नीलू हडबड़ाती हुई घर में घुसी।
उसने उसी हड़बड़ाहट में दरवाजा बंद किया। दरवाजे के जोर से बंद होने की आवाज सुन रसोई से बाहर आई।
‘‘नीलू! ….क्या हुआ?’’ मम्मी ने नीलू को देखते ही पहला प्रश्न यही किया।
‘‘मम्मी!….मम्मी!!… सभी खिड़की-दरवाजे बंद कर दो।’’ ऐसा कहते हुए नीलू की साँसें बेकाबू हो रही थीं।
‘‘खिड़की-दरवाजे बंद कर दो! …पर क्यों.?…और तू इतनी घबराई हुई क्यों है?’’
‘‘मम्मी, पहले बंद करो!’’ उसके अंदर का लावा आँखों से फूट पड़ा।
‘‘नीलू…..बेटी आखिर बात क्या है?’’
‘‘मम्मी …..वो …..।’’ नीलू की अंगुली दरवाजे की ओर थी।
‘‘गली में! कौन है गली में ? मैं देखकर आती हूँ।’’ नीलू को उसी हाल में छोड़ वह दरवाजे की ओर बढ़ी।
दरवाजा खोला। गली में दाएँ-बाएँ देखा।
‘‘वहाँ तो कोई भी नहीं ।’’ पास आकर मम्मी ने फिर पूछा-‘नीलू बेटी..क्या बात है? सच-सच बता बात क्या है ?’’
‘‘मम्मी, कोई फोन पर परेशान.कर रहा है।’’
‘‘परेशान कर रहा है! कोई फोन पर कैसे परेशान कर सकता है। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा।
‘‘कोई धमकी दे रहा है?’’
‘‘हाँ….. धमकी भी दे रहा ।’’
‘‘तू फोन बंद कर दे।’’
‘‘वो भी करके देख लिया।’’
‘‘कब देख लिया? अभी तो तू घर आई है।’’
‘‘मम्मी, ऐसा कई दिन से चल रहा है। ‘मम्मी, उस दिन किसी का फोन आया था। नम्बर अननोन था पर मैंने यह सोचकर फोन उठा लिया कि कोई जान पहचान वाला हो सकता है।’’
‘‘मेरे हैलो करते ही वह बदतमीजी से बोला-हाय! क्या हाल है जानेमन।’’
‘‘उसे मैंने सहजता में लिया। मैंने सोचा गलती से मिल गया और रॉंग नम्बर कहकर फोन बंद कर दिया।’’
‘‘कॉल फिर आई। मैंने स्क्रीन पर नम्बर देखा। वहीं नम्बर था। मैंने इस बार कुछ गुस्से में पूछा, हाँ बताइए आप कौन है और मुझे क्यों फोन किया जा रहा है?’’
‘‘आपने डीपी पर कितना सुन्दर फोटो लगा रखा है। मेरा दिल तो उसी में डूबकर रह जाता है। कुछ तो मीठी-मीठी बात कर ना।’’
‘‘बदतमीज! तुम्हें किसी से बात करने की सैंस ही नहीं, मैं अभी पुलिस को फोन करती हूँ। मैं फोन बंद करती उससे पहले वह बोला- पुलिस अपनी दोस्त है।’’
‘‘उसके बाद उसकी अलग-अलग नम्बरों से कॉल आती गई। मेरे अंदर एक डर समाता चला गया। घने जंगल वाला डर… घुप्प अंधेरी कोठरी वाला डर…..सुनसान सड़कों पर फैला डर। ’’
‘‘ऐसे कैसे हो सकता है?’’
‘‘हाँ, मम्मी और मैंने जब ऑफिस में इस विषय पर अपनी कम्प्यूटर वाली टीचर से बात की तो वह बताने लगी कि उस व्यक्ति के पास अलग-अलग नम्बर नहीं है बल्कि उसे कम्प्यूटर का बहुत नॉलेज हैं और उसी के बल पर वह ऐसा कर रहा है।
‘‘मम्मी, मैं ही जानती हूँ कि मैंने कैसे घर पकड़ा। मुझे ऐसा लगा जैसे वह यहीं कहीं दुबका बैठा हैं …अभी निकलकर आयेगा……और मुझे…….। नीलू एक डरपोक बच्चे की तरह अपनी मम्मी से लिपट गई।’’
‘‘नीलू बस अब और नहीं। उठ…खड़ी हो…. चल मेरे साथ।’’
‘‘कहाँ?’’ डरपोक हिरणी-सी नीलू ने कॉपते स्वर में पूछा।
‘‘थाने।’’
‘‘नहीं।’’