मैं एक मंदिर परिसर में घूम रहा था. मेरे हाथ में एक बेहद क़ीमती डिजिटल कैमरा था। मंदिर बहुत भव्य था। मैं अपने कैमरे में मंदिर की तस्वीरें उतार रहा था।
तभी मैंने देखा, एक छोटा बच्चा मेरे कैमरे को बड़ी ही लालायित नज़रों से देख रहा है। मुझे लगा, यदि उसे यह कैमरा मिल जाये तो शायद उसे दुनिया की सारी खुशियाँ मिल जाए। मैं उसके के पास गया और पूछा, “तुम्हें यह कैमरा पसंद है ? क्या तुम्हें यह चाहिए ? “
उसने ‘हाँ’ में धीरे से सिर हिलाया। मैंने कहा, “आओ, पहले हमलोग कैमरे से अपनी तस्वीरें लेते हैं। “
वह बड़ा ख़ुश हुआ। फिर हमने अपनी और उसकी कई तस्वीरें लीं। हम छाँव में गए और मैंने डिजिटल स्क्रीन ऑन कर उसे सारी तस्वीरें दिखाईं। उसने बड़ा ही बुरा-सा मुँह बनाया।
मैंने पूछा, “क्या तुम्हें तस्वीरें पसंद नहीं आयीं ? क्या तुम्हें कैमरा नहीं चाहिए ? “
उसने गुस्सा कर कहा, “नहीं. मुझे कैमरा नहीं चाहिए।”
मैंने कहा, “तस्वीरें तो अच्छी आई हैं। फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो ? “
उसने मुँह फेरकर जाते हुए कहा, “आपकी तस्वीरें अच्छी आई हैं, मगर मैं तो गरीब का गरीब ही दिख रहा हूँ।”
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