गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
“माँ! यां मां डन्नै क्य बात च। तु एक बगत बोलिक त देख। अपड़ी पड़ै फिर से शुरू ही त कन्न चांदी।
“पर?”
“क्वी गलत काम कन्नौ थोड़ी जाणी छैं। पिताजीन खै त नि देण त्वी थैं।”
“पर?”
“पर क्या…?”
उबारी ई कैका औणू कु सबद सुणे। नेहा न माँ थैं चुप रौण थैं सनकाई -“श्श्श्! इन लगणू पिताजी ऐ गेनि!”
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