“कौन था माँ?” प्राची ने पूछा।
“कोरियर वाला था। तेरे नाम का लिफ़ाफ़ा दे गया है।”
“लाओ दिखाओ, देखूँ क्या है।”
प्राची ने लिफ़ाफ़ा खोला, पत्र पढ़ा और तहाकर रख दिया।
“बता तो सही क्या लिखा है इसमें।”
“मेरी सहेली नेहा जिस ऑफ़िस में काम करती है, वहीं से मेरा एपोइंट्मेंट लैटर आया है।”
“अरे यह तो बड़ी खुशी की बात है। इतनी अच्छी ख़बर पढ़कर तुझे चुप क्यों लग गई?”
“कुछ नहीं माँ, बस नेहा की बात याद आ गई कि ऑफ़िस का बॉस बड़ा खडूस आदमी है और स्टाफ़ में कई पुरुष भी ऐसे हैं ,जो लड़कियों को चैन से नौकरी नहीं करने देते। बस यही सोचकर थोड़ा सोच में पड़ गई हूँ।”
” अरे बिटिया, नौकरी नेहा के ऑफ़िस में कर या कहीं और, ओछी सोच के पुरुष तो सभी जगह मिलेंगे।अच्छे पुरुषों की भी कमी नहीं है इस दुनिया में।”
“ऐसे पुरुषों के बारे में सुनकर डर तो लगता है ना माँ।”
“डर कैसा? अपने पर भरोसा होना चाहिए बस। फिर जाल में तो वही फसती हैं ना, जो ऐसे पुरुषों द्वारा डाले गए दाने चुगने जाती हैं।”
“फिर भी माँ।” कुछ सोचते हुए प्राची ने कहा।
“कहा ना, बहादुर लड़कियों को किसी से डरना नहीं चाहिए।चल अब जल्दी से मुँह मीठा करा।”