तिवारी के ऑफिस में आज अच्छी-खासी चहल-पहल थी। चहल-पहल का कारण था कि कुछ जवान, सुन्दर और अविवाहित लड़कियों की बहाली हुई थी। ऐसी बात नहीं कि पहले से इस दफ्तर में महिलाएँ नहीं थी, मगर बाल-बच्चों वाली।
तिवारी के अपनी कुर्सी पर बैठते ही कर्मचारियों का एक छोटा-सा समूह उनके इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गया। फिर हँसी-मजा़क का सिलसिला शुरू हो गया। पहले हेडक्लर्क वर्मा ने मस्का लगाया– ‘‘क्यों शर्मा, अब तो तिवारी जी को काफी आराम मिलेगा। है न? इनके बगल में कल से मिल लोलिता बैठेंगी।’’ हँसी का फौव्वारा फूट पड़ा। हँसी के बीच ही शर्मा ने वर्मा की बात को आगे बढ़ाने के क्रम में अपनी फूहड़ता और अव्वल दर्जे को बेहूदगी का नमूना पेश किया– ‘‘हाँ भाई! वर्मा, अब तो तिवारी जी की गई जवानी फिर से लौट आएगी, मिस लोलिता बिल्कुल करंट है करंट,—’’
‘‘अरे हाँ यार! अब तो हमारे रिटायरमेंट के कुछ ही साल रह गए हैं, मजे से इन छोरियों के साथ कट जाएँगे।’’ अधेड़ उम्र के स्टेनों, रोहतगी ने हथेली पर तम्बाकू रगड़ते हुए कहा और सभी के साथ-साथ स्वयं भी ही— ही— ही हँसने लगा।
मगर तिवारी ने फीकी मुस्कान के साथ सबको देखा और कहा– ‘‘अरे जाओ भाई! अपना-अपना काम देखो—।’’
तिवारी की बात को बीच में लपकते हुए यादव, जो उस दफ्ऱतर में टाइपिस्ट था, बोला, ‘‘अरे छोड़ो गुरू, काम-वाम तो रोज ही होता है, आज तो बस—।’’
सिन्हा ने फाइल समेट कर एक ओर फेंकते हुए यादव की बात को लपक लिया, ‘‘क्यों यादव! तेरा मन भी नई चीजों की ओर लुढ़क गया, तो फिर तेरी परमिला का क्या होगा—?’’ ठहाकों से ऑफिस गूँज उठा_ मगर तिवारी नहीं हँसा। मानो उसने आज न हँसने की कसम खा ली हो।
तभी बड़े साहब के चेम्बर की सफाई का काम अधूरा छोड़कर दिनू भी वहाँ आ लपका और आते ही नहले पे दहला जमाया, ‘‘सिन्हा साहब! सच कहूँ तो परमिला पर सोलहों आना अधिकार मेरा है, क्योंकि मैं चपरासी और वो चपरासिन लेकिन यादव जी ने पता नहीं किस मंत्र से उसे वशीभूत करके हमारे हिस्से का प्यार हड़प लिया—।’’
मि- बनबारी ने बड़ी ही बेरफ़खी से फाइलों के ढेर के पीछे चबाये हुए पान की सिट्ठी फेंकते हुए एक और चुटकी उछाली, ‘क्या यादव जी! घूस की तरह से दूसरे के हिस्से का प्यार भी हड़प लेते हो—?’’
ठहाकों से ऑफिस का कोन-कोना झनझना उठा। मगर तिवारी के होठों पर हँसी का एक कतरा भी दिखाई नहीं पड़ा। वह उठा और उदास मन ऑफिस से बाहर हो गया। तिवारी के बाहर जाते ही सभी ने एक-दूसरे को देखा और पूछा, ‘‘क्यों भाई। आज तिवारी जी इतने उदास क्यों हैं—? पहले तो हँसी-मजाक में बुरा नहीं मानते थे बल्कि बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे—।’’
कुशवाहा ने तिवारी के जाने की दिशा में देखते हुए धीरे से कहा, ‘‘और अगर बुरा मानते हैं, तो माना करें, कौन नहीं जानता है कि इस बुढ़ौती में भी वह बड़े साहब की बीवी पर—’’
उसी समय फाइलों में खोया हुसैन मियाँ फाइल बंद कर उन सबों के पास आकर बोला, ‘‘अरे भई! तुम लोग बिल्कुल नामसझ हो— तिवारी जी आज तुम लोगों की हँसी में क्यों नहीं शामिल हुए, यह बात समझ में आई—?’’
सभी ने नकारात्मक दिशा में गर्दन घुमाई। तब हुसैन ने कहा– ‘‘जानते हो कल से जो पाँच नई लड़कियाँ अपने दफ्रतर में ज्वायन कर रही हैं, उनमें तिवारी जी की बेटी भी शामिल है—।’’
म—म— म— ग— र— उन्होंने बताया नहीं?’’