षधरता और समूह-चेतना के संवर्द्धन पर ध्यान देना होगा। इन सबसे एक सक्रिय सामाजिक परिवेश विकसित कर उसे आम अवाम से जोड़ना होगा। लघुकथा मठों को ध्वस्त कर उसकी जगह लघुकथाकारों के सहकारी शिविर बनाने होंगे। ये ऐसे प्रयास होंगे, जिसके द्वारा लघुकथा को साहित्य की मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी। लघुकथा को लोकतंत्र के जनपद में प्रतिष्ठित करने के लिए लघुकथाकारों को अपनी सामाजिक चेतना के विवेक को धारदार बनाना होगा।
यह आम धारणा है कि साहित्य की किसी विधा से मनुष्य की जीवन-शैली प्रभावित-संचालित नहीं होती। इस अवधारणा के अपवाद भी हैं। ऐसी अनेक रचनाएँ हैं, जिसने मनुष्य के जीवन को बदलने में सहायता की। देश की जीवन-धारा को भी साहित्य ने बदला है। परंतु यह सामान्य परिघटना नहीं है। अब तक किसी लघुकथा ने किसी की जीवनधारा बदली हो, मुझे ज्ञात नहीं। हाँ, यह अवश्य होता है कि समकालीन जीवनशैली से लघुकथा ऊर्जा-प्रेरणा ग्रहण करती है। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि रचना हमेशा अपने समय के जीवन की व्याख्या होती है। समाजशास्त्र भी यही सूचित करता है कि समकालीन जीवन की संस्कृतियों के अनुरूप ही रचनाएँ अपना शिल्प गढ़ती है और उसकी मर्म-व्याख्या से पाठकों से अपना सरोकार बनाती है। विश्व बाजार की संस्कृति ने भारतीय जीवन को जितना जटिल-संश्लिष्ट कर दिया है, उसकी बहुविध अभिव्यक्ति आज की लघुकथाओं में हो रही है। अन्य विधाओं की अपेक्षा लघुकथा में वर्तमान जीवन के क्षणांश के बहुरंग अधिक अभिव्यक्ति पा रहे हैं और शिल्प लाघव के कारण लघुकथा अधिक पढ़ी जा रही है। ऐसे में लघुकथा का भविष्य लघुकथाकारों पर निर्भर करता है। इस स्थापना की भी कई व्याख्या हो सकती है। सामान्य धारणा है कि रचना यदि श्रेष्ठ होगी तो उस विधा का भविष्य दीर्घकालीन होगा। रचना अच्छी न हुई तो संख्या की दृष्टि से कितनी ही रचनाएँ क्यों न हों, पर उसका कोई भविष्य नहीं! अब श्रेष्ठ रचना की कसौटी भी समय-समय पर बदलती रहती है। कविता में मुक्तिबोध के भविष्य ने उनकी मृत्यु के उपरांत विस्तार ग्रहण करना आरंभ किया, तो अनेक ऐसे रचनाकारों का भविष्य अब अँधेरे में जाता दिखाई पड़ रहा है जो अपने जीवनकाल में प्रसिद्धि के शीर्ष पर रहे। कभी महाकाव्य-खंडकाव्य का भविष्य जगमगाता था, जिसकी स्थिति अब खद्योत की-सी हो गई है। रचना का मूल्यांकन यदि उसके सामाजिक सरोकार की पृष्ठभूमि के संदर्भ में हो, तो उससे छनकर आनेवाली श्रेष्ठ रचना का भविष्य अवश्य दीर्घकालीन होता है। अब तक ऐसी श्रेष्ठ लघुकथा की संख्या नगण्य है, फिर भी इसके सुरक्षित भविष्य के प्रति आश्वस्ति बनती है क्योंकि आज अनेक अच्छे लघुकथाकारों की उपस्थिति-सक्रियता बनी हुई है।
लघुकथा पर विचार करते हुए अक्सर यह सवाल खड़ा किया जाता रहा है कि क्या आकारगत छोटी विधा होने के कारण लघुकथा में समग्र जीवन की विविधता को व्यक्त करने की क्षमता आ जाती है? मेरा मानना है कि लघुकथा में यह क्षमता न होती, तो फिर इतनी जल्दी यह विधा जनप्रिय कैसे होती? जीवन की विविधता को व्यक्त करने की क्षमता किसी विधा के लिए चुनौती नहीं होती, बल्कि यह चुनौती रचनाकार की होती है। रचनाकार कुशल, संवेदनप्रज्ञ एवं दृष्टिसंपन्न हो तो वह हाइकु में भी प्राण डाल सकता है, फिर लघुकथा की तो बात ही क्या है! लघुकथा समग्र जीवन का एकांत चित्रण-सौंदर्य है। इन सभी स्थापनाओं का सार-संचय यही है कि समग्र जीवन की विविधताओं की अभिव्यक्ति का बहुरंग ही लघुकथा है और इसीलिए यह आम पाठकों में सबसे ज्यादा पसंद की जाती है। ऐसे में लघुकथाकारों का विशेष दायित्व हो जाता है कि वे आकारगत छोटी विधा होने के कारण इसे हल्के में न लेते हुए ग्राम से विश्वग्राम तक आर्थिक उदारीकरण अथवा पूँजी संस्कृति के फैलाव से हो रहे सामाजिक-पारिवारिक संरचना में व्यापक परिवर्तन और उसके चलते जटिल होते जीवन के संत्रास को पूरी संवेदना के साथ लघुकथा में चित्रित करें। समय के त्रास को लघुकथा में आने दें। पूँजी के अमानवीय खेल को नंगा करें। सत्ता और पूँजी संस्कृति के प्रतिरोध से ही यथार्थ के चित्रण में धार उत्पन्न होगी और लघुकथा पूरी विश्वसनीयता के साथ अपने पाठकों में पैठती चली जाएगी और लघुकथा में विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
-0-डॉ. शिवनारायण, संपादक, ‘नई धारा’, 305, अमन अपार्टमेंट, शांति निकेतन कॉलोनी, भतूनाथ रोड, पटना-800020 (बिहार) ; मो.-9334333509 ईमेल -shivnarayan22@yahoo.com