जून 2026

पुस्तकजी रहे बेहोश     Posted: November 1, 2021

जी रहे बेहोश [लघुकथा-संग्रह ]; मुकेश शर्मा, पृष्ठ;128, मूल्य;250 रुपये,  प्रथम संस्करण:2021 प्रकाशक;  सत्साहित्य भण्डार,ए-57 बी, द्वितीय तल, अशोक विहार-2, दिल्ली-110052

मुकेश शर्मा लघुकथा विधा के प्रारंभिक प्रहरी है। इनके अब तक तीन समीक्षा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें इन्होंने उस समय के प्रमुख लघुकथाकारों के साक्षात्कार भी दिए हैं। कहानी-लेखन में इन्होंने हरियाणा साहित्य अकादमी से प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त किया है।
इनके ‘जी रहे बेहोश’ लघुकथा-संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने लिखी है। इस संग्रह में इनकी 55 लघुकथाएं हैं। इन्होंने प्रेम व सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ को लेकर अधिकतर लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘अँधेरा और रोशनी’ अंधेरे और रोशनी के संघर्ष की बढ़िया लघुकथा है। इसका अंत पाठक को अंधेरे से निकालकर रोशनी की ओर ले जाता है। ‘प्यार की अँगूठी’ लघुकथा प्रेम मं धोखाधड़ी को लेकर चली है। इसमें दृश्य 1,2,3 देकर लेखक लघुकथा को प्रयोगधर्मिता में लाने का प्रयास करता है। ‘क्या धर्म केवल कल्पना है?’ लघुकथा धर्म के स्वरुप पर आधारित है।‘आइने वाला डिसूजा’ इस संग्रह की बढ़िया मनोवैज्ञानिक लघुकथा है जिसका अंत सकारात्मक है। ‘प्यार का अकाउंट’ एक प्रेम कथा है जिसका अन्त अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘छोटे-छोटे सुख में ’प्यार में प्यार नहीं’ वाली बात है। ‘प्यार के पापड़’ भी ऊपरयुक्त प्रेम भरी लघुकथाओं की तरह की है।
‘सारी रात’ इस संग्रह की सबसे अच्छी लघुकथा है। थानेदार साब और सतबीर सिपाही को लेकर लिखी इस लघुकथा में पुलिस वालों की पोल खोली गई है। लघुकथा धीरे-धीरे आगे सरकती है और अपने साथ पाठक को भी लेकर चलती है। इसका कथ्य व अंत दोनों बढ़िया हैं। इसके बिल्कुल विपरीत पुलिस वालों के सत्कर्म को लेकर प्रेम शर्मा ने ‘असली कमायी’ लघुकथा लिखी है। इन दोनों लघुकथाओं में यह बतलाया गया है कि पुलिस वाले क्या करते हैं और उन्हें क्या करना चाहिए।
‘नजरिया’ लघुकथा अच्छी है पर इसमें लकड़ियों को पात्र के रूप में लिया गया है। ‘दरद ना जाने कोय‘ भी मानवेतर प्राणियों को लेकर लिखी लघुकथा है। ‘सुनीता विलियम्स ने कहा था’ लघुकथा ‘वसुधैव कुुटुम्बकम’ का संदेश देती है। ‘शहर, दोपहर और लड़की’ में पाठक कुछ सोचता है, इला का बड़ा भाई अपनी सोच के अनुसार कुछ और करता है और अंत में निकलता कुछ और ही है। यही लेखक की कलात्मकता है। ‘गुरू जी’ भावनात्मक स्तर की लघुकथा है।
‘एक और अभिमन्यु’ में नेता जी का छुन्ना को समझाने का ढंग बहुत सुन्दर है। इस लघुकथा में कथोपकथन शैली का बढ़िया प्रयोग है। ‘कटी हुई पंतगें’ एक प्रेमकथा है, जिसमें पतंगों के द्वारा मुकेश शर्मा ने प्रेम के दाँवपेचांे की ओर संकेत किया है। ‘खरगोश’ लघुकथा में प्रतीकात्मक शैली है। ‘दीदी का भैया’ भी एक अच्छी लघुकथा है। ‘सीढ़ियाँ’ में आगे बढ़ने के लिए सीढ़ियों की आवश्यकता होती है, इस ओर संकेत किया गया है। ‘बदलती क्लास’ में उत्कोच की बात है। ‘सरकारी सिस्टम’ में यह बतलाया गया है कि सरकारी काम में देरी क्यों होती है। ‘सरकारी-रामराज’ में दूसरों को पैसे देने के लिए आप पैसे कैसे इक्ट्ठे करते हैं, इसकी चर्चा है। ‘पिता-पुत्र संवाद’ में रिजर्वेशन की बात है।
‘जी रहे बेहोश’ का मुख्य शीर्षक आकर्षक व विषयों के अनुरूप है। प्रेम में पगी लघुकथाएँ यघपि समाज का सही दर्पण है, फिर भी कहीं-कहीं पर आदर्श भी झलकता है। राजनीतिक, सामाजिक लघुकथाओं में व्यंग्य है। लघुता का लेखक ने ध्यान रखा है और ‘कसाव’ की दृष्टि से भी ये लघुकथाएँ सही हैं। लेखक ने देशकाल और वातावरण की भी बात की है। पात्र अत्यन्त सजीव हैं। उनकी भाषा पात्रानुकूल है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह एक श्रेष्ठकृति है, जिसका पाठकों में भव्य स्वागत होगा। सच यह है कि बहुत समय बाद एक अच्छा लघुकथा-संग्रह देखने को मिला है। मुकेश शर्मा बधाई के पात्र हैं।

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