जून 2026

भाषान्तरटाटा अंकिल     Posted: January 1, 2024

अनुवादक (अवधी)- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

बसिया जैसन्है अगवा कौ बढ़ी, पाछे से चढ़ी मेहरारु जोरि जोरि से चिखय-चिल्लाय लाग।

“अय रोका रोका…बसवा के रोका…म्होरी बिटिया तौ निचवे रहि गइ, चढ़िन न पायेस…”

बस ठसाठस भरी रही। कुछेक जने पाछे ओरी गटई घुमायके पुकार कै दिसा मा देखेन, मुला बोलेन केयू नाहीं। बस रूकय के बजाय गति पकड़ि लेहेस। उ रोआँसी-सै होइ गै अउर फेर से चीखय लागि, कैसन बेसहुर डराइबर बाटै, सवारियन के चढ़बै नाहीं दिहेस अउर बसे के भगाय लिहेस…अरे केयू बसे के रोकवावा…म्हार छोट कै बच्ची बसे इस्टाप पै छुटि गै… हमके उतारा।”

येही दाई अगली-बगली ठाढ़ कछु सवारीन ओकर पछ लिहेन।

“अबे ओइ डराइबर… बस रोकु! केहू क बचवा नीचवा रही ग बा।” यक अधेर दम भर चीखेस।

“कंडक्टरवा कहवा गवा, बसे के काहे नाहीं रुकवावत…” ई केहु युवक क आवाज रही।

कंडक्टर जौन अगवा कै सवारियन क टिकसवा काटत रहा, उ सोर सुनिकै जोर सै सीटी बजायेस तौ डराइबर क पाँव बिरेक पै गवा। बसि रुकी तौ मेहररुआ बसे से कूदि अस परी। इस्टैण्ड से बसिया काफी आगे आइ भई रही। उ तेजी से उलट दिसा के ओरी भदहवास अपनेन ताई बरबरात दौरी जात रही–

‘हमरै मति मरि गइ रही …पहिले बच्चिया के चढावै चाही, नाही त वोहके गोदिया मा लइ के चढ़य चाहत रहा। नासपीटा डराइबर यहु नाहीं देखत कि केहू चढ़ि पायेस या नाहीं… हवाइजिहाजी अस बनाय रख्खे हयेन बसे के…हाइ हमार बच्ची…’ अपनेन के अउर बसे वाले के कोसत उ हाँफत भै दौरी जात रही। ओकर सगरा देह पसीना से तरि होइ ग रहा। 

दूरय से उइ देखेस, चढ़ि दोपहरिया मा बस इस्टाप सून परा रहा। उ भीतर तकि घबराय उठी, ‘हाइ, कहवा गै मोर बच्चिया? हे इस्वर, म्हारे बिटिया क रछा करय।’ उ कछु अउर अगवा बढ़ी तव ओकर नजिर सेड कै नीचवा ठाढ़े यक अधेड़े सै मनई कै पीठी पै पड़ी। वोह लरकी के उठाय रखे रहा। लरकिया रोअत रही अउर उ मनई ओकरे मुड़े अउर गाले के पुनि पुनि सहरावत रहा। माथा चुमत रहा। साईद मोहे से कछु बोलतव भी रहा, जौन ओके सुनै मा नाहीं आवत रहा। यकायक ओकरे जेहने मा यहि दिना लरिकियन के साथै होत हादसवा कौंधि ग। ओकरे पाँवन मा अउर तेजी आइ गइ अउर वोहि लगिभग झपटत हुवे  लरकी के ऊ मनई के हाथे से छीन लेहेस। रोअत भइ बच्ची ‘माई माई’  करत भइ ओकरे छाती से चिपट गै। “बहिन जी … इ बच्ची ना जाने कब से इहाँ धुपे मा ठाढ़ रोये जात रही…हमने सोचा जरूर ही ई अपने अम्मा-बाबू से बिछुर गै होइ या…इ तौ रोइ रोइ कै आपन बुरा हालि कै लेहे बा…देख्या त, अबहू सुबकत बा गुड़िया रानी…अल्ले अल्ले…अब मति रोवो बच्ची…” कहत भै उ बियक्ति आपन बायाँ हाथि बढ़ाय क बच्ची क गाल सहलावै के चाहेस, मुना महिला लरकी के यहि बारी भी छाती से लगाय लिहेस। बच्ची अब सांत होइ चुकी रही अउर नटई घुमाय कै वोहि मनई के ओरी ही देखे जात रही।

 यतने मा यक इसकूल बस आइ क रुकी। वोह मा से सात आठि बरिस कै बच्ची पीठी पै बैग अउर गरदन मा पानी क बोतलिया लटकाये उतरी अउर दुरै से ‘दादू …उ…उ…दादू…उ…उ’ चीखत हुवे दौरि क वोहि मनई सै आई क लिपटि गै। उई पोती के मुड़े को पियार से सहलायेन ओकरे पीठि से बैग उतारेन, अउर आपन काँधे पै लटिकायेन अउर ओकर अँगुरी पकड़ि कै चलि दिहेन।

तब्बय पाछे से आवाज आइ, “टाटा अंकिल…”

उ मनई पलटि कै देखेन, महतारी कै सीने से लाग बच्ची आपन दाहिना हाथ हिलाय कै ओके ‘टाटा-टाटा’ करत बा।

“टाटा बिटिया!” कहिके मुसकरात हुवे वोहूँ भी आपन दाहिना हाथ हवा मा लहराय देहेन।

अबही कछु छड़े पहिले जौन यक तीखि खरोंच क अहसास ओनके हुवा रहा, ऊ अब जाता रहा।

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