टाट बिछी है । खिड़की पर बैठी चिड़िया भी सुन रही है श्यामपट्ट पर खड़िया से जो लिखा गया है और गले पर ध्वनि का जोर देकर बच्चे रट्टा मार रहे हैं । टीचर के हाथ में छड़ी एक – एक वर्ण से गुजरती आगे बढ़ रही है ….। क के माने समझाते समझाते घ तक बढ़ गई । फिर ? फिर क्या, ङ माने कुछ नहीं।
अगली पंक्ति की ओर लपकी छड़ी । टीचर चिल्लाई, च से चरखा , छ से छतरी, ज से जहाज , झ से झरना , ञ माने कुछ नहीं ।
” सच में कुछ नहीं? जिसके माने ही कुछ नहीं।, तो वह क्यों है यहाँ? पंक्ति से बाहर क्यों नहीं बिठा दिया गया उसे? हमने तो यही देखा है, जो असंगत है, वह विलग कर दिया जाता; फिर इसे क्यों नहीं किया गया?”-पूछा बड़ी मासूमियत से उस अबोध बच्चे ने ।
वह तोता न था। होता तोता तो रट लगाए जाता। जंगले पर बैठी चिड़िया – सी चूँ – चूँ कर व्यवधान न उत्पन्न करता । पूछ बैठा जिज्ञासावश कि जो दिख रहा है वह कुछ कैसे नहीं है और जब होना ही नहीं है उसे तो है ही क्यों फिर? क्यों नहीं गायब हो गया मानव की पूँछ- सा समय के साथ- साथ।
प्रश्न के प्रत्युत्तर में प्रश्न ही मिला- “ये कैसा सवाल है बेतुका- सा! ” टीचर बोली, ” जो सदियों से चला आ रहा है, वो क्रम से किस तरह अलग हो सकता है । “
” तो क्या उमर की गिनती उसके बने रहने का कारण है। इसी में उसकी सार्थकता है? तो फिर हमें क्यों अलग बैठा दिया जाता है भोज की पंक्ति में बाकियों से दूर? हमारे माने भी तो सदियों से कुछ नहीं रहे हैं। जानता हूँ दादी, अम्मा ने कई दफा बतलाया है हम तो हैं पर हमारे माने कुछ नहीं होता। क्या ञ भी श्वास भरता है? रोता है? जैसे की हम । उसे दुत्कार क्यों नहीं मिलती च, छ, ज और झ से ? हमारे च, छ, ज और झ ने तो हमें अछूत और निरर्थक ही समझा है हमेशा । “
टीचर सन्न और उधर चिड़िया फुर्र। इधर हाथ जोड़े और आँख मूँदकर बोला बच्चा – हे भगवान ! मुझे भी बना दो ञ और बैठा दो वर्ण क्रम में । मेरे माने तो कुछ नहीं होगा; किंतु सदियों तक मुझे भी पुकारा जाएगा!
क्रम से टूटकर वर्ण हवा में नाच रहे हैं ।
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