जून 2026

देशजूते     Posted: February 1, 2019

रामशरण को ग्राम समिति की बैठक में जाना था। धप-धप करते सफेद बालों सरीखे ही धवल धोती-कुर्ते को धोबी के यहाँ कलफ लगवाया। फिर इस्त्री करवाया। खास मौकों पर पहने जाने के लिए कल ही खरीदे गए जूतों पर फिर से पॉलिश लगाई। फिर सरसों का तेल चुपड़ धूप में रख दिया। बैठक में अभी देर थी। सो जाकर खाट पर लेट गए। निगाहें जूतों पर ही टिकीं थीं। जाने कब से ख़्वाहिश थी उन्हें ऐसे जूतों की। बचपन से ही नंगे पैरों चलते आए थे रामशरण। घोर गरीबी में पले-बढ़े। फिर बच्चों की परवरिश और घर-गृहस्थी के तमाम इंतजाम। इस चक्कर में जूतों की ख़्वाहिश कहीं दबी रह गई थी। बेटे के बड़े होने पर कुछ आर्थिक मजबूती आई, तब जाकर धीरे-धीरे पैसे जोड़ ये जूते खरीदे। सूरज की सीधी धूप में तेल लगे जूते अपनी चमक बिखेर रहे थे। इस चमक में रामशरण जीवनभर की नंगे तलुओं वाली छवियाँ उकेरते रहे। कब-कब उनके पैरों में काँटें चुभे, कब कंकड़-पत्थर, कब-कब नाते-रिश्तेदारियों में जाने से झिझकते रहे और कितनी बार जूतों के रास्ते में ही टूट जाने के बहाने गढ़े। इसी बीच जाने कब उनकी आँख लग गई।

 बेटे को भी चंदे के काम से मंदिर जाना था। बैठक में देर थी और पिता को सोते देखा तो सोचा पिता के जाने से पहले वापस आ जाएगा और चमचमाते जूते पहन निकल गया।

 थोड़ी देर में ही रामशरण की आँख खुल गई। जूतों को सामने न देख हड़बड़ाकर उठ बैठे। इधर-उधर खोजबीन की, पर जूते नदारद। रामशरण के लिए उनके जूते महज़ जूते भर नहीं थे। उनकी जिंदगी भर की एकमात्र इच्छा थे। बचपन से देखा गया एक सपना जो अब बुढ़ापे में जाकर पूरा हुआ था। ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा था उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। रामशरण इतने बेचैन कब हुए थे, उन्हें याद नहीं। आखिर में बहू से पूछा, तो पता चला कि बेटा जूते पहनकर गया है और वापस आता ही होगा। यह सुनकर रामशरण जैसे सदमे में आ गए। गुस्से में सोचा-अब वे कभी उन जूतों को हाथ तक नहीं लगाएँगे। इतने दिन नंगे पैरों चलते रहे, आगे भी चल लेंगे। और बेचैनी में समय से पहले ही मंदिर निकल गए, शायद वहाँ जा कुछ शांति मिले। मंदिर के द्वार पर पहुँचे, तो बेटा वापस आ ही रहा था। बेटे को देख अचानक ही रामशरण के हृदय में वात्सल्य उमड़ आया। सोचा- बेटे को जूते पहन घर वापस जाने को कहेंगे। उधर बेटे ने पिता को यूँ हैरान परेशान भागते से मंदिर आते देखा, तो उसके अंदर जैसे अपराधबोध-सा उमड़ पड़ा। अब वह बिना जूते पहने ही वापस हो लेगा। एक तरफ रामशरण और दूसरी तरफ बेटा एक दूसरे के सामने खड़े थे और उनके बीच एक जोड़ी चमचमाते जूते यूँ ही रखे पड़े थे। निर्विकार और नाकारा से।

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