‘‘आज फिर गलत लिखा! बेवकूफ कहीं का! चल बीस बार इसे अपनी कापी में लिख…’’
‘‘नहीं लिखूँगा!’’ उसके स्वर की कठोरता देखकर मैं दंग रह गया।
मैंने पूछा, ‘‘क्यों नहीं लिखोगे?’’
‘‘पिताजी रोज़ दारू पीकर मारते हैं। कहते थे, अब एक महीना पूरा होने से पहले नई कापी माँगी तो बहुत मारूँगा….’’ कहते हुए डण्डा खाने के लिए हाथ आगे कर दिया।
मैं उसकी डबडबाई आँखों में झाँकता रहा। मेरा उठा हुआ हाथ जाने कब का नीचे ढरक गया था।
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